मैं कैसे अस्तित्व में आया ये कोई लम्बी महान और बड़ी कहानी नहीं है और न ही किसी प्रसव काल से जुडी , दो भिन्न व्यक्तित्वों शरीरों आत्माओं को स्वयं में समिष्ट किये मुझे आगे बढ़ना था , पर वो होता है न आपके प्रशंसक आलोचक दोनों ही मैदान में होते हैं , मेरे भी थे । अब मुझ पर बोझ बढ़ाया जा रहा था आलोचक ढोना चाहते थे मुझ पर अपनी परम्पराओं प्रतिष्ठाओं को तो प्रशंसक महानताओं को अपेक्षाओं को ...मैं अब रेंगते हुए बढ़ रहा था लेकिन वो हार गया , वो तड़प कर रह गयी , और मुझे बे मौत मरना पड़ा । अब मेरे नसीब में बस दोनों के आंसू रूपी कफ़न था जिसे उन्होंने ' दोस्ती ( lets remain friends ) ' का नाम दे दिया ..... - ' ढाई अक्षर की लाश ' आत्म कथा से ©
.............कब यहां अमर विस्वास , अमिट है कब आस्था ? बस एक शून्य जिसमें होता सब कुछ विलीन , आबद्ध परिस्थिति - मनोवृत्ति की सीमा से , मै जो लिखता वह सब कितना अर्थहीन !
Tuesday, December 24, 2013
Thursday, December 19, 2013
कोशिश करने वालों की ...
हिन्दी साहित्य में गजब रूचि थी बन्दे की , प्रेरणादायक कविता ख़ास तौर से ' कोशिश करने वालों की हार नहीं होती है ' तो श्री मुख से ऐसे निकलती थीं जैसे प्लेटफार्म पर ' चाय गरम चाय ' का स्वर ... बी.ए. हिन्दी फर्स्ट इयर की बात है ... नीली साईकिल वाली लड़की पर दिल आ गया पर कहने मे डरे ... गर्मी में ताल पोखरे सूख जाते वैसे ही आत्म विश्वास सूख जाए .... दोस्त के काम दोस्त न आये ऐसा हो सकता है भला ... आत्म विश्वास प्रेम की महानता के झाड पर चढ़ा कर ' कोशिश करने वालों की हार नहीं होती है ' का इंजेक्शन लगाया हमने तो बन्दे में आत्म विश्वास बरसात में शहर में भरे पानी की तरफ उफनाने लगा .... ' हे पिकबयनी हे मृगनयनी ' घोट कर पीगया बंदा , खुश इतना कि ऐसा लगने लगा कि ये मुस्कराहट महानगर की स्ट्रीट लाईट की तरह अब शायद कभी न बंद हो ... अगले दिन हिन्दी की क्लास नहीं आया बाहर मिला तो चेहरे की रोशनी ऐसे गायब जैसे मंत्री आने के बाद एक महीने तक गाँव में बत्ती न आई हो ... बहुत पूंछने पर बोला हमारी समझ में आ गया कि कोशिश करने वालो की न हार होती है न लड़की .. मार होती है , वो नीली साईकिल जीव विज्ञान वाली थी पिकबयनी मृगनयनी सुनते ही ' रसीद ' दे दी ... ©
Tuesday, December 3, 2013
जुबाँ
Sunday, December 1, 2013
Thursday, November 28, 2013
भीष्म
Tuesday, November 26, 2013
सुचालक
Tuesday, November 19, 2013
अमर प्रश्न
Monday, November 18, 2013
विजय -पराजय
Thursday, November 14, 2013
Wednesday, November 13, 2013
क़र्ज़
दोपहर ढलने को थी अनीस सड़क के उस पार लघुशंका करने गया ही था कि ठेले पर ग्राहक देख कर वापस लौटने को हुआ पर सड़क पर आते ही एक तेज रफ़्तार suv ने उसका काम तमाम कर दिया । .... महीने बीत गए पांडे अब निलंबित चल रहा । आखिर धमकी और लाखों के प्रलोभन के बावजूद भी उसने उस ' किशोर चालक ' को शिनाख्त परेड में पहचान लिया था । और तो और सुना है कि ' नमक ' का कर्ज़ उतारने वाले को आज कल बेटी की शादी के लिए क़र्ज़ नहीं मिल रहा ..... ©
Monday, November 11, 2013
वरदान
Saturday, November 9, 2013
अग्नि परीक्षा
Tuesday, November 5, 2013
उजाले की विरासत
Friday, November 1, 2013
