Tuesday, December 24, 2013

मैं कैसे अस्तित्व में आया ये कोई लम्बी महान और बड़ी कहानी नहीं है और न ही किसी प्रसव काल से जुडी , दो भिन्न व्यक्तित्वों शरीरों आत्माओं को स्वयं में समिष्ट किये मुझे आगे बढ़ना था , पर वो होता है न आपके प्रशंसक आलोचक दोनों ही मैदान में होते हैं , मेरे भी थे । अब मुझ पर बोझ बढ़ाया जा रहा था आलोचक ढोना चाहते थे मुझ पर अपनी परम्पराओं प्रतिष्ठाओं को तो प्रशंसक महानताओं को अपेक्षाओं को ...मैं अब रेंगते हुए बढ़ रहा था लेकिन वो हार गया , वो तड़प कर रह गयी , और मुझे बे मौत मरना पड़ा । अब मेरे नसीब में बस दोनों के आंसू रूपी कफ़न था जिसे उन्होंने ' दोस्ती ( lets remain friends ) ' का नाम दे दिया ..... - ' ढाई अक्षर की लाश ' आत्म कथा से ©

Thursday, December 19, 2013

कोशिश करने वालों की ...

हिन्दी साहित्य में गजब रूचि थी बन्दे की , प्रेरणादायक कविता ख़ास तौर से ' कोशिश करने वालों की हार नहीं होती है '  तो श्री मुख से ऐसे निकलती थीं जैसे प्लेटफार्म पर ' चाय गरम चाय ' का स्वर ...     बी.ए. हिन्दी फर्स्ट इयर की बात है ... नीली साईकिल वाली लड़की पर दिल आ गया पर कहने मे डरे ... गर्मी में ताल पोखरे सूख जाते वैसे ही आत्म विश्वास सूख जाए .... दोस्त के काम दोस्त न आये ऐसा हो सकता है भला ... आत्म विश्वास प्रेम की महानता के झाड पर चढ़ा कर ' कोशिश करने वालों की हार नहीं होती है ' का इंजेक्शन लगाया हमने तो बन्दे में आत्म विश्वास बरसात में शहर में भरे पानी की तरफ उफनाने लगा .... ' हे पिकबयनी हे मृगनयनी ' घोट कर पीगया बंदा , खुश इतना कि ऐसा लगने लगा कि ये मुस्कराहट महानगर की स्ट्रीट लाईट की तरह अब शायद कभी न बंद हो ... अगले दिन हिन्दी की क्लास नहीं आया बाहर मिला तो चेहरे की रोशनी ऐसे गायब जैसे मंत्री आने के बाद एक महीने तक गाँव में बत्ती न आई हो ... बहुत पूंछने पर बोला हमारी समझ में आ गया कि कोशिश करने वालो की न हार होती है न लड़की .. मार होती है  , वो नीली साईकिल जीव विज्ञान वाली थी पिकबयनी मृगनयनी सुनते ही ' रसीद ' दे दी ... ©

Tuesday, December 3, 2013

जुबाँ

भाई साहब के यहाँ जाना हो रहा था , उस बड़ी सी मिठाई की दूकान से मिठाई ली फिर कुछ फल लिए और जब वापस रिक्शे के पास आया तो रिक्शे वाला दूकान के काउंटर पर सजी जलेबियां इमरती गुलाब जामुन देख रहा था ...उसे टोंका नहीं  ... आँखे अगर आशिकों के लिये दिल की जुबाँ होती हैं तो गरीब के लिए पेट की .... ज़रा सी देर बाद मुझे पास भांप कर वो मुस्कुराकर बोला ' चलें बाबू जी ' ... घर आकर बीस के नोट के साथ चार बालूशाही भी निकाल कर दे दीं । ...... और अन्दर '  एक किलो भी नहीं लाये ' के टांट का जवाब ' भाभी मंदिर से चढ़ा कर लाया हूँ  ' के  खिलखिलाते हुए झूठ ने दे दिया । ©

Sunday, December 1, 2013

आकार में बड़ा था पर उसका होने की आकांक्षा भी प्रबल थी , इसलिए अपना आकार बदलने को तैय्यार हो छोटे छोट टुकड़ों में बंटना था मुझे .... प्रतिबद्धता समर्पण की तेज धार ने क्षण भर में मुझे टुकड़े टुकड़े कर दिया ...शायद उसने समझ लिया मेरे दर्द को इसीलिये झट से मुझ कटे फटे को अपने निश्छल निर्दोष आवरण से ढक लिया और मेरे छोटे छोटे टुकड़ों का आकार ले लिया ... जो शायद उसकी स्वीकारोक्ति थी ... और समर्पण में उस खौलती कढाही में मुझ तक कम तपिश आये इसलिए वो जलती रही भुनती रही । अब ये प्रेम की पवित्रता ही थी कि जब हम कढ़ाही से निकले तो ' कुंदन ' से दमक रहे थे । ...... ये अलग बात है कि ज़माने ने हमसे सीखा नहीं बस चटखारे ही लिए .... - आलू के पकोडों की आत्मकथा से © 

Thursday, November 28, 2013

भीष्म

" ' लेडीज सीट ' है ? चलो खड़े हो जाओ " का तेज स्वर सुनकर वो ऊंघता हुआ युवक खड़ा हो गया । फोन पर ' पितृसत्ता नारीवाद लेख पत्रिका ' बडबडाते हुए वो महिला सीट पर बैठ गयी । ' लखनऊ से नवाबगंज तक खड़े खड़े आया था और अब जो सीट मिली तो ये महिला आ धमकी आज किसका मुंह देखा ' सोच कर किस्मत को कोस कर इयरफोन कानों में ठूंस कर ' तुम ही हो ' में खो गया । न जाने क्यों आज वो ' महिला सीट ' उसे उस अतिमहत्वाकांक्षी प्रेमिका की तरह लग रही थी जो साल में चार बार प्रेमी बदलती है । खैर बस थोड़ा दूर चली ही थी कि एक सज्जन हाईवे से गाँव के मोड़ पर उतरे । बस रुकवाने से लेकर उतरने तक जो हनक उन्होंने दिखाई उससे ' बस गाँव तक क्यों नहीं ले गए ? ' का यक्ष प्रश्न उत्पन्न हो गया था । खैर जाने दीजिये अब सरकारी बस की खाली होती सीट देख कर वो झट से उसपर काबिज हो गया अब किस्मत से गिला शिकवा काफूर हो चूका था खुश तो ऐसा था जैसे सरकारी बस की सीट नहीं सरकारी नौकरी मिल गयी हो । उन्नाव के पहले एक पति पत्नी चढ़े , भरी बस देख कर उन्होंने ऐसा मुंह बनाया जैसे तीसरी बार ' लड़की ' हुई हो । काफी देर खड़े रहे । पति ( पुरुष ) को कोई सीट दे ऐसा होना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था पर गर्भवती पत्नी ( महिला ) को भी अब तक स्थान नहीं मिला .... शायद सब व्यस्त थे कुछ मोदी राहुल केजरीवाल गाने में कुछ सोने में कुछ खाने में और वो माहिला सीट वाली महिला ' नारीवाद पितृसत्ता लेख पत्रिका ' का अचार डालने में ...ये सब देख. युवक का विवेक अब कृष्ण बन चूका था और शरीर अर्जुन बन खड़ा होने वाला ही था पर तब तक कंडेक्टर भीष्म बन महिला के लिए सीट छोड़ चूका था । आज कृष्ण फिर ' भीष्म ' के प्रति नतमस्तक थे । ©

Tuesday, November 26, 2013

सुचालक

' दहशत ' मेरा दूसरा नाम है , रोज रिक्शे टैम्पो ऑटो वालों से लेकर भिखारी शराबी भीड़ सब पर निर्बाध बरसता हूँ मैं , बिना किसी सोच संकोच के .... आंसू बहाते रोते लोग , उनके लाल नीले पड़ चुके शरीर  देखकर भी मैं नहीं रुकता .... लगता संवेदना दर्द का कुचालक हूँ मैं .... समझावन निर्दयी निष्ठुर क्रूर न जाने कितने उपनाम थे मेरे । लेकिन उस दिन खुद का मुंह लाल किये मैं दर्द से कांप रहा था . मुझे थामने वाले की गलती आँखों , डूबते दिल से मैं फटा जा रहा था  . शायद मैं सुचालक बन गया था .. बनता भी कैसे नहीं ..आखिर रात के अँधेरे में रेलवे ट्रैक पर मांस के लोथडो में सिमट चुकी इंसानी पहचान को बटोरने में लगा इंसानी दिमाग ' नहीं हमारी खुशबू नहीं हो सकती ये ' से कुरेदा उधेडा जो जा रहा था । - एक डंडे की आत्म कथा से © 

Tuesday, November 19, 2013

अमर प्रश्न

हाट बाजार की चहल पहल से दूर बस्ती की गलियों में वो बुढ़िया हमसे भरी टोकरी लिए सुबह से घूम रही थी । गरीब की बेटी की तरह हमें भी कोई स्वीकार करने वाला नहीं मिल रहा था , कारण शायद उसका निशक्त स्वर था जो घरों को भेद नहीं पा रहा था । दोपहर ढलने को हुई सांस फूलने लगी तो थक हार कर उस बड़े से दरवाजे के सामने बैठ गयी । कुछ समय बाद अचानक एक नन्हा बालक भीतर से निकला बुढ़िया को फलों की टोकरी लिए देखा तो दाम पूंछ लिए , ' सेर के आधे सेर ' बुढ़िया बोली । कमर में करधनी दाहिने पैर में बजती पैंजनिया की तान पर अपने छोटे छोटे सुन्दर नग्न नितम्बो को नचाते हुए वो अन्दर भाग गया और जब आया तो अंजुलि में धान के बस कुछ दाने ही बचे थे .. बाकी सारे रास्ते भर बिखरे पड़े थे ... बालक पुनः दौड़ गया लेकिन परिणाम पूर्ववत ही रहा ... बालक ने कुछ और प्रयास किये परन्तु परिणाम में वो बस ला पा रहा था खाली पर समर्पण और याचना से लबालब अपनी छोटी सी अंजुलि ... बुढ़िया की आँखों से बहा अमृत हम पर टपक गया और हम अमर हो गए साथ ही हमारा प्रश्न भी जो था ' ये याचना और समपर्ण किससे उपजा था ? प्रेम से या भूख से ? ' ... क्योंकि कहते हैं वो बालक साक्षात ईश्वर था । - फलों की आत्म कथा से .......    ©

Monday, November 18, 2013

विजय -पराजय

घास मिट्टी पत्थर से बनी बस एक अस्पष्ट और जड़ स्वरूप थी मैं ... उस किशोर की आस्था ने अस्तित्व दिया मुझे , उसके समर्पण लगन ने मुझे स्वरूप और उसके विश्वास ने मुझमे प्राण फूंक दिए और प्रतिफल में उसने स्वयं मुझसे प्राप्त किया एक अद्वितीय कौशल । एक दिन हाथ से रुधिर और नैनो में नीर और ह्रदय में  ' आपका अर्जुन सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बने ' का भाव भरे वो मेरे पास आया , उसके ह्रदय में शोक क्षोभ नहीं वरन ' गुरु दक्षिणा ' सम्पूर्ण कर उपजा विजय का भाव था । पर मैं पराजित थी मेरे मानव स्वरूप ने मुझे प्रतिद्वंदी मानकर मुझसे मेरा शिष्य जो छीन लिया था ... - एक मूर्ति की आत्मकथा से ©

