Tuesday, December 24, 2013

मैं कैसे अस्तित्व में आया ये कोई लम्बी महान और बड़ी कहानी नहीं है और न ही किसी प्रसव काल से जुडी , दो भिन्न व्यक्तित्वों शरीरों आत्माओं को स्वयं में समिष्ट किये मुझे आगे बढ़ना था , पर वो होता है न आपके प्रशंसक आलोचक दोनों ही मैदान में होते हैं , मेरे भी थे । अब मुझ पर बोझ बढ़ाया जा रहा था आलोचक ढोना चाहते थे मुझ पर अपनी परम्पराओं प्रतिष्ठाओं को तो प्रशंसक महानताओं को अपेक्षाओं को ...मैं अब रेंगते हुए बढ़ रहा था लेकिन वो हार गया , वो तड़प कर रह गयी , और मुझे बे मौत मरना पड़ा । अब मेरे नसीब में बस दोनों के आंसू रूपी कफ़न था जिसे उन्होंने ' दोस्ती ( lets remain friends ) ' का नाम दे दिया ..... - ' ढाई अक्षर की लाश ' आत्म कथा से ©

Thursday, December 19, 2013

कोशिश करने वालों की ...

हिन्दी साहित्य में गजब रूचि