आज बाज़ार जाने वाले लोग
जाते हैं समर्पण के साथ
मन में बिठा कर ये
कि धन तेरस है
और बाज़ार में बैठे लोग
अधिकार समझते हैं
आपके समर्पण को
क्योंकि धन तेरस है । :)
Tuesday, October 29, 2013
अंतर
Saturday, October 26, 2013
गुलफाम का बाप बोला - ' रुक मैं भी आता हूँ ' ...... दोनों ने मिलकर जल्दी से सभी बकरियों को आड़ में किया और गड्ढे की ओर वापस लौटने लगे । पर माँ को न जाने कहाँ से पड़ोसी रउफ का मेमना गोलीबारी से सहमा हुआ इधर उधर भागता दिखाई दिया । ' उसे आड़ में नहीं किया तो कही वो गोली के निशाने में न आ जाए ' ये सोच कर उसकी ओर बढ़ी ही थी एक गोली उसकी पीठ से घुसते हुए सीने से निकल गयी । वो बेजान क्षत विक्षत पडी थी गुलफाम का पिता संवेदना रोष और शोक का सागर बना , रोते चीखते बच्चों को सम्हाले गड्ढे में खड़ा यही सोच रहा था ' गोली ने उसकी नीयत का भी लिहाज नहीं किया ' .... ©
Wednesday, October 23, 2013
ये सब पढ़कर उसके अंतर्मन में विचारों के बादल आज पूरे वेग से बरस रहे थे , लगा परम्परा आस्था प्रेम रूपी बस्ती को बहाने से आज कोई नहीं रोक सकता .. इस मूसलाधार बारिश से दुबक कर थक कर कब नींद लग गयी पता ही न चला .... और जब सपना टूटा नींद खुली तो पाया हामिद और अमीना जा चुके चुके थे । लेकिन तीन पैसे का चिमटा और अमीना के प्रेमाश्रु छोड़ गए थे .... न जाने क्यों आज वो गोवर्धन थामे कृष्ण जैसे लग रहे थे । ©
Monday, October 21, 2013
Sunday, October 20, 2013
ज़र्रा ज़र्रा कतरा कतरा ही सही
जिन्दगी में आती रहना ।
दरख्त है पतझड़ उजाड़ कर जाते
बनके बहार का मौसम शाखों पर
जिन्दगी में आती रहना
तन्हाईयों में धड़कना बंद सा कर देता है जालिम
नफ़स की डोर हो तुम
जिन्दगी में आती रहना
आशिक हूँ माबूद की जूस्तजू में फिरता
जौ दैर-ए-दिया का बनके
जिन्दगी में आती रहना ...... ©
---------------------------
नफस - सांस
माबूद - आराध्य
जौ दैर-ए-दिया - मंदिर के दिए का प्रकाश
Saturday, October 19, 2013
घिस चुकी जीवन की पाटी पर
मैं लिखता हूं
मृत्यु की बातें
अंत की बातें
अवसान की बातें
क्योंकि
मुझे विश्वास है मृत्यु पर
साझा करेगी एक दिन
मेरी आत्मा पर पडा
पापों का बोझ
अन्तर्मन की कलुषितायें
हृदय की वेदना
और सत्य का रोष
असफ़लता , जडता
मूर्खता , धृष्टता
उज्ज्वलता , प्रखरता समेत
आत्म मूल्यांकन का सारा कोष
और बदले में देगी
मुझे एक सुप्त मुस्कान
जब तक दुबारा निकल न जाऊं
मैं उसके साथ जीवन की खोज पर । ......©
Friday, October 18, 2013
बात विज्ञान की करें तो विश्व के हर कोने में आईन्सटीन , न्यूटन के प्रतिपादित सिद्धांत पढाये जाते / सिखाये जाते ? क्या हम सच में उन्हें सीखते ? नहीं हम बस उन तक सीमित होकर उत्तर पुस्तिका में उनका उपयोग करते । हम इन सिद्धांतों को तब तक सीख नहीं पायेंगे जब तक हम उनके प्रतिपादन में लगी जिज्ञासा परिश्रम असफलता लगन को अपने स्तर से नहीं जियेंगे ।
कला और साहित्य के क्षेत्र में ही देखिये । नवांगतुक रचनाकारों को प्रसिद्ध रचनाकारों को पढने और सीखने का सुझाव देते लोग मिल जायेंगे । पर क्या वो सही है ? क्योंकि पढ़कर सीखने की कोशिश से हमारी रचना शैली और वैचारिक स्तर प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता ? तो फिर हमने जो सीखा वो अनुकरण ही हुआ न ?