Thursday, November 14, 2013

विजेता सम्राट की सभा में सिपाहियों से घिरा जंजीरों में जकड़ा वो राजपुरुष अभय मैत्री की याचना करते अन्य राजाओं वीरों को देख रहा था । अमूल्य रत्नों आभूषणों के थाल के थाल जीवन याचना के साथ प्रस्तुत किये जा रहे थे ... पर विजयी सम्राट रत्नों आभूषणों की चमक से उदासीन था ... राजपुरुष को देखकर कुछ बोला जिसे दुभाषिये ने ' राजन आपके साथ क्या व्यवहार किया जाए ? ' कह कर व्यक्त किया । राजपुरुष जो सोंच में था कि ' क्या एक राजा योद्धा के जीवन का मूल्य महज रत्नों आभूषणों में सिमटा है ? याचना में सिमटा है ? स्वाभिमान की अंत्येष्टि में सिमटा है ? ' ने एक पल को अपनी आँखे बंद कर अंतर्मन में झाँका और फिर बोला ' ठीक वैसा जैसा एक योद्धा एक योद्धा के साथ एक राजा एक राजा के साथ करता है '  ..... आज वो विश्व विजयी यवन सम्राट स्वयं मैत्री के लिए उठ खड़ा हुआ था । ढेर लगे रत्नों आभूषणों की चमक को निस्तेज करती राजपुरुष के जाज्वल्यमान ललाट की आभा उसे आकर्षित कर रही थी । अपने देश से हजारों मील दूर उसे आज उसे कोई मिला जो पराजित था मगर योद्धा था जंजीरों में जकड़ा था पर राजा था , क्योंकि वो जीवन का याचक नहीं था । ©


Wednesday, November 13, 2013

क़र्ज़

                               मौसमी फल केले सिंघाड़े आम खीरे अमरूद बेचकर अनीस अपने परिवार का पेट पालता था । गुलाबी सर्दियाँ थी और वो अमरूद का ठेला सजा कर अगरबत्ती कर रहा था चौराहे पर तैनात पाण्डेय हवलदार आया और रोज की तरह 2-3 अमरूद छांटे और बोला ले काट के दे । अनीस के काट के नमक लगाए अमरूद उदारातीत करके पांडे आगे बढ़ा ही था पर आज अनीस बोला ' साहेब अभई बोहनी नहीं हुई कुछ तो देते जाईये ' पांडे ने घूर कर देखा और फिर जेब से 2 का सिक्का देते हुए चिर परिचित पुलिसिया अंदाज में बडबडाते हुए आगे बढ़ गया ।  

दोपहर ढलने को थी अनीस सड़क के उस पार लघुशंका करने गया ही था कि ठेले पर ग्राहक देख कर वापस लौटने को हुआ पर सड़क पर आते ही एक तेज रफ़्तार suv ने उसका काम तमाम कर दिया । .... महीने बीत गए पांडे अब निलंबित चल रहा । आखिर धमकी और लाखों के प्रलोभन के बावजूद भी उसने उस ' किशोर चालक ' को शिनाख्त परेड में पहचान लिया था । और तो और सुना है कि ' नमक ' का कर्ज़ उतारने वाले को आज कल बेटी की शादी के लिए क़र्ज़ नहीं मिल रहा ..... ©

Monday, November 11, 2013

वरदान

 शहर के सबसे पुराने और एक मात्र पुस्तकालय में खादी पहने टोपी लगाये अखबार हाथ में लिए पर शायद ही कभी उन्हें तन्मयता से अखबार पढ़ते पाया होगा । वो जब भी पुस्तकालय में आते पुस्तकालय पुस्तकालय नहीं चौपाल बन जाता । हंसी मजाक व्यंग्य विचार सब कुछ होते नहीं होती थी तो बस उदासी और शांति । एक दिन बुढापे में शारीरिक अक्षमता पर बात चली तो बोले ' बुढापे में नजर कमजोर होना , सुन नहीं पाना , दांत गिरना वरदान होता ' मैंने पूंछा कैसे तो बोले ' घर वालों के ताने नहीं सुन पाते, उनके फालतू के क्रिया कलाप नहीं देख पाते और पाचन शक्ति काम नहीं करती तो दांत नहीं है के बहाने से मुलायम चीजें खाने को मिल जातीं .... तो बोलो वरदान हुए कि नहीं ' हा हा हा .... ठहाका गूँज गया । समय बीता बात आई गयी हो गयी । इधर एक सप्ताह से ऊपर हो गया था वो नहीं आये , मन आशंकाओं से घिर गया । सोचा उनके घर जा कर पता करूं ... ऐसा ही किया । पता पूंछते - 2 उनके घर पहुंचा । तख़्त पर लेटे थे मुझे देख कर ऐसे खुश हुए जैसे स्कूल की छुट्टी ख़त्म होने पर दोस्त मिलते हैं । खूब गप्पे हांकी हम दोनों ने चाय नाश्ता भी किया । समय का पता तब चला जब अन्दर से आवाज आई ' दादा जी मम्मी पूँछ रही हैं कि आज खिचडी खायेंगे या दलिया ? ' । बातों बातों में शाम हो गई थी चलने को खड़ा हुआ तो पूँछ बैठा ' दद्दा चलने फिरने में लाचार हो गए अब , इसे भी वरदान मानते हैं क्या ? ' उस पोपले चेहरे पर आज हंसी नहीं थी , बूढ़ी धुंधली पड़ चुकी आँखे आज भर आई थी बोले ' हाँ वरदान ही मानता हूँ ये मेरी चलने फिरने में लाचारी बस उन्ही लोगों को मेरे पास लाती जो ' मेरे अपने ' हैं । उस बूढ़े खुरदरे हाथ का स्पर्श आज दिल तक पहुँच रहा था । कसम से उस दिन काले चश्मे ने लाज रख ली वरना आँखों ने कोई कसर नहीं छोडी थी चेहरे की मुस्कान का सच उगलने की ...... ' लहसुन धनिये की चटनी भी बना देना ' घर से निकलते समय कानों में पढ़ने वाले आख़िरी शब्द थे । ©

Saturday, November 9, 2013

अग्नि परीक्षा

एक हारे हुए नगर के प्रांगण में आज भीड़ जुटी हुई थी । लकड़ियों का ढेर लगाया जा रहा था और भीड़ प्रतीक्षारत थी एक ऐतिहासिक परीक्षा की .... महिला को लाया गया .....पति , संबंधी , सेवक , दर्शक .. प्रेम क्षोभ भक्ति की प्रतिमूर्ति बने जड़ खड़े थे । लकड़ियों के बीच महिला को स्थापित कर अग्नि प्रज्ज्वलित की गयी । आकाशगामी लपटों का तेज , अग्नि के समक्ष खड़े लोगों के लिए असहनीय था फिर अन्दर ? .... अन्ततोगत्वा परीक्षा संपन्न हुई । महिला की पवित्रता निर्दोष और निष्कलंक प्रमाणित हुई । चारों दिशाओं में विजय उदघोष गुंजार हो उठा ' जय सीता राम '... पति संबंधी सेवक और दर्शक सभी महिला की पवित्रता के प्रति नतमस्तक थे । दूर कही नेपथ्य में वैधव्य श्रृंगार से सजी एक अकेली स्त्री सजल हो चुके नेत्रों को बंद कर के स्मृति बन चुके अपने ' प्रेम ' के प्रति भी श्रृद्धा से नतमस्तक हो रही थी आखिर वह भी तो सफल हुआ था इस परीक्षा में ..... ©

Tuesday, November 5, 2013

उजाले की विरासत

शहर के उस ' अछूत ' मोहल्ले में दिवाली की आतिशबाजी से निकली चिंगारी आग भड़का गयी थी । दमकल के आने तक कईयों के सपनों के आशियाँ राख बन चुके थे । पर हाथ रिक्शा चलाने वाले हरीश को इस आग ने सबसे ज्यादा झुलसाया था । अपनी झुलसे बीबी बेटी बेटे को लिए अस्पताल की तरफ बेतहाशा भागा जा रहा था । इमरजेंसी में डाक्टर को बैठा देख कर उसे ईश्वर प्राप्ति जैसी अनुभूति हुई और हमेशा की तरह धरती के इस ईश्वर ने उसे निराश नहीं किया , हरीश का परिवार अब खतरे से बाहर था । हरीश की आँखों के आंसूओं का कारण अब बदल चूका था डा. के पैर पकड़ कर उन्हें बोला ' साहेब आप आज हमरे खातिर भगवान हुई गए । हमरे जिन्दगी का उजियार ( उजाला ) बचा लीन्ह्यो । ' डा. राजेश उसे उठाने के स्थान पर जड़ खडे थे उन्हें याद आ रहा था कि कैसे पत्नी बच्चों के ' दस साल हो गए इस बार दिवाली साथ मनाईये ' की जिद मानकर वो साहब के पास पहली बार मिठाई लेकर गए थे और साहब ने कहा था ' तुम्हे क्या लगता राजेश तुम गिफ्ट मिठाई नहीं लाते इसलिए तुम्हारी ड्यूटी लगती ? नहीं .... ये मिठाई गिफ्ट लाने वाले ड्यूटी लगने पर क्या लापरवाही करते मुझे पता है .. इसलिए तुम्हे चुनता क्योंकि तुम अपने काम के प्रति ईमानदार हो समर्पित हो ... ' उजाले की विरासत ' हो ... ©

Friday, November 1, 2013

तेरस = 13 = तेरह = तेरा ...... तेरस = तेरा 

आज बाज़ार जाने वाले लोग 
जाते हैं समर्पण के साथ 
मन में बिठा कर ये 
कि धन तेरस है 

और बाज़ार में बैठे लोग
अधिकार समझते हैं 
आपके समर्पण को 
क्योंकि धन तेरस है । :)



 स्वरूप आकार और प्रकृति सामान होती है हमारी , आप चाहे तो हमें जुड़वां कह सकते हैं । रोज हम कीचड़ लगे , चमकते हुए , कोमल बजने वाले , प्रकाशित करने वाले ,नए - पुराने , घिसे - सिले , वैश्विक ब्रांड से लेकर 250 रूपये जोड़ा वाले पैरों को आरोह अवरोह से उपजे लक्ष्य तक पहुंचाते हैं । यही हमारा जीवन कर्म है । रोचक नहीं लगा न ? हमें भी नहीं लगता , भला रोज रोज भार उठाना किसे भायेगा ? मन करता बंद पड़ जाए लेकिन फिर गूंजने लगते है कुछ शब्द " देखो ऐसे पैर रखो ... हां ऐसे सम्हाल के ... डरो मत मैं हूँ न साथ .. लो मेरा हाथ पकड़ लो " कोई माने या न माने पर ह्रदय जैसे हम भी अनवरत चलने को प्रतिबद्ध हो जाते आखिर अपनेपन का स्पर्श , प्रेम और विश्वास हमसे भी जो उपजता । - एस्कलेटर की आत्मकथा से ©

Tuesday, October 29, 2013

अंतर

" भरी बस के स्टैंड पर रुकने और सवारियां उतरने के समय एक साईकिल रिक्शे वाले के चेहरे पर जैसी आस जगी होती वही आस उसके 11 साल के चेहरे पर थी जब उसने मेरे नीचे गत्ते दफ्ती का छोटा सा ढेर देखा । नीचे घुस कर वो उसे ऐसे समेटने लगा जैसे सपनों में आया खजाना हो । पर पहिये के नीचे से गत्ता खीचने से मैं तनिक सी हिली भर कि मेरे संवेदनशील सेंसर अलार्म ने चिल्लाना शुरू कर दिया ' बीप ... बीप .... बीप .... बीप ' । चौकीदार मालिक भागते हुए आये , खीचते हुए उसे निकाल कर उसपर ' माँ बहन और चोर ' थोप दिया , कुछ हाथ जड़े सो अलग । जाते हुए उसने एक बार मुड़ कर मुझे नफरत भरे आंसुओं के साथ देखा ... मन हुआ बोल पडूं ' आओ ले जाओ अपना सामान नहीं चिल्लाऊंगी इस बार ' लेकिन ऐसा नहीं हो सकता था मेरी संवेदनशीलता दगा नहीं दे सकती । ये भले ही इंसान ने मुझे दी हो पर इंसान जैसी कतई नहीं हैं " ..... - एक कार की आत्मकथा से ©

Saturday, October 26, 2013

सीमापार से गोलीबारी शुरू होते ही गुलफाम , उसके भाई बहन और माँ बाप उस बंकर नुमा गड्डे में छिप गए । पर ये क्या बकरियां आज खुले में ही बंधी रह गयीं । गुलफाम के माँ बाप एक दुसरे को इसके लिए दोषी ठहरा रहे थे । आखिर गुलफाम की माँ झल्ला कर बोली - ' खाने के वैसे ही लाले पड़े हैं अगर बकरी नहीं रही तो मेरे बच्चों को दूध भी नहीं मिलेगा ... मैं जा रही हूँ उन्हें छिपाने ' .... 
गुलफाम का बाप बोला - ' रुक मैं भी आता हूँ ' ...... दोनों ने मिलकर जल्दी से सभी बकरियों को आड़ में किया और गड्ढे की ओर वापस लौटने लगे । पर माँ को न जाने कहाँ से पड़ोसी रउफ का मेमना गोलीबारी से सहमा हुआ इधर उधर भागता दिखाई दिया । ' उसे आड़ में नहीं किया तो कही वो गोली के निशाने में न आ जाए ' ये सोच कर उसकी ओर बढ़ी ही थी एक गोली उसकी पीठ से घुसते हुए सीने से निकल गयी । वो बेजान क्षत विक्षत पडी थी गुलफाम का पिता संवेदना रोष  और शोक  का सागर बना , रोते चीखते बच्चों को सम्हाले गड्ढे में खड़ा यही सोच रहा था ' गोली ने उसकी नीयत का भी लिहाज नहीं किया ' .... © 


Wednesday, October 23, 2013

करवा चौथ का नाश हो सत्यानाश हो ... नारी किसी की गुलाम नहीं ... क्यों रहे किसी के लिए भूखा प्यासा ... भूखे रहने से भी किसी आयु बढ़ती है क्या और कैसे ? ....और सबसे बड़ी बात " भूखे रहने का प्रेम से क्या सम्बन्ध ? " ... 
ये सब पढ़कर उसके अंतर्मन में विचारों के बादल आज पूरे वेग से बरस रहे थे , लगा परम्परा आस्था प्रेम रूपी बस्ती को बहाने से आज कोई नहीं रोक सकता .. इस मूसलाधार बारिश से दुबक कर थक कर कब नींद लग गयी पता ही न चला .... और जब सपना टूटा नींद खुली तो पाया हामिद और अमीना जा चुके चुके थे । लेकिन तीन पैसे का चिमटा और अमीना के प्रेमाश्रु छोड़ गए थे .... न जाने क्यों आज वो गोवर्धन थामे कृष्ण जैसे लग रहे थे । © 

Monday, October 21, 2013

बरसात का मौसम था । धरा पर चारों और पर प्रकृति पल्लवित प्रस्फुटित हो रही थी । मैदान के उस कोने में न जाने कहाँ से वो यूकेलिप्टस का बीज पनपने लगा था । कोने की घास जो अब तक वीरान पडी रहती थी अब खुश थी । उसके जीवन में कोई हमदम जो आया था । पर यूकेलिप्टस ऊंचाई प्राप्ति का आकांक्षी था । समय बीता अब यूकेलिप्टस ' ऊंचाई ' छु रहा था और घास वहीं नीचे ' विस्तारित ' होती रही । सुबह जागिंग तो शाम को फुटबाल खेलने वालों के द्वारा रौंदी जाती और थोड़ी बढ़ने पर काट ली जाती लेकिन वही रही । इस बार तो गर्मियों में भी वो नहीं सूखी बस भूरी भूरी होकर रह गयी । पर ' ऊंचाई ' कभी नहीं झुकी वो खड़ी रही अडिग न कभी छाया दी न कभी फल .... पर कल जोर का तूफ़ान आया सारा पेड़ खड़े रहे लेकिन  ' ऊंचाईयां ' आज उस ' विस्तार ' के आगोश आ पड़ी थी । .... क्या .... क्या कह रहे हो ? वो प्रेमियों का जोड़ा कल ही उसके तने पर ' दिल ' उकेर कर आया था .... ©

Sunday, October 20, 2013

तमाम उम्र गुजार देंगे तेरे इन्तेजार में 
ज़र्रा ज़र्रा कतरा कतरा ही सही 
जिन्दगी में आती रहना । 

दरख्त है पतझड़ उजाड़ कर जाते
बनके बहार का मौसम शाखों पर 
जिन्दगी में आती रहना 

तन्हाईयों में धड़कना बंद सा कर देता है जालिम 
नफ़स की डोर हो तुम
जिन्दगी में आती रहना  

आशिक हूँ माबूद की जूस्तजू में फिरता
जौ दैर-ए-दिया का बनके 
जिन्दगी में आती रहना ......  ©

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नफस - सांस
माबूद - आराध्य
जौ दैर-ए-दिया - मंदिर के दिए का प्रकाश




आज साहित्य के क्षेत्र में सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि अब लोगों की समस्याओं का आत्मा या भावना से कोई लेना देना नहीं रह गया है । अब सबके मन में सिर्फ एक ही सवाल है ' मैं कब मशहूर बनूँगा / बनूंगी ? ' जो भी युवा लेखक लेखिकाएं हैं वे अपनी इस चाहत के कारण खुद से द्वन्द कर रहे हैं । इसी द्वन्द में वे ज़मीनी हकीकत और इंसानी भावनाओं को भूल गए हैं । उन्हें एक बार फिर जीवन के शास्वत सत्य और भावनाओं के बारे में सीखना होगा , क्योंकि इसके बिना कोई रचना बेहतर नहीं हो सकती । कवि या लेखक की जिम्मेदारी बनती है कि वह ऐसा लिखे , जिससे पढ़ने वाले व्यक्ति के मन में साहस , सम्मान , उम्मीद और ज़ज्बा पैदा हो , जो उसे प्रेरित कर सके अपने जीवन की मुश्किलों के आगे डटे रहने और जीतने के लिए । - विलियन फाल्क्नर (10 दिसंबर 1950 को नोबल पुरुस्कार ग्रहण करते समय दिए गए भाषण का अंश । )

Saturday, October 19, 2013

चाय ... डिप चाय ... कह के चाय वाला गया ही था कि वो अधेड़ क्रीज पर अपना गागर में सागर रूपी झोला लिए किताबे बेचने आ गया । खचाखच भरे कूपे में जगह बनाना उतना ही मुश्किल था जितना सचिन द्रविड़ और गांगुली के दौर में किसी नए बल्लेबाज के लिए टॉप 3 में जगह बनाना । लेकिन आपके पास टाईमिंग शाट सेलेक्शन और प्रतिभा हो तो मौके तो मिल ही जाते हैं । विनम्रता की चाशनी में डूबे बॉस , दादा जी , आंटी जी , दीदी जी जैसे संबोधनों ने उसको खड़ा होने की जगह दिला दी । दादी दादा जी के सामने कल्याण अखंड ज्योति , अंकल के सामने इंडिया टुडे तहलका आउटलुक , आंटी के सामने गृह शोभा , उनकी तरुण कन्या के लिए मेंहदी डिजाइन पाक शास्त्र ... तो सबसे छोटे राजा बाबू के लिए सरस सलिल चम्पक राज कामिक्स दिखाना गेंद को उसकी मेरिट के हिसाब से खेलने का लाजवाब उदाहरण था उसे सफलता भी मिली । अब खिड़की से बाहर झाँक रहे उस युवक के सामने उसने मुस्कुराते हुए ' मनोहर कहानियाँ ' चमकाई उसने ... युवक के चश्मे से तरेरती आँखों को देख कर अति आत्मविश्वास में स्पिन को पढ़े बिना आगे बढ़ कर लाफ्टेड शॉट मारने के प्रयास में विकेट गवां कर वो आगे बढ़ गया था । ... ©
चाक और पोतना  से 
घिस चुकी जीवन की पाटी पर
मैं लिखता हूं
मृत्यु की बातें
अंत की बातें 
अवसान की बातें 
क्योंकि
मुझे विश्वास है मृत्यु पर
साझा करेगी एक दिन
मेरी आत्मा पर पडा
पापों का बोझ
अन्तर्मन की कलुषितायें
हृदय की वेदना
और सत्य का रोष
असफ़लता , जडता
मूर्खता , धृष्टता
उज्ज्वलता , प्रखरता समेत
आत्म मूल्यांकन का सारा कोष
और बदले में देगी
मुझे एक सुप्त मुस्कान
जब तक दुबारा निकल न जाऊं
मैं उसके साथ जीवन की खोज पर । ......©

Friday, October 18, 2013

हमारे जीवन में सीखने का बड़ा महत्त्व बताया गया है । सीखना एक कला है विज्ञान है आवश्यकता है ऐसा प्रायः पढ़ने सुनने में आता है । सीखने को जीवन पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया भी कहा गया है । पर कभी सोच कर देखिये हम क्या ' सीखते हैं ? ' .... जिसके प्रति हम सीखना सीखना कहकर प्रतिबद्धित रहते वो क्या सच में सीखना है ? ... नहीं बिलकुल नहीं । ये सीखना नहीं अनुकरण है जो हमें सीमित कर देता , ताँगे मे जुते घोड़े की तरह जिसकी आँखों पर बंधी युक्ति उसे सीधा देखने को विवश करे रहती । घोडा चलता है दौड़ता है लक्ष्य तक भी पहुँचता है पर अपने नहीं ।  

बात विज्ञान की करें तो विश्व के हर कोने में आईन्सटीन , न्यूटन के प्रतिपादित सिद्धांत पढाये जाते / सिखाये जाते ? क्या हम सच में उन्हें सीखते ? नहीं हम बस उन तक सीमित होकर उत्तर पुस्तिका में उनका उपयोग करते । हम इन सिद्धांतों को तब तक सीख नहीं पायेंगे जब तक हम उनके प्रतिपादन में लगी जिज्ञासा परिश्रम असफलता लगन को अपने स्तर से नहीं जियेंगे । 

कला और साहित्य के क्षेत्र में ही देखिये । नवांगतुक रचनाकारों को प्रसिद्ध रचनाकारों को पढने और सीखने का सुझाव देते लोग मिल जायेंगे । पर क्या वो सही है ? क्योंकि पढ़कर सीखने की कोशिश से हमारी रचना शैली और वैचारिक स्तर प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता ? तो फिर हमने जो सीखा वो अनुकरण ही हुआ न ?  