सृष्टि में मानवीय विकास के चरणों में आग जलाना सबसे बड़ी खोज माना जाता है ? सृष्टि के उस पहले पुरुष ने आग जिज्ञासा आवश्यकता के वशीभूत होकर जलाने के अनगिनत असफल प्रयास किये होंगे तब जाकर उसे सफलता मिली होगी । पर साथ ही उसे पत्थर रगड़ते रगड़ते भिन्न भिन्न पत्थरों के अन्य उपयोग इनकी कठोरता भी समझ आई होगी । उसे ये सब किसी सीखने की लालसा से नहीं मिला । उसे ये सब करने के प्रतिफल स्वरूप मिला । इसलिए सीखने की वैशाखी छोडिये और लक्ष्य के मनोविज्ञान से बचिए और खोजने / जिज्ञासा के जूते पहन कर निकल पड़िये ...
Wednesday, October 16, 2013
Tuesday, October 15, 2013
क्रीज जमे परिधान
चमकते जूते
रोज एक सी आने वाली खुशबू
डीसेंट हेयर कट
और एक चिपकी सी मुस्कान
मुझे नहीं भाता है दृढ़ता
विचारधारा वाद ज्ञान की पगडंड़ियों
पर रोज रोज चलना
मेरे लिए जीवन नहीं है बस
जूते की एडियाँ घिसना
शायद इसीलिये तुम पाओगे
मेरे जूतों को कम घिसा पर
मिट्टी से गोबर से रेत से भरा
तले में धसे कांटे
जिनसे कभी खून था उभरा
हां मैं ऐसा ही हूँ
उधडी हुई नेकर पहने
गालों पर बहे आंसू के निशान लिए
छिले हुए घुटनों के साथ
फिर से खेलने जाने की जिद करते बच्चे जैसा ... ©
Sunday, October 13, 2013
Friday, October 11, 2013
Thursday, October 10, 2013
कभी फुहार बनकर
कभी किसी के सामने
कभी सूने में
छिपा रहता हूँ कभी
दृग के कोने में
चिता को सुखाने
विरह को गलाने
दर्द को जताने
प्रेम दर्शाने
आशा में निराशा में
हर्ष में उल्लास में
मैं निकल आता हूँ ....
कभी रूमाल से
कभी बस गाल तक
खुद की आस्तीन से
माँ के आँचल तक
कभी हथेलियों से
यारो की हथखेलियों से
अक्सर रोका जाता हूँ मैं
पर मैं नहीं हूँ
कमजोरी या
निर्बलता का प्रतीक
मैं प्रतीक हूँ
पवित्रता का
प्रबलता का
ह्रदय की ...
©
- तुम भी तो किसीके इनबाक्स में ऐसे ही नियमित रूप से अपनी इच्छाओं आकांक्षाओं दावो को प्रकट करते हो ...
- नहीं नहीं मेरा प्रेम शारीरिक नहीं है मैंने कब की प्रणय संबंधी याचना ?
- पर ये जैसे कर रहे तुम भी वैसे ही करते हो न .. मैं कैसे मानू ?