सृष्टि में मानवीय विकास के चरणों में आग जलाना सबसे बड़ी खोज माना जाता है ? सृष्टि के उस पहले पुरुष ने आग जिज्ञासा आवश्यकता के वशीभूत होकर जलाने के अनगिनत असफल प्रयास किये होंगे तब जाकर उसे सफलता मिली होगी । पर साथ ही उसे पत्थर रगड़ते रगड़ते भिन्न भिन्न पत्थरों के अन्य उपयोग इनकी कठोरता भी समझ आई होगी । उसे ये सब किसी सीखने की लालसा से नहीं मिला । उसे ये सब करने के प्रतिफल स्वरूप मिला । इसलिए सीखने की वैशाखी छोडिये और लक्ष्य के मनोविज्ञान से बचिए और खोजने / जिज्ञासा के जूते पहन कर निकल पड़िये ...

Wednesday, October 16, 2013

" प्रेम के सामने जैसे ' मैं ' नहीं टिकता उसी तरह मेरे आवरण भी ज्यादा देर नहीं टिके । मेरी कोमलता उसकी प्यास के उन्माद से छिन्न भिन्न हुई जा रही थी मुझमे भरी सारी मिठास घुल रही थी । विडम्बना तो देखिये मेरे जैसी दिखने वाली मेरे जैसी कोमलता का गुण लिए वो भी मेरी सहायता नहीं कर रही थी , इधर उधर होते ही वो फिर से मुझे समेट कर उस कठोरता तीक्ष्णता के बीच चबने के लिए प्रस्तुत कर देती देती इतना ही नहीं थोड़ी थोड़ी देर में वो दोनों मिलकर मेरी नुमाईश करने के लिए बाहर निकालते । आखिर पूरी तरह चबाने निचोड़ने छिन्न भिन्न करने के बाद उसने सावधानी से मुझे ' कागज ' के टुकड़े में लपेट कर गुणहीन स्वादहीन करके अँधेरे कोने में जहाँ मुझे खोज पाना मुश्किल था , थूंक दिया । " - रेड लाईट एरिया से मिली डायरी का अधजला पन्ना .....©

Tuesday, October 15, 2013

मुझे नहीं भाते है 
क्रीज जमे परिधान 
चमकते जूते 
रोज एक सी आने वाली खुशबू
डीसेंट हेयर कट 
और एक चिपकी सी मुस्कान 

मुझे नहीं भाता है दृढ़ता
विचारधारा वाद ज्ञान की पगडंड़ियों 
पर रोज रोज चलना
मेरे लिए जीवन नहीं है बस 
जूते की एडियाँ घिसना 

शायद इसीलिये तुम पाओगे 
मेरे जूतों को कम घिसा पर
मिट्टी से गोबर से रेत से भरा 
तले में धसे कांटे 
जिनसे कभी खून था उभरा

हां मैं ऐसा ही हूँ 
उधडी हुई नेकर पहने 
गालों पर बहे आंसू के निशान लिए
छिले हुए घुटनों के साथ 
फिर से खेलने जाने की जिद करते बच्चे जैसा ... ©


Sunday, October 13, 2013

दशहरे का मेला था । भाई हजारों की भीड़ तो होनी ही थी आखिर इस बार रिकार्ड तोड़ 120 फीट का रावण जो जलाया जा रहा था । आखिर आग लगी पुतला जला पटाखे फूटे और साथ ही हुआ ' सियाबर राम चन्द्र की जय ' का रोमहर्षक आंदोलित प्रफुल्लित करने वाला सस्वर उदघोष । लगा रावण जल गया कहानी ख़त्म .... पर नहीं दोस्त , कहानियाँ ख़त्म नहीं होती । वो तो अभी भी बरकरार थी .... बैकलेस ब्लाउज से झांकते अधोवस्त्र ताकती उन आँखों में , 25 रूपये हर माल की दूकान में सबको सुनाकर कहे गए ' बड़ा मस्त मस्त माल लगाए हो ' के स्वर में और ' जरा हटिये ' कहने के स्थान पर दिए जाने वाले उस उन्मादित पाशविक स्पर्श में ..... अब न जाने क्यों तरस आ रहा था दफ्ती , लकड़ी , बांस , कपड़े , रंग , पटाखे और इन सबको को आकार देने में किये गए श्रम पर ..... आखिर हर बार की तरह इस बार भी बुराई के नाम पर बस इन्हें ही बलि चढ़ना पड़ा । © 

Friday, October 11, 2013

जेल से सात साल बाद निकला था वो । समझ नहीं आ रहा था कहाँ जाए । शहर से बाहर जाने के लिए पटरियों के किनारे किनारे प्लेटफार्म की और बढ़ चला था उसका एक एक कदम उसे याद दिला रहा कि कैसे  उस मजदूरन के साथ जो उसने किया उसके बाद सब कुछ बदल गया था । घर परिवार नाते रिश्तेदार सब कन्नी काट गये थे । जेल में प्रताड़ना मिली सो अलग । मुर्दा शरीर की भांति उद्देश्यहीन चला जा रहा था । इंजन के भोपू की आवाज आयी तो जैसे नींद से जगा और तभी एक कामगार महिला का तेज स्वर भी सुनाई दिया ' ' बबुआ S s s बबुआ S s s पटरी से हट जा s s s ' लेकिन पटरी पर खेल रहा बालक शायद बधिर था .. टस से मस न हुआ । महिला के चेहरे पर गौर देते ही उसे साढ़े सात साल पहले की रात याद आगई ... ये तो च.. चमेली है .. तो क्या ये बच्चा मेरा ? .... उस मुर्दा शरीर में बिजली सी कौंध गयी तीनो ट्रैक पार करके बच्चे को एक किनारे धक्का दे दिया पर खुद को इंजन के सामने से नहीं हटा (पा ?)या ... ट्रेन जा चुकी थी , बच्चा माँ की गोद में था .. मांस के लोथड़े प्रश्न लिए बिखरे पड़े थे " ये पाप का प्रायश्चित था या दंड ? " ....© 

Thursday, October 10, 2013

कभी ज्वार बनकर 
कभी फुहार बनकर 
कभी किसी के सामने 
कभी सूने में 
छिपा रहता हूँ कभी 
दृग के कोने में 
चिता को सुखाने 
विरह को गलाने
दर्द को जताने 
प्रेम दर्शाने 
आशा में निराशा में 
हर्ष में उल्लास में
मैं निकल आता हूँ .... 

कभी रूमाल से
कभी बस गाल तक 
खुद की आस्तीन से 
माँ के आँचल तक 
कभी हथेलियों से 
यारो की हथखेलियों से 
अक्सर रोका जाता हूँ मैं 

पर मैं नहीं हूँ 
कमजोरी या
निर्बलता का प्रतीक 
मैं प्रतीक हूँ 
पवित्रता का
प्रबलता का 
ह्रदय की ...
©






न्यूज फीड पर सनी लियोन का फोटो चमक रहा था । एक मित्र ने लाईक किया हुआ था । फोटो पर क्लिक किया तो पाया उभारों और घुमावों को विशेष रूप से दिखाने का प्रयास था । अपनी अपनी आकांक्षाओं इच्छाओं और दावों को प्रकट करते हुए हजारों लाईक्स और सैकड़ों कमेंट्स थे । स्क्रीन टाईम आउट महज 15 सेकेण्ड का सेट था तो स्क्रीन ब्लैक हो गयी अब SMART फोन की DULL हो चुकी स्क्रीन पर चेहरा दिख रहा । ऐसा लगा प्रतिरूप कह रहा हो
- तुम भी तो किसीके इनबाक्स में ऐसे ही नियमित रूप से अपनी इच्छाओं आकांक्षाओं दावो को प्रकट करते हो ... 
- नहीं नहीं मेरा प्रेम शारीरिक नहीं है मैंने कब की प्रणय संबंधी याचना ?
- पर ये जैसे कर रहे तुम भी वैसे ही करते हो न .. मैं कैसे मानू ? 
 कहने वाला था कि मैं नैतिक हूँ पर रेम्बू याद आगये ' नैतिकता दिमाग की कमजोरी है ' ... मौन ताड़ कर प्रतिरूप बोला - बोलो बोलो ... चुप क्यों हो गए ? ... नीत्शे विनोबा कीट्स टैगोर सब याद आ रहे थे पर मौन थे शायद उनका मौन कह रहा था कि अपने सच के लिए हमारा इस्तेमाल क्यों करना चाह रहे हो । 
प्रतिरूप अग्नि सी कठोरता लिए बोला - ' अपने प्रेम का प्रमाण दो मुझे या उसे परेशान करना बंद करो । ' उस पल लगा स्वयं को ही स्वयं के सच का प्रमाण देने से बड़ी परीक्षा कोई नहीं हो सकती .... प्रतिरूप अभी भी मुझमे झाँक रहा था .....' सच को भी भला प्रमाण देने की आवश्यकता होती है ' सोचते हुए न जाने क्यों आँखों ' डूबने ' लगी ... आँखे बंद ही करी थी कि उसका ' पीली बिंदी वाला मुस्कुराता चेहरा ' चमक उठा । <डिंग> नोटिफिकेशन की आवाज आयी तो आँख खुली । प्रतिरूप स्मार्ट फ़ोन की ' प्रदीप्त ' हो चुकी स्क्रीन से गायब था और आज महीने भर बाद मैसेंजर एप पर उसका सन्देश था ... ' :) ' । ©
उस भयावह घटना के बाद से उसके अन्दर मैं पल रहा था । नैतिकता के तानों को सहते झेलते उसने मुझ को जन्म दिया । उस दिन उसके शील को छिन्न भिन्न करने वाले आज विकास , भोजन , समानता , न्याय , निष्पक्षता और अधिकार के वस्त्र लेकर उसके जख्म ढकने आये थे । बहुत दुखी थे , संवेदना के प्रतीक बने हुए थे । मुझे हाथ में लेकर वो बोली तुम सब इसके जिम्मेदार हो , इसे अपनाओगे नहीं ? एक दूसरे की तरफ मुंह ताकने लगे । नहीं अपना सकते थे आखिर ' शौक ' आगे भी तो पूरे करने है । तब से मैं अकेला मुंह पर कालिख हाथों में खून लगाये बैठा हूँ सब मुझसे दूर भागते कोई पास बुलाकर अपनाना नहीं चाहता । मैं भी तो लोगों को एक जुट करता एक साथ लाता ... जानते हो साफ़ करना चाहता हूँ अपनी कालिख और खून , जीना चाहता हूँ तुम्हारे सबके साथ प्रेम बनकर ... अपनालो मुझे तुम्हारा ही तो अंश हूँ । - दंगे की आत्म कथा

Wednesday, October 9, 2013

मेरा जन्म कैसे हुआ ये एक शोध का विषय है और शायद कम रोचक भी , पर मेरी कहानी रोचक है । इयोजोईक आर्कियोजोइक प्रोटेरोजोइक से लेकर नियोजोइक काल तक किताबो के पन्नो के रूप में आप मुझे ही पाते हैं । तब घुलता गलता जमता बनता अपने आप अपना आकार ग्रहण करता था मैं । फिर पन्ना पलटा मुझे किसी और ने महत्वाकांक्षाओं का गोल , नुकीला , चौकोर , बड़ा , छोटा आकार देना शुरू कर मेरी स्वाभाविकता को नष्ट कर दिया । लेकिन मैं दुखी नहीं हुआ , खुश था इस नए रूप से । लेकिन पन्ना फिर पलटा इस बार मुझे एक जीवंत रूप दिया गया । अनगिनत बार आस्था का जल विश्वास के पुष्प और श्रृद्धा का नैवेद्य मुझको समर्पित किया गया । फिर अचानक एक दिन वो आँखों में पानी लेकर हाथ फैलाए मेरे सामने खड़ा था । सैकड़ो सौर्य तूफ़ानो ने भी इतना कष्ट नहीं दिया था जितना वो नम आँखे दे रही थी । यही सोंच रहा था आखिर ' निर्माता ' आज याचक बन कर क्यों खड़ा है ? उस दिन मुझे दुःख हुआ बहुत हुआ न कुछ कह सकता था न कर सकता था तो सोचा मैं भी रो दूं .... पर नहीं रो सकता । पत्थर जो ठहरा ......- एक पत्थर की आत्म कथा । ©

प्रतिस्पर्धा

कांच की बोतल के ढक्कन में छेद करके उसमे कपडे की एक लम्बी टुकड़ी डाल कर मिट्टी का तेल भर उसे बनाया गया था । उस दिन वो ढिबरी / डिब्बी रात भर जलती रही सुबह हो गयी थी किसी ने बुझाया नहीं था । चारों और सूर्य का प्रकाश फ़ैल रहा था डिब्बी सहम रही थी । प्रकाश के इस प्रचंड और विहंगम स्रोत के समक्ष उसका आत्मविश्वास डोलने लगा मन ही मन सोचने लगी कहाँ इतना उज्जवल प्रकाश और कहाँ मैं धुँआ फैलती हुई छोटी से लौ । कोई उसके पास ही नहीं आ रहा था या शायद किसी को वो दिख ही नहीं रही थी । निराश हो गयी थी अपने अस्तित्व और उपयोगिता पर स्वयं ही प्रश्न चिन्ह लगाते हुए दिन भर कांपती रही वो लौ ... आखिर शाम होने को हुई । उसे उठा कर बरामदे में रख दिया थोडा और अंधेरा हुआ तो उसी के आस पास चहल पहल बढ़ने लगी । बाबा माला जपने लगे , पुत्तन लिखने लगा , अम्मा सब्जी चीरने ( काटने ) लगी ... और अब लौ बड़े शांत भाव से स्थिर होकर जल रही थी । शायद उसकी समझ में आ चूका था उसकी उपयोगिता प्रासंगिकता प्रकाश से प्रतिस्पर्धा में नहीं वरन अँधेरे से लड़ने के लिए है । 

Tuesday, October 8, 2013

मैं लिखना नहीं चाहता
मैं छपना भी नहीं चाहता 
किताबो में 
अखबारों में 
इतिहास में 
तोड़ देना चाहता हूँ अपना कलम 
उकेरना चाहता हूँ 
खुद को अपनी उँगलियों से
माँ के तलवे पर 
तुम्हारी अधरों पर
नन्ही हथेलियों पर
गाय के गले पर 
नदी की धारा पर 
सुबह की गीली घास पर
लहर बहा कर ले जाए उस रेत पर
कीचड पर मिट्टी पर 
पुष्प की पंखुड़ी पर
बबूल के शूल पर 
पसीने से भीगे श्रमजीवी के अंगोछे पर 
किसान के हंसिए पर
जमादार की झाडू पर
भंगिन के मैला उठाने वाले तसले पर
पत्थर पर 
रोटी पर 
धुल से सनी खिडकियों पर 
और चिता की राख पर .....
©


Monday, October 7, 2013

केमिकल लोचा

सफ़र में था खिड़की से बाहर झाकते हुए पेड़ो में खेतों में पहाड़ों में ' तुम्हे ' ही देख रहा । तभी एक आवाज आई ... अच्छा बताओ गांधी धोती क्यों पहनते थे ? .... नहीं पता ... अच्छा तुम बताओ ... तुम ... तुम ? तुम लोगों को नहीं पता चलो हम बताये देते हैं । दुसरे कोने में खिड़की के पास बैठी वो अधेड़ उम्र की शिक्षिका बोली । अपने पूछे प्रश्न का उत्तर देने के बाद गांधी नैतिकता धर्म समाज पर ज्ञान भी दिया । .... नाराज मत होना पर न जाने क्यों ' तुम्हारी ' जगह अब चरखा कातते गांधी ले रहे थे । खैर जब वो उतरने को हुईं तो पाया की चमचमाते हैण्ड बैग में च्विंगम लगी हुई । पेपर से साफ़ करने का प्रयास किया पर महज ' शारीरिक आकर्षण ' की तरह 'नहीं होती च्विंगम , जो छूट जाए ... आखिर सावधानी से बैग कंधे में टांगते हुए बोली ' पता नहीं क्यों च्विंगम खाते है ये लोग मुंह में छाले पड़ें इनके .... कैंसर हो जाए ' ... . न जाने क्यों अब गांधी   ©
मार्ग दृश्य है न लक्ष्य
धुंध में छिपे
पर्वत सरीखा हो रहा है 
तुम्हारा मौन 
तुम्हारे लिए बस 
सिमटकर बन गया हूँ मैं ' कौन ' 
थक रहा हूँ , टूट रहा हूँ 
कदम दर कदम 
पर जूझूंगा , चलूँगा 
सत्य को शिखर तक पहुँचाने को 
नापूंगा गहरी घाटियाँ 
बढ़ाऊँगा शब्दों के छोटे छोटे कदम 
प्रतिध्वनित होती आवृति 
इन शब्दों की
कुछ नहीं बस होगी 
प्रमाण ' गहराईयों ' का ... ©

Saturday, October 5, 2013

डायन

सारे गाँव में पीटते हुए निर्वस्त्र घुमाया कुछ टोने टोटके किये और फिर कहने लगे कि रत्ना के अन्दर की डायन को हमने मार दिया ( और शायद अपने अन्दर की इंसान को भी ) ... विक्षिप्त रत्ना अब तालाब के पास वाले ' डोम ' के बने झोपड़े में ही रहती थी । उस दिन गाँव में हल्ला उठा कि रत्ना तालाब में डूब कर मर गयी । सारा गाँव इकठ्ठा था । जल कुम्भी में फंसी रत्ना और 8 साल सीमा की लाश निकाली जा रही थी । डायन जाते जाते एक को और खा गयी ' जन वाक्य ' बना हुआ था ये । क्रोध और हो हल्ले में एक दबी सिसकी मासूम आवाज आ रही थी ' बा ने ( उसने ) पानी में ते मोय निकारो ( मुझे निकाला ) ' शोर सन्नाटे में बदल गया। माँ ने उसे कभी न अलग करने के भाव से कलेजे से चिपका लिया और वो मासूम आवाज भी शांत हो गयी । अब सन्नाटे के रूप में एक प्रश्न आ खड़ा था जिससे वो सब पीछा छुडाना चाहते थे  ' डायन को तो पहले मार दिया था फिर आज ये कौन मरा ? इंसान / औरत या कोई और ? ' ..... ©

Wednesday, October 2, 2013

बड़े बेशर्म हो यार 
तुम हर साल आ जाते हो ? 
क्या मिलता तुम्हे हर साल आकर ? 
रटे रटाये भाषणों में 
नैतिकता के पाठ ,
देखे दिखाए नाटक ,
एक दिन का ड्राई डे ?
एक सरकारी छुट्टी और
पूरे दिन निर्बाध बिजली की आपूर्ति ? 
बस इसीलिये आते हो ? 
सुनो 2 अक्टूबर 
तुम्हे सच के उस योद्धा की कसम 
तुम अब मत आना 
अब तब तक मत आना
जब तक कोई नोट गिरने 
खोने , न मिलने से ज्यादा
झूठ बोलने का दुःख न  मनाये .... ©

Tuesday, October 1, 2013

" लड्डुओ की कतार लग रही थी मेरे अन्दर ... थोड़ी देर में पूरा भर गया था मैं , पर तौल अभी भी कम थी तो दो लड्डू ऊपर चढ़ाकर रबर बैंड से कस दिया गया मुझे । सूट बूट में कसे हुए हैंडसम बन्दे वाला फील आ रहा था ऊपर लिखी क्वालिटी ' शुद्ध देशी घी और स्वच्छता विशेषता ' चमक रही थीं । खरीदने वाले ने पालीथीन समेत मुझे उठाया और घर ले आया । घर में दो नन्हे हाथ मुझे खोलते ही चहक उठे लेकिन तभी दो मुलायम बड़े हाथों ने मुझे झपट लिया । और एक मूर्तियों से सजे कमरे में मुझे पहुंचा दिया । वहाँ दो और मुलायम हाथों ने सारे लड्डुओं को एक बड़े से थाल में सजा दिया और मुझे एक कोने में खाली खुला और अकेला छोड़ गए। सुबह होते ही दो रूखे घिसे हुए हाथों ने मुझे उठाकर मुझ पर लिखे ' शुद्ध देशी घी और स्वच्छता विशेषता ' का बिल्कुल भी ध्यान न देते हुए मुझमे जूठन , कूड़ा भर कर कूड़े के ढेर पर जलने के लिए डाल दिया । ... मुझे समझ आ चुका था मेरी उपयोगिता समाप्त हो गयी है । " - एक वानप्रस्थ की डायरी से .....©

Monday, September 30, 2013

न्यायिक प्रक्रिया में शिथिलता कैसे दूर हो इस विषय पर सेमीनार चल रही थी । बड़े बड़े गणमान्य विधिवेत्ता अपने अपने विचार रख रहे थे । कोई अधिवक्ताओं को , कोई प्रशासनिक प्रणाली को तो कोई राजनीतिक हस्तक्षेप को इसका कारण बताते हुए अपने विचार रख रहे थे । सबसे अंत में उनका नंबर आया । समय कम था और वो कवि थे तो दो पंक्ति में अपनी बात कह गए । 

" न्यायिक प्रक्रिया में शिथिलता दूर हो , 
अमा आप लोग कैसी बात करते है । 
ये जुवेनाईल फ्रेंडली constitution है । 
फैसले के लिए केस 18 का हो इसका भी इन्तेजार करते हैं । " ©
नदी किनारे अक्सर जाना होता है । इस बार महीने भर बाद गया तो पाता हूँ कि बाढ़ का पानी लौट चुका है। मिट्टी के गहरे टीले फिर से हरे भरे हो चुके है । झींगुरों का कंसर्ट अपने चरम पर है । पत्ते पेड़ सब चटक हरे हो गए है ... मिट्टी कीचड से सनी भैंसें कैट वाल्क को भी लजाती हुई चाल से घर लौट रही है ... तभी में में में करती एक आवाज कानो में पडी । आवृत्ति बढ़ती ही जा रही थी । उठ कर देखा तो एक ऊंचे टीले पर एक बकरी मिमिया रही थी । हरे भरे टीले में घास खाते खाते वो टीले के ऊपर पहुँच चुकी थी । अब शायद उतरने का रास्ता नही सूझ रहा था उसे । ' इच्छा पूर्ति के लिए विवेक को तिलांजलि देने से ऐसी ही परिणति होती ' उसकी बेबस मिमियाहट यही कह रही थी शायद .....