कहने वाला था कि मैं नैतिक हूँ पर रेम्बू याद आगये ' नैतिकता दिमाग की कमजोरी है ' ... मौन ताड़ कर प्रतिरूप बोला - बोलो बोलो ... चुप क्यों हो गए ? ... नीत्शे विनोबा कीट्स टैगोर सब याद आ रहे थे पर मौन थे शायद उनका मौन कह रहा था कि अपने सच के लिए हमारा इस्तेमाल क्यों करना चाह रहे हो ।
प्रतिरूप अग्नि सी कठोरता लिए बोला - ' अपने प्रेम का प्रमाण दो मुझे या उसे परेशान करना बंद करो । ' उस पल लगा स्वयं को ही स्वयं के सच का प्रमाण देने से बड़ी परीक्षा कोई नहीं हो सकती .... प्रतिरूप अभी भी मुझमे झाँक रहा था .....' सच को भी भला प्रमाण देने की आवश्यकता होती है ' सोचते हुए न जाने क्यों आँखों ' डूबने ' लगी ... आँखे बंद ही करी थी कि उसका ' पीली बिंदी वाला मुस्कुराता चेहरा ' चमक उठा । <डिंग> नोटिफिकेशन की आवाज आयी तो आँख खुली । प्रतिरूप स्मार्ट फ़ोन की ' प्रदीप्त ' हो चुकी स्क्रीन से गायब था और आज महीने भर बाद मैसेंजर एप पर उसका सन्देश था ... ' :) ' । ©
Wednesday, October 9, 2013
प्रतिस्पर्धा
Tuesday, October 8, 2013
मैं छपना भी नहीं चाहता
किताबो में
अखबारों में
इतिहास में
तोड़ देना चाहता हूँ अपना कलम
उकेरना चाहता हूँ
खुद को अपनी उँगलियों से
माँ के तलवे पर
तुम्हारी अधरों पर
नन्ही हथेलियों पर
गाय के गले पर
नदी की धारा पर
सुबह की गीली घास पर
लहर बहा कर ले जाए उस रेत पर
कीचड पर मिट्टी पर
पुष्प की पंखुड़ी पर
बबूल के शूल पर
पसीने से भीगे श्रमजीवी के अंगोछे पर
किसान के हंसिए पर
जमादार की झाडू पर
भंगिन के मैला उठाने वाले तसले पर
पत्थर पर
रोटी पर
धुल से सनी खिडकियों पर
और चिता की राख पर .....
©
Monday, October 7, 2013
केमिकल लोचा
धुंध में छिपे
पर्वत सरीखा हो रहा है
तुम्हारा मौन
तुम्हारे लिए बस
सिमटकर बन गया हूँ मैं ' कौन '
थक रहा हूँ , टूट रहा हूँ
कदम दर कदम
पर जूझूंगा , चलूँगा
सत्य को शिखर तक पहुँचाने को
नापूंगा गहरी घाटियाँ
बढ़ाऊँगा शब्दों के छोटे छोटे कदम
प्रतिध्वनित होती आवृति
इन शब्दों की
कुछ नहीं बस होगी
प्रमाण ' गहराईयों ' का ... ©
Saturday, October 5, 2013
डायन
Wednesday, October 2, 2013
तुम हर साल आ जाते हो ?
क्या मिलता तुम्हे हर साल आकर ?
रटे रटाये भाषणों में
नैतिकता के पाठ ,
देखे दिखाए नाटक ,
एक दिन का ड्राई डे ?
एक सरकारी छुट्टी और
पूरे दिन निर्बाध बिजली की आपूर्ति ?
बस इसीलिये आते हो ?
सुनो 2 अक्टूबर
तुम्हे सच के उस योद्धा की कसम
तुम अब मत आना
अब तब तक मत आना
जब तक कोई नोट गिरने
खोने , न मिलने से ज्यादा
झूठ बोलने का दुःख न मनाये .... ©
Tuesday, October 1, 2013
Monday, September 30, 2013
" न्यायिक प्रक्रिया में शिथिलता दूर हो ,
अमा आप लोग कैसी बात करते है ।
ये जुवेनाईल फ्रेंडली constitution है ।
फैसले के लिए केस 18 का हो इसका भी इन्तेजार करते हैं । " ©
Saturday, September 28, 2013
ठेका देशी शराब
Friday, September 27, 2013
गरीब
फिर सुपरवाईजर की धमकाती हुई सी आवाज आयी - सुनो हर ट्रक से 10 - 10 बोरी बचा के छोटे गोदाम में रख देना । ऐसा ही किया गया ... पैसे लेकर सब चले गए तो भोला ने अकेले में सुपरवाईजर से कहा - बाबूजी थोडा गल्ला मिल जाई का रात हुई गयी है अब दुकान सब बंद हुई गयी .... गाडी के शीशे में अपना चेहरा अस्त करने से पहले सुपरवाईजर बोला - हराम का माल है , 200 रुपया पा तो गए हो ... साला तुम लोगों का कभी पेट नहीं भरता तभी गरीब हो । ....
कृत्रिम रोशनी की चमक में भोला को शीशे में अपना प्रतिरूप दिखा ही था कि गाड़ी फुर्र हो गयी .. .....
©
Wednesday, September 25, 2013
ब्रह्म राक्षस
Tuesday, September 24, 2013
Monday, September 23, 2013
( समोSहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योस्ति न प्रिय: ।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि तेषु चाप्यहम । ।अ-9 , 29
मैं सभी भूतों में समभाव से व्यापक हूँ न कोई प्रिय है न अप्रिय ; परन्तु जो मुझे प्रेम से भजते है ( प्रेम करते है ) वे मुझमें है और मैं भी उनमें प्रत्यक्ष प्रकट हूँ । ) - कौशल ©
Sunday, September 22, 2013
Saturday, September 21, 2013
Wednesday, September 18, 2013
तुम्हे दिए
अपने शब्द ,
फिर अर्पित किया
अपना चिंतन ,
फिर अपनी आस्था भक्ति और विश्वास
फिर अपनी मुस्कान और दिन
और अब निछावर कर रहा हूँ
तुम पर अपनी राते ,
नींद और सपने ।
जानता हूँ
बदले में कुछ नहीं मिलेगा ।
पर कम से कम मत मांगना
मुझसे मेरी साँसे
वो दो जोड़ी बूढ़ी
आसराई आँखों की अमानत हैं ... ©
मेरे लिए
न फूल हो
न कली
न बाग़ न उपवन
न नदी न झरना
प्रेम के प्रतीक जो मेरे
अग्रज दे गए हैं
उनमें से कुछ भी नहीं हो तुम
मेरे लिए
मेरे लिए
तुम हो
जगमगाने वाला
मन्दिर का दिया
दूर से ही सही
पर सुनाई देने वाली
घंटे की ध्वनि
तुम हो
मेरी आस्था की प्रतीक ... ©
Tuesday, September 17, 2013
प्रेम
Monday, September 16, 2013
दो - चार कहानी कविताएँ उस पर लिख कर और उनमे उसके like पाकर सोंचता था उसने उसे पा लिया । यहाँ तक तय कर लिया कि वो नहीं तो कोई नहीं ... पागल था ... पर प्रेम एक प्यास है जितना गहरा प्यार उतनी बड़ी प्यास । मिलन हो या विरह इस प्यास में बस आंसू ही पीने को मिलते । ( बस तुम्हारे इन्तजार में हूँ ... मुझे पता है तुम आओगी एक दिन मेरी कहानी पूरी करने ) । - कौशल
Sunday, September 15, 2013
खाली जेब ....
- कै पैसे लोगे ?
- 5 रूपया
- इतने ज्यादा ? तुम तो बड़े ठग निकले ( हंस कर कहा )
- जादा नहीं है बाबूजी , जूता बिलकुल चमका दूंगा
- अच्छा चलो ठीक है
पान वाले के स्टूल पर बैठ गया और जूते दे दिए उसको । झोले से पालिश और ब्रश निकाल कर वो अपने काम में लग गया । इधर चौबे कहने लगा तिवारी जी मेहनती लड़का है । बाप रिक्शा चलता था कई रोज हो गए कोई कार चढ़ा दिया तब से लाचार हो गया बेचारा , महतारी बाप दो बहन और ये है । दो तीन रोज से आ रहा है । मैंने कहा ऊंची जात के हो पालिश करोगे कि स्टेशन में , गाड़ियों पान मसाला बेचोगे ? बोला - मुझे पैसा जोड़ना है पान मसाला बेचते बेचत खाब आई गया तो .. पालिस कर लूँगा । .... उसकी कहानी सुनता जा रहा था और उसके काम को देखता जा रहा था । नौसिखिया था , पर था मेहनती उसी आस्तीन से जूता और उसी से माथे का पसीना पोंछता जाता था । पालिश हो गयी थी फिर भी आस्तीन रगड़े जा रहा था ..... आखिरकार मैंने ही रोका उसे , जूते पहन कर ' ये लो 10 रूपये मेरे पास खुले नहीं है 5 बाद में दे देना ' मै चल दिया । वो बोला - अभी देता हूँ बाबूजी ... मैं मुड़ा और मन में आया कि कह दूं कि रख ले लेकिन तब तक उसकी छोटी हथेली में 5 का पालिश लगा सिक्का मेरे सामने चमक रहा था ।
शाम को जब लौट कर आया तो वो वही बैठा अखबार पढ़ रहा था । बड़ा अच्छा लगा । मैंने पूंछा कितने तक पढ़े हो ? स्वर में निराशा लिए वो बोला - 6 में पढ्ता था ... और चुप हो गया । मैंने पूंछा पढना अच्छा लगता है ? उसके ' हाँ ' आँखों और मुस्कान में जो एकरूपता थी वो सीधे ह्रदय में लगी मैंने मन में ठान लिया कि सोमवार को इसकी पढाई की व्यवस्था करूंगा और परिवार में कुछ पैसे आयें उसकी भी ....