Saturday, September 28, 2013

ठेका देशी शराब

ठेका देशी शराब ... हां बस उसी ठेके के सामने वो नमकीन का ठेला लगता था । हर पीने वाला उसके यहाँ से नमकीन जरूर लेता । बड़े से बड़ा छोटे से छोटा ,; चोर बदमाश से लेकर सिपाही कोतवाल तक । अपनी एक तिहाई जिन्दगी नशेबाजो के साथ गुजारने के बाद भी वो पीता नहीं था । आये दिन जलालत गालियाँ सहता कभी कभी तो मार भी सहन कर लेता था । बहुत पूंछने पर बोला - भैया जी ये सब चलता रहता है फर्क नहीं पड़ता अब । यही गाली देने वाले पैर छूकर भी जाते अगले दिन । नशा सिर्फ गुमान देता और कुछ नहीं .... दो बिटिया ब्याहनी है लड़का पढ़ रहा है इन सबसे उलझूंगा काम बंद कर दूंगा तो कहाँ से हो पायेगा सब .. यही हमारा धरम करम है । ऐसा लगा मानो साक्षात भगवान कृष्ण आसक्ति भोगों से दूर रह कर कर्म में रत रहने का ज्ञान दे रहे हों ।  मन आया लगे हाथ पूँछ लूं कि गीता पढी है क्या कभी ? लेकिन तब तक वो प्लेट लेकर आगे बढ़ चूका था । ©

Friday, September 27, 2013

गरीब

शुक्रवार था , शाम होने को थी फिर भी भीड़ थी गल्ला मंडी में। सरकारी अनाज के ट्रक जो आयेंगे । 5 रुपया बोरी उतराई लेने वाले मजदूर खड़े थे भोला भी था । ट्रक आया सब बोरियां उतारने में लग गए । सुपरवाईजर का फ़ोन बजा ... सुपरवाईजर बोला - हेलो ... जी सर ठीक है 10 - 10 करवा दूंगा । सर हमारा भी ध्यान रखिएगा पिछली बार सूंघने भर को भी नहीं मिल पाया था । हा हा हा एक लम्बी हँसी के बाद फ़ोन बंद हो गया । 
फिर सुपरवाईजर की धमकाती हुई सी आवाज आयी - सुनो हर ट्रक से 10 - 10 बोरी बचा के छोटे गोदाम में रख देना । ऐसा ही किया गया ... पैसे लेकर सब चले गए तो भोला ने अकेले में सुपरवाईजर से कहा - बाबूजी थोडा गल्ला मिल जाई का रात हुई गयी है अब दुकान सब बंद हुई गयी .... गाडी के शीशे में अपना चेहरा अस्त करने से पहले सुपरवाईजर बोला - हराम का माल है , 200 रुपया पा तो गए हो ... साला तुम लोगों का कभी पेट नहीं भरता तभी गरीब हो । ....  
कृत्रिम रोशनी की चमक में भोला को शीशे में अपना प्रतिरूप दिखा ही था कि गाड़ी फुर्र हो गयी .. .....

 ©

Wednesday, September 25, 2013

हाथ बढ़ाये वो इसी आस में जीता था कि एक दिन वो उसका हाथ जरूर थामेगी । लेकिन नियति उसके पाले में नहीं थी । एक बार जाने के बाद उसने पलट कर भी नहीं देखा । ' तुम्हारे हाथों की लकीरों में वो नहीं है ' अब तो सब यही कहते थे । उसने हथेली पर उसका नाम अपने हाथों से उकेर लिया । जानता था कि बंद मुट्ठी कभी थामी नहीं जा सकती पर खोने से इतना डरता था कि बंद मट्ठी करके उसे हमेशा के लिए अपने समेट लिया । - कौशल ©

ब्रह्म राक्षस

लावारिस छिन्न भिन्न अधजली अधगली लाशों को ठिकाने लगाता था वो । बस यही उसका काम था । भाव शून्य शब्द शून्य था , किसी ने मुस्कुराते हुए भी नहीं देखा था उसे । लाश ठिकाने लगा कर चेहरे पर श्मशान जैसी वीभत्स शान्ति लिए आता और 50 रूपये और दारू की बोतल लेकर ओझल हो जाता । जुलाई का महीना था नदी में बाढ़ आयी थी बहुत से शरीर बह बह कर आ रहे थे । उसका काम और बढ़ गया था । हमेशा की तरह उस दिन भी आया , पैसे और दारू की बोतल पहले से निकाल कर रखी थी । पैसे उठाकर बोला - दारू की बोतल के बदले पैसे चाहिए ' पार्श्व में उसके ठेले से किसी बच्चे के रोने की आवाज आ रही थी ....©

Tuesday, September 24, 2013

मंदिर में रोज दो दिए जलाना उसका नियम था । एक दिन पुजारी पूँछ बैठे क्यों ये दो दिए जलाने का क्या तुक है ? सभी तो एक ही जलाते है । बिना कुछ कहे मुस्कुराकर कर चला गया वो । ( सुना था उसने कि किसी के लिए कुछ मांगो तो किसी पर जाहिर मत होने दो । ) उपेक्षित किये जाने के बाद भी चुपचाप उसकी क्लास में जाकर उसे देख आता था वो । बिना कुछ कहे बिना उसके सामने आये । उसे खिलखिलाता , हँसता , सफल देख कर उसके चेहरे पर एक मुस्कान आ जाती । बस इतना ही तो वो चाहता था । आखिर प्रेम करना उसने प्रेम कहानियों से ? गीतों से ? व्यक्तियों से नहीं इयरपीस से से सीखा था । .... जब साथ रहो तो एक दुसरे में पूर्णतः संलग्न रहो और जब कभी अलग भी हो तो एक दूसरे के पूरक बनकर जीवन में संगीत घोलते रहो । - कौशल ©

Monday, September 23, 2013

उस दिन एक वृद्ध ओवर ब्रिज पर अपने पूरे लदे हाथ ठेले को चढाने का दुर्गम प्रयास कर रहा था । पसीना पसीना हो गया था पर कोशिश जारी थी । फुर्र से एक बाईक ठेले के आगे आकर रुक गई । बाईक से दो नव युवक उतरे और मुस्कुराकर एक ने उस वृद्ध के साथ ठेले को धक्का देना शुरू कर दिया । चढ़ाई चढ़ने पर वृद्ध ने सकुचाते हुए युवक की पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा ' बस भईया अब हम लई जईबे ' । चमत्कार सा हो गया ... एक दिन पहले सिटी कप फ़ुटबाल में मिली सेमीफाईनल की हार का सारा दर्द निकल सा गया उस स्पर्श से ... ईश्वरीय स्पर्श की अनुभूति दे गया वो एक पल ।

( समोSहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योस्ति न प्रिय: ।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि तेषु चाप्यहम । ।अ-9 , 29 
मैं सभी भूतों में समभाव से व्यापक हूँ न कोई प्रिय है न अप्रिय ; परन्तु जो मुझे प्रेम से भजते है ( प्रेम करते है ) वे मुझमें है और मैं भी उनमें प्रत्यक्ष प्रकट हूँ । ) - कौशल ©

Sunday, September 22, 2013

अब तक समझने का प्रयास कर रहा कि तुम्हे क्या पसंद नहीं आया मैं ? मेरे प्रेम की स्वीकारोक्ति या स्वीकारोक्ति में दर्शायी तत्परता । कहते हैं ' प्रेम में वियोग सबसे अधिक पीड़ा देता है । ' पर मैं नहीं मानता विरह प्रेम का संकट काल नहीं हो सकता यह तो प्रेम में भक्तिकाल जैसा है , आपकी आस्था , प्रेम विश्वास को परखता है निखारता है और प्रगाढ़ करता है , हर पल आशा से ओतप्रोत रहता । सब कहते हैं आगे बढ़ो , क्यों जीवन किसी एक पर ख़त्म कर रहे हो । नहीं !! यही तो मेरे प्रेम की परीक्षा है । इससे भाग नहीं सकता । पर जानती हो सबसे ज्यादा क्या कचोटता है ? धीरे धीरे सब मुझसे दूर जा रहे है जीवन में जो प्रेम और सम्मान पाया वो भी दांव पर लगा है और तो और तुमने भी शब्दों का आदान प्रदान भी बंद कर दिया पर मैं बात करता हूँ ... हां ... ह्रदय में बसी तुम्हारी प्रतिमूर्ति से । तुम साथ नहीं हो मैं अकेला ही इस परीक्षा को दूंगा ... सफल असफल होने के लिए नहीं तुम्हे पाने खोने के लिए नहीं बल्कि अपने सत्य अपने प्रेम को साबित करने के लिए ..... ' ये सब वो इसलिए लिख सका क्योंकि उसका की बोर्ड वाटर प्रूफ था । जी हां XYZ कम्पनी का वाटर प्रूफ की बोर्ड । XYZ कम्प्युटर प्रोडक्ट्स आपके दुःख के साथी । - कौशल ©

Saturday, September 21, 2013

कालेज में सबसे अच्छा गाता था वो । खुश मिजाज , मिलनसार , सब पसंद करते थे उसको ... और शायद वो भी । पर अचानक न जाने क्या हुआ उसने बात करना बंद कर दिया । बहुत कोशिश की पर हर बार वो मुंह फेर लेती । आखिर एक दिन उसने कह दिया ' गाना पसंद था तुम्हारा इसका मतलब ये नहीं कि तुम्हे भी पसंद करूं , जाओ और अपनी आवाज फिर कभी मत सुनाना .... जीभ काट ली उसने ... अब घर पर ही रहता । पीछे वाला कमरा जो गली में खुलता उसके दरवाजे पर बैठा रहता अनजान सा ... पर 6 साल के चिंटू को देखकर न जाने क्यों मुस्कान आ जाती उसके चेहरे पर । महीने बीत गए ऐसे ही , फिर एक दिन दो बच्चे चिंटू से लड़ गए उसने झिड़क कर छुटाया तो एक का सर फूट गया .... अब चिंटू नहीं आता .. दरवाजे की जगह खिड़की लग गयी है... और खिड़की के नीचे कोई लिख गया है ' पागल से सावधान ' - कौशल त्रिपाठी ©
 वृक्ष जिसने प्राण वायु के साथ साथ कई बसंतों फल फूल छाया दी पंछियों , कीड़ों , गिलहरियों की अनगिनत पुश्तों को आश्रय दिया पर अब सूख चूका है उसकी डालों पर न पंछी कलरव करते हैं न गिलहरियाँ फुदकती है ; उसकी ही भांति हो गए थे वो । जर्जर शरीर एक कदम चलने के लिए साँसों , शरीर और छड़ी का पूरा जोर लगाना पड़ता था उन्हें , पर थे नियमित । उन्हें देखकर किसी को भी लग सकता था कि अब इस आयु में ये क्यों खुद को कष्ट देते हैं ? पर वो प्रतीक हैं संकल्प के , आशा के , जीवन के... वो जीवन जो किसी भी दिन ख़त्म हो सकता है , पर वो इसे हार कर नहीं ... जी कर , लड़ कर ख़त्म होने देना चाहते । - कौशल त्रिपाठी ©

Wednesday, September 18, 2013

पहले मैंने 
तुम्हे दिए 
अपने शब्द ,
फिर अर्पित किया 
अपना चिंतन ,
फिर अपनी आस्था भक्ति और विश्वास
 फिर अपनी मुस्कान और दिन 
और अब निछावर कर रहा हूँ 
तुम पर अपनी राते ,
 नींद और सपने । 
जानता हूँ 
बदले में कुछ नहीं मिलेगा । 
पर कम से कम मत मांगना
 मुझसे मेरी साँसे 
वो दो जोड़ी बूढ़ी 
आसराई आँखों की अमानत हैं ... ©
तुम 
मेरे लिए 
न फूल हो
न कली 
न बाग़ न उपवन
न नदी न झरना 
प्रेम के प्रतीक जो मेरे
अग्रज दे गए हैं 
उनमें से कुछ भी नहीं हो तुम 
मेरे लिए 

मेरे लिए 
तुम हो
जगमगाने वाला 
मन्दिर का दिया 
दूर से ही सही
पर सुनाई देने वाली 
घंटे की ध्वनि
तुम हो 
मेरी आस्था की प्रतीक ... ©





Tuesday, September 17, 2013

प्रेम

अचानक हवा तेज हो गयी । जलता दीपक बुझ न जाए इसलिए हाथों से ढँक लिया उसने । पर उसके हाथ झुलसने लगे और दीपक बुझने लगा । इस बात के लिए दीपक और वो एक दूसरे से नाराज थे । पर वो ये भी समझते थे कि दीपक बुझ न जाए इसलिए उसने उसे हाथों से ढका था और उसके हाथ झुलस न जाएँ इसलिए दीपक बुझने लगा था । .... - कौशल


Monday, September 16, 2013

अधुरी कहानी ( शायद आख़िरी भी )

दो - चार कहानी कविताएँ उस पर लिख कर और उनमे उसके like पाकर सोंचता था उसने उसे पा लिया । यहाँ तक तय कर लिया कि वो नहीं तो कोई नहीं ... पागल था ... पर प्रेम एक प्यास है जितना गहरा प्यार उतनी बड़ी प्यास । मिलन हो या विरह इस प्यास में बस आंसू ही पीने को मिलते । ( बस तुम्हारे इन्तजार में हूँ ... मुझे पता है तुम आओगी एक दिन मेरी कहानी पूरी करने ) । - कौशल 

Sunday, September 15, 2013

खाली जेब ....