आज सोमवार था ... चौबे पान लगा रहा था और मेरी नजरें उसे खोज रहीं थी ।
चौबे - का हुआ तिवारी जी ?
- वो लड़का नहीं दिख रहा आज
चौबे - वो सेठ साहब है न पेट्रोल पम्प वाले वो ले गए उसको कह रह थे मेहनती लड़का है दिल्ली में बहन के घर नौकर नहीं है तो काम करने भेजेंगे ....
समझ नहीं आ रहा था किसे कोसूं खुद को या नियति को ... सोच में डूबा था तभी
तिवारी जी ... तिवारी जी ... का हुआ ? ये लीजिये पान चौबे बोला ...
पैसे देने को जेब में हाथ डाला और चौबे को दिया वो वही 5 का सिक्का था , महज एक 5 का सिक्का। पर आज पूरी जेब खाली लग रही थी - मलंग ©
Saturday, September 14, 2013
अब मैं होना चाहता हूँ
लालची , लोभी , स्वार्थी
समेट लेना चाहता हूँ
तुम्हारी पूरी दौलत
वो दर्द
वो बेबसी
वो अकेलाप
न सिसकती रातों के
टूटे हुए ख़्वाब
तपाते आंसुओं में बह चुके
अरमानों की स्मृतियाँ
जिन्हें तुम सहेजे रखे हुए थी
बरसों से
बिना बताये बिना जताए
खाली कर दो अपना कोश
क्योंकि फिर बसाने है मुझे इनमे अरमान
भरने है मुझे इसमें बहुत से सपने ,
अनगिनत आशाएं
और थोडा सा मैं ..©
Friday, September 13, 2013
बस तुम्हारे लिए ...
एकड़ हेक्टेअर जमीन
है तो बस
एक गमला जमीन
तुम्हे लगाने के लिये ;
जानता हूँ तुम बढते हो
बिना जताए बिना बताये
सूख जाते हो इसीलिये शायद
पर मैं
सच की खुरपी से गहरा खोदूंगा
ताकि विश्वास रूपी जड़े
अच्छे से विकसित हो पायें
उसमें रख कर डालूँगा
सपनों का पानी
दूंगा तुम्हे स्थायित्व
निरंतरता की धुप
खड़ा होने के लिए दूंगा
तुम्हे शरीर का संबल
और जीवन रूपी समय
बस बदले में
मेरे गमले में जमा लेना
अपने अस्तित्व की जड़े
और पल्लवित हो जाना
क्योंकि तुमसे
फूल फल नहीं चाहिए
खुशबू भी नहीं चाहिए
तुम उससे भी बढ़कर
दोगे मुझे कुछ... हाँ प्राण वायु । ©
Thursday, September 12, 2013
- मम्मा वो उस दिन सब हमारे घर पे क्यों आये थे ?
- पार्टी थी बेटा । वो तुम्हारे डैडी को मैडल मिला इसलिए ।
- मैडल मिलता तो पार्टी होती ?
- हां ( माँ मुस्कुरा कर बोली )
कुछ महीने बाद ***
गुप्ता जी के यहाँ आज बहुत भीड़ थी । मिसेज गुप्ता ने पिछले महीने एक सुन्दर से बच्चे को जन्म दिया । आज उसकी खुशी में दावत थी ... 5 साल का वसु भी बहुत खुश था चहक रहा था । दौड़ भाग मचाये था ... गुप्ता जी के दोस्त उसे पकड़ कर दुलराते हुए बोले - वसु बेटा आपके घर में आज क्या है ... वसु - पार्टी है .. मेरी मम्मा को मैडल मिला है - मलंग ©
Wednesday, September 11, 2013
फूल वही रख कर वो चल दिया ... अन्दर के आख़िरी शब्द जो कानों में पड़े .... " हाँ बाबा उसी रोमांटिक नावेल पे ही काम कर रही हूँ " .... ©
Tuesday, September 10, 2013
जाम ...
- और सुना यार कैसा जा रहा तेरा टीचिंग एक्सपीरिएंस ?
- बढ़िया ... पर बच्चों को कुछ पता ही नहीं कोर्स के नाम पे पिछली क्लासों में - कुछ पढ़ाया ही नहीं गया उनको .. मैंने तो अतिरिक्त कक्षा के लिए कहा है नहीं तो कोर्स भी पूरा न हो पायेगा ।
- तुम क्या हो यार ? अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मार रहे । कोर्स पूरा नहीं था तो उन्हें घर पे कोचिंग दे देते । बहुत फायदा होता ...
- अरे पर ...
- क्या अरे पर .. इस आदर्शवाद से पेट भी नहीं भरेगा । " तेरा कुछ नहीं हो सकता " .... - मलंग ©
- रोमांटिक .. ग़ज़ल भी सिंगर तो कई पसंद है .. जैसे शान सोनू निगम जगजीत सिंह.. और आपको ?
टीवी पर आ रहे गीत ' पहली पहली बार बलिये दिल गया हार बलिये ' की वोल्यूम बढ़ाते हुए बोला .... मुझे भी ...
पार्श्व में पूजा करते पिता की आवाज भी आई ' सुबह सुबह टीवी और उस पर इतनी तेज फ़िल्मी गाने कौन चला रहा है मयंक की मम्मी कोई आया है क्या ' ? - मलंग ©
Monday, September 9, 2013
Sunday, September 8, 2013
- गुड मार्निंग मंसूरी साहब .. आज लेट कैसे हो गए ?
- रात बेगम के भाई की बेटी को लेकर परेशान रहा ... मुजफ्फरनगर में है न वो जाकिया ...
- वहां के हालात तो बेहद खराब है , ज़ाकिया लोग ठीक तो हैं न ?
- हां ठीक तो हैं ... पर आप तो जानते हैं न दंगे बड़े गहरे जख्म दे जाते ... सियासी खेल होंगे अब इस पर लोग भूलना चाहे तो भी जख्म कुरेदे जायेंगे बे वजह बेगुनाह परेशान होंगे
- मंसूरी साहब ... जिस शहर में दंगे होते वहाँ बेगूनाह कोई नहीं ... लोग कहते है की दंगे सियासी लोग करवाते ... हम नहीं मानते । चार सफ़ेद पोश आये चार बातें की और आप चले एक दूसरे का कत्ले आम करने ... जनाब बड़े बुजुर्गों को चाहिए नहीं कि अपनी औलादों रिश्तेदारों को ये सब करने से रोकें ... सच पूछिए तो दंगो में ही शराफत और मोहब्बत की परीक्षा होती ... - मलंग ©.
Saturday, September 7, 2013
Friday, September 6, 2013
नई उम्मीद
- लल्लू रे जे रिमोट वाई कार का होवे ?
- रिमोट वाई कार बड़ी चोखी होवे , बड़े बाबू को छोरा आगरे ते लाओ है । बाये दूर ते ही चालानो पडत । बड़ो मजा आवे
- दूर ते काये चलावों पड़े ? बामे बैठवे को न होत का कछु ? तेये बापू तो टिरेक्टर बैठ के ही चलावे ...
- बापू ठीक कहे है तू निपट गंवार ही रहेयी ... मैं जाय रओ खेलवें ( भाग जाता है )
- सही कहे छोरा निपट गवांर ही रहूँ मैं न तेयो बापू कछु समझाये पाओ न तू ...... आय रई हूँ काये मरी जाय रही है ( रंभाती भैंस को पानी पिलाने लगती है ) - मलंग
©
- बन जायेगी मास्टर साहब
- ये लो नाप
- कितना खर्च आएगा
- यही कोई 1500 रूपये
- ठीक है मिलेगी कब
- कल मिल जायेगी
- ठीक है मैं कल आऊँगा कुछ एडवांस चाहिए
- कल ही ले लूंगा मास्टर साहब
- ठीक है
- मास्टर साहब चाय पिए जाईये
- नहीं तुम लोग पियो
- अरे मास्टर साहब पी लीजिए अब आ गयी है ।
मास्टर जी ( हसते हुए ) - पैसे के मामले में गणित सही है तुम्हारी पर चाय के मामले में गड़बड़ा गयी । चाय चार गिलास ही हैं और मुझे मिला कर पांच लोग .. वैसे भी आर्डर तुमने मेरे आने से पहले दिया फिर मेरे लिए चाय कैसे आयेगी ?
- मास्टर जी पैसों में व्यापार वाली गणित लगाता और चाय में सत्कार वाली ... हम चारों तीन की चार कर लेंगे आप पूरी ले लीजिये ..... - मलंग
©