चौबे के यहाँ से पान खा के जैसे ही चलने को हुआ एक मासूम सी आवाज आई - ' बाबूजी जूता पालिस कर दें ' मुड़ कर देखा तो 13-14 साल का लड़का खड़ा था काफी टाईट पेंट और थोड़ी बड़ी शर्ट पहने । ( किसी से मिले ही लगते थे ) 
- कै पैसे लोगे ?
- 5 रूपया 
- इतने ज्यादा ? तुम तो बड़े ठग निकले ( हंस कर कहा )
- जादा नहीं है बाबूजी , जूता बिलकुल चमका दूंगा 
- अच्छा चलो ठीक है 
 पान वाले के स्टूल पर बैठ गया और जूते दे दिए उसको । झोले से पालिश और ब्रश निकाल कर वो अपने काम में लग गया । इधर चौबे कहने लगा तिवारी जी मेहनती लड़का है । बाप रिक्शा चलता था कई रोज हो गए कोई कार चढ़ा दिया तब से लाचार हो गया बेचारा , महतारी बाप दो बहन और ये है । दो तीन रोज से आ रहा है । मैंने कहा ऊंची जात के हो पालिश करोगे कि स्टेशन में , गाड़ियों पान मसाला बेचोगे ? बोला - मुझे पैसा जोड़ना है पान मसाला बेचते बेचत खाब आई गया तो .. पालिस कर लूँगा । .... उसकी कहानी सुनता जा रहा था और उसके काम को देखता जा रहा था । नौसिखिया था , पर था मेहनती उसी आस्तीन से जूता और उसी से माथे का पसीना पोंछता जाता था । पालिश हो गयी थी फिर भी आस्तीन रगड़े जा रहा था ..... आखिरकार मैंने ही रोका उसे , जूते पहन कर ' ये लो 10 रूपये मेरे पास खुले नहीं है 5 बाद में दे देना ' मै चल दिया । वो बोला - अभी देता हूँ बाबूजी ... मैं मुड़ा और मन में आया कि कह दूं कि रख ले लेकिन तब तक उसकी छोटी हथेली में 5 का पालिश लगा सिक्का मेरे सामने चमक रहा था ।  

शाम को जब लौट कर आया तो वो वही बैठा अखबार पढ़ रहा था । बड़ा अच्छा लगा । मैंने पूंछा कितने तक पढ़े हो ? स्वर में निराशा लिए वो बोला - 6 में पढ्ता था ... और चुप हो गया । मैंने पूंछा पढना अच्छा लगता है ? उसके ' हाँ ' आँखों और मुस्कान में जो एकरूपता थी वो सीधे ह्रदय में लगी मैंने मन में ठान लिया कि सोमवार को इसकी पढाई की व्यवस्था करूंगा और परिवार में कुछ पैसे आयें उसकी भी .... 

आज सोमवार था ... चौबे पान लगा रहा था और मेरी नजरें उसे खोज रहीं थी । 
चौबे - का हुआ तिवारी जी ? 
 - वो लड़का नहीं दिख रहा आज 
चौबे - वो सेठ साहब है न पेट्रोल पम्प वाले वो ले गए उसको कह रह थे मेहनती लड़का है दिल्ली में बहन के घर नौकर नहीं है तो काम करने भेजेंगे .... 
समझ नहीं आ रहा था किसे कोसूं खुद को या नियति को ... सोच में डूबा था तभी
तिवारी जी ... तिवारी जी ... का हुआ ? ये लीजिये पान चौबे बोला ...
पैसे देने को जेब में हाथ डाला और चौबे को दिया  वो वही 5 का सिक्का था , महज एक 5 का सिक्का। पर आज पूरी जेब खाली लग रही थी - मलंग ©


Saturday, September 14, 2013

जानती हो 
अब मैं होना चाहता हूँ 
लालची , लोभी , स्वार्थी 
समेट लेना चाहता हूँ
तुम्हारी पूरी दौलत
वो दर्द
वो बेबसी 
वो अकेलाप
न सिसकती रातों के 
टूटे हुए ख़्वाब 
तपाते आंसुओं में बह चुके
अरमानों की स्मृतियाँ 
जिन्हें तुम सहेजे रखे हुए थी 
बरसों से 
बिना बताये बिना जताए 
खाली कर दो अपना कोश 
क्योंकि फिर बसाने है मुझे इनमे अरमान
भरने है मुझे इसमें बहुत से सपने ,
अनगिनत आशाएं 
और थोडा सा मैं ..©

Friday, September 13, 2013

बस तुम्हारे लिए ...

 नहीं है मेरे पास बीघे 
एकड़ हेक्टेअर जमीन 
है तो बस
एक गमला जमीन 
तुम्हे लगाने के लिये ;

जानता हूँ तुम बढते हो
बिना जताए  बिना बताये 
सूख जाते हो इसीलिये शायद 
पर मैं 
सच की खुरपी से गहरा खोदूंगा
ताकि विश्वास रूपी जड़े 
अच्छे से विकसित हो पायें 
उसमें रख कर डालूँगा 
सपनों का पानी 
दूंगा तुम्हे स्थायित्व  
निरंतरता की धुप  
खड़ा होने के लिए दूंगा 
तुम्हे शरीर का संबल 
और जीवन रूपी समय 
बस बदले में 
मेरे गमले में जमा लेना 
अपने अस्तित्व की जड़े 
और पल्लवित हो जाना 
क्योंकि तुमसे 
फूल फल नहीं चाहिए 
खुशबू भी नहीं चाहिए 
तुम उससे भी बढ़कर 
दोगे मुझे कुछ... हाँ प्राण वायु  ।  © 

Thursday, September 12, 2013

कल्लू जमादार नहीं रहा । .... अरे ज़मादार था बूढा था इतना सोचना क्यों ? ..... सोंचना पड़ता है भई ... सर्दियों की वो कोहरे वाली सुबह जब हांथ शरीर से अलग नहीं किये जाते तब रजाई में धीमे स्वरे में सुनायी देती उसकी झाडू .. गर्मियों की धूल भरी शाम टूटे सूखे पत्तों के साथ मिल कर पंचम स्वर में गाती उसकी झाडू कर्मंडेय वाधिकारस्ते को चरितार्थ करते हुए बस यही आवाज निकालती थी ' कर .. कर ... कर ... कर '  ©
दोपहर थी 5 साल का वसु माँ के हाथ को तकिया बनाये लेटा था । कमरे में  वात्सल्य चरम पर था- बेटे में बातचीत का दौर जारी था ... । 
- मम्मा वो उस दिन सब हमारे घर पे क्यों आये थे ?
- पार्टी थी बेटा । वो तुम्हारे डैडी को मैडल मिला इसलिए । 
- मैडल मिलता तो पार्टी होती ? 
- हां ( माँ मुस्कुरा कर बोली ) 

कुछ महीने बाद *** 

गुप्ता जी के यहाँ आज बहुत भीड़ थी । मिसेज गुप्ता ने पिछले महीने एक सुन्दर से बच्चे को जन्म दिया । आज उसकी खुशी में दावत थी ... 5 साल का वसु भी बहुत खुश था चहक रहा था । दौड़ भाग मचाये था ... गुप्ता जी के दोस्त उसे पकड़ कर दुलराते हुए बोले - वसु बेटा आपके घर में आज क्या है ... वसु - पार्टी है .. मेरी मम्मा को मैडल मिला है - मलंग ©

Wednesday, September 11, 2013

कुछ दिन से उसके मेसेज , काल्स आना बंद हो गए थे । वो फ़ोन करता तो काट दिया जाता ..। आज आफ़िस से छुट्टी ली हुई थी उसने ... रात में 12 बजे फ़ोन किया तो कोई रेस्पोंस नहीं मिला इसलिए सुबह सुबह गुलाब का पूरा गुच्छा ( उसे बहुत पसंद थे न ) लेकर उसके घर पहुँच गया उसे जन्म दिन विश करने ... दरवाजा खोलते ही वो बोली क्यों आये हो इतनी सुबह , पागल , यूं आर एन इडीएट , ए साईको . लोग सही कहते हैं . फॉर गाड्स सेक लीव मी एलोन खुद तो किसी लायक नहीं हो 10000 कमाते हो तुम्हारा खुद का कोई फ्यूचर नहीं है मुझे क्या दोगे ....गो टू हेल ... और दरवाजा बंद हो गया । न जाने क्यों वो अभी तक दरवाजे पर खड़ा था ... तभी अन्दर से आवाज आयी । हेलो सर ... थैंक्यू .. इतना लेट विश कर रहे हैं आप , आप से तो ऐसी उम्मीद नहीं थी ......... अच्छा अच्छा बहाने मत बनाइये ..... मेरी तीनो पोएम्स छाप रहे हैं न आप ? .......
 फूल वही रख कर वो चल दिया ... अन्दर के आख़िरी शब्द जो कानों में पड़े .... " हाँ बाबा उसी रोमांटिक नावेल पे ही काम कर रही हूँ " ....  ©

Tuesday, September 10, 2013

जाम ...

चलो चलो सब ... जाम खुल रहा है । सबने चैन की सांस ली ; रात से जाम लगा था आखिर .. भूखे प्यासे थके लोगों में एक नई स्फूर्ति आ गयी . सब गाडियां निकलने की आपाधापी में लग गए । घटना स्थल पर दोनों ट्रक जिनका आपस में टकराव हुआ था एक तरफ पलटे पड़े थे ... उन्हें देख कर " पक्का साले दारूपीकर चला रहे होंगे , तभी लड़ गए , बड़े कमीने होते हैं ये ट्रक वाले , पूरी रात खराब हो गयी इनकी वजह से " - गुजरने वाला हर दूसरा आदमी यही कह रहा था ... वही सड़क के बाईं तरफ खून के छींटे से सने अख़बार में लिपटा ' बेबी सूट ' , एक तरफ लुढका हुआ टूट चूका लकड़ी का वाकर , उसके साथ ही जमीन पर पड़ा तीन घंटियों वाला झुनझुना जिसकी एक घंटी निकल चुकी थी ... अपनी किस्मत पे रो रहे थे . एक पिता के प्रेम , खुशी को व्यक्त करने से वंचित रह गये थे तीनो ...... ©


काफी संघर्ष करने के बाद उसे स्थायी नौकरी नहीं मिली । वो प्रयास अब भी कर रहा था लेकिन अपने खर्चों के लिए उसने साधारण वेतन पर एक सामान्य से विद्यालय में प्रवक्ता बनने का निश्चय किया ।

- और सुना यार कैसा जा रहा तेरा टीचिंग एक्सपीरिएंस ? 

- बढ़िया ... पर बच्चों को कुछ पता ही नहीं कोर्स के नाम पे पिछली क्लासों में - कुछ पढ़ाया ही नहीं गया उनको .. मैंने तो अतिरिक्त कक्षा के लिए कहा है नहीं तो कोर्स भी पूरा न हो पायेगा ।

- तुम क्या हो यार ? अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मार रहे । कोर्स पूरा नहीं था तो उन्हें घर पे कोचिंग दे देते । बहुत फायदा होता ...

- अरे पर ...

- क्या अरे पर .. इस आदर्शवाद से पेट भी नहीं भरेगा । " तेरा कुछ नहीं हो सकता " .... - मलंग ©


ट्रेन सरपट भागी जा रही । सामान्य श्रेणी के डिब्बे में राजनीति , धर्म , आध्यात्म , जीवन दर्शन , विज्ञान , खेल को समेटे एक खुली चर्चा चल रही थी । किशोर , युवा , वृद्ध , अधेड़ सब अपने अपने विचार रख रहे थे । खिड़की से बाहर शून्य में झांकता हुआ सा वो ... बीच बीच में हर विषय पर जानकारी पूर्ण और सटीक टिप्पणी कर देता ... ... इतने कम समय में ही उसकी योग्यता / विद्वता के सब कायल हो गए थे .. ऐसा लगने लगा कि कोई ऐसा विषय नहीं जिसका वह ज्ञाता न हो हर विषय पर बोल सकता था वो . फिर अचानक एक वृद्ध ने जिज्ञासावश पूँछ लिया कि - बेटा आप करते क्या हैं ? ...उसके पास कोई जवाब नहीं था । आखिर एक बेरोजगार जो था ....- मलंग ©
- अच्छा तुम्हे कैसे गाने पसंद है ? हूँ इज योर फेवरेट सिंगर ? 
- रोमांटिक .. ग़ज़ल भी सिंगर तो कई पसंद है .. जैसे शान सोनू निगम जगजीत सिंह.. और आपको ? 
टीवी पर आ रहे गीत ' पहली पहली बार बलिये दिल गया हार बलिये ' की वोल्यूम बढ़ाते हुए बोला .... मुझे भी ... 
 पार्श्व में पूजा करते पिता की आवाज भी आई ' सुबह सुबह टीवी और उस पर इतनी तेज फ़िल्मी गाने कौन चला रहा है मयंक की मम्मी कोई आया है क्या ' ? - मलंग  ©

Monday, September 9, 2013

" देखो रामायण नहीं राम चरित मानस पढी होगी तुमने । रामायण तो घरों में बहुत कम होती पर मानस तो लगभग हर घर में पाई जाती । ' दिनकर जी को तो तुमने पढ़ा ही होगा कुरुक्षेत्र रश्मिरथी जैसे काव्य सो काव्य .. गद्य साहित्य भी गजब का लिखा संस्कृति के चार अध्याय शुद्ध कविता की खोज आदि ... अच्छा पुराने गाने पसंद है तुम्हे ? मैंने जो लिखा था ' कई बार यूं ही देखा है ' वो तुम्हे मुझसे ही पहली बार पता चला था न ... कैसा लगा बताओ " बकर बकर करते करते उसने देखा कि वो चेहरे पर मुस्कान , आँखों में मन की चीज मिलने की खुशी की चमक लिए अपनी चेहरा हाथों में टिकाये बस उसे ही देख रही है ... उसकी आँखों में झांकते ही उसे सारे उत्तर मिल गए । पर एक पल उसकी आँखों में देखने के बाद उसने नजर हटा ली ... परिवार , समाज , जाति , कुल , गोत्र , आर्थिक स्थिरता , कुलीनता संबंधी भावी प्रश्नों ने उसके दिमाग में जगह बनाना शुरू कर दिया था .... - मलंग ©

Sunday, September 8, 2013

-तिवारी जी गुड मार्निंग ..

- गुड मार्निंग मंसूरी साहब .. आज लेट कैसे हो गए ? 

- रात बेगम के भाई की बेटी को लेकर परेशान रहा ... मुजफ्फरनगर में है न वो जाकिया ...

- वहां के हालात तो बेहद खराब है , ज़ाकिया लोग ठीक तो हैं न ? 

- हां ठीक तो हैं ... पर आप तो जानते हैं न दंगे बड़े गहरे जख्म दे जाते ... सियासी खेल होंगे अब इस पर लोग भूलना चाहे तो भी जख्म कुरेदे जायेंगे बे वजह बेगुनाह परेशान होंगे 

- मंसूरी साहब ... जिस शहर में दंगे होते वहाँ बेगूनाह कोई नहीं ... लोग कहते है की दंगे सियासी लोग करवाते ... हम नहीं मानते । चार सफ़ेद पोश आये चार बातें की और आप चले एक दूसरे का कत्ले आम करने ... जनाब बड़े बुजुर्गों को चाहिए नहीं कि अपनी औलादों रिश्तेदारों को ये सब करने से रोकें ... सच पूछिए तो दंगो में ही शराफत और मोहब्बत की परीक्षा होती ... - मलंग ©.
' नमस्ते ... अपनी बात किस तरह कहूं समझ नहीं आ रहा । बस ये जान लीजिये कि रोज रोज आपकी प्रोफाईल देखता हूँ । आपकी प्रोफाईल पिक्चर ओपन है उसे निहारता रहता हूँ । जानती हो आपके कवर पर लगे चित्र में जैसे अँधेरे में चाँद चमक रहा है । ठीक वैसे ही आपके मुस्कुराते चेहरे में आपकी आँखे चमकती हैं । आपकी प्रोफाईल में आपके रोज रोज आपके वही वर्क प्लेस , वर्क पोस्ट पढता हूँ लेकिन फिर भी उमंग से भर जाता हूँ । आपका सानिध्य चाहता हूँ । आपको सोचता हूँ । आपसे बातें करना चाहता हूँ । आपको जानना चाहता हूँ ? क्या आप मेरी ' तुम ' बनेंगी ? ' लिखा और साथ में ' कई बार यूं भी देखा है ' गीत का वीडियो अटैच किया लेकिन send बटन दबाने से पहले ही उसे याद आगई उसे अपने अतीत के कुछ सच ... जो शायद 'सभ्य' समाज में स्वीकार्य नहीं होंगे और जिन्हें छिपाने को उसकी अंतरात्मा कभी नहीं कहेगी । क्योंकि आत्मा पर झूठ का बोझ बहुत भारी लगता है ..... - मलंग 

Saturday, September 7, 2013

सरकारी खजाने में गबन के कारण पिता जेल में था चौराहे पर उसका लड़का सुनील फल का ठेला लगाने लगा था । शर्मा जी हर रोज आते और एक किलो सेव ले जाते । न बरसात की चिंता न गरमी की , न कोई मोल भाव , न कोई बात बस सेव तुलाते ले जाते छः महीने से ऊपर हो गए थे । पर 10 दिन हो गए सेव लेने वो नहीं आये । फिर अचानक एक दिन 18-19 साल का लड़का आया सुनील को एक हजार के नोट की 2 गड्डी दी और बोला - पापा ने देने को कहा था । तुम्हारे पिता का कर्ज था उन पर , पापा की गवाही के कारण ही उन्हें सजा हुई । सुनील का चेहरा तमतमा उठा । आँखे लाल हो गईं । रूपये की गड्डी को फेंकते हुए वो लड़के का गिरेबान झकझोरता हुआ बोला - तो वो तेरा बाप था ? कौन था वो ? वो कमीना खुद क्यों नहीं आया ? लड़का - (गहरी सांस लेते हुए ) वो अब इस दुनिया में नहीं है । लाल बाईक से जिसपे ' रोहित ' लिखा था सेव लेने आते थे वही थे .... सुनील के हाथों से गिरेबान छूट गया और लाल आँखों में पानी और अविश्वास उत्पन्न हुआ और मुंह से अनायास ही निकल पड़ा - अरे नहीं .. कैसे ? ( निरंतरता से बने सम्बन्ध भी प्रेम की तरह प्रगाढ़ होते है ) ©.

Friday, September 6, 2013

नई उम्मीद

न्यूज चैनल की वैन सरपट दौड़े जा रही थी । गांव जाकर रुकी आखिर रेल बजट में आज नई रेलवे लाईन की घोषणा हुई थी । गांव वाले भी खुश थे । पत्रकार सबसे पूँछ रहा था कि इस रेलवे लाइन से क्या उम्मीद आसरा लगाए हो । कोई यातायात की सुलभता बताता तो कोई कृषि व्यापार में बढ़ोत्तरी की । घुरई से पूंछा कि रेलवे लाइन पास हुई तुम क्या उम्मीद आसरा लगाए हो ? घुरई - बहुत आसरा लगाए हूँ बाबूजी । ठाकुर साहब के खेत में हगत हगत ( शौच करते करते ) बहुत दिन हुई गए अब रेल पटरी के किनारे आराम से करिहौं ....  ©
- अम्मा री मोय मेई साल गिरा पे रिमोट वाई कार दिबाये दियो 

- लल्लू रे जे रिमोट वाई कार का होवे ?

-  रिमोट वाई कार बड़ी चोखी होवे , बड़े बाबू को छोरा आगरे ते लाओ है । बाये दूर ते ही चालानो पडत । बड़ो मजा आवे

- दूर ते काये चलावों पड़े ? बामे बैठवे को न होत का कछु ? तेये बापू तो टिरेक्टर बैठ के ही चलावे ...

- बापू ठीक कहे है तू निपट गंवार ही रहेयी ... मैं जाय रओ खेलवें ( भाग जाता है )

- सही कहे छोरा निपट गवांर ही रहूँ मैं न तेयो बापू कछु समझाये पाओ न तू ...... आय रई हूँ काये मरी जाय रही है ( रंभाती भैंस को पानी पिलाने लगती है ) - मलंग 
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- एक लोहे की ग्रिल बननी है है
- बन जायेगी मास्टर साहब
- ये लो नाप 
- कितना खर्च आएगा 
- यही कोई 1500 रूपये 
- ठीक है मिलेगी कब 
- कल मिल जायेगी 
- ठीक है मैं कल आऊँगा कुछ एडवांस चाहिए
- कल ही ले लूंगा मास्टर साहब 
- ठीक है
- मास्टर साहब चाय पिए जाईये 
- नहीं तुम लोग पियो 
- अरे मास्टर साहब पी लीजिए अब आ गयी है ।
 मास्टर जी ( हसते हुए ) - पैसे के मामले में गणित सही है तुम्हारी पर चाय के मामले में गड़बड़ा गयी । चाय चार गिलास ही हैं और मुझे मिला कर पांच लोग .. वैसे भी आर्डर तुमने मेरे आने से पहले दिया फिर मेरे लिए चाय कैसे आयेगी ?
- मास्टर जी पैसों में व्यापार वाली गणित लगाता और चाय में सत्कार वाली ... हम चारों तीन की चार कर लेंगे आप पूरी ले लीजिये ..... - मलंग 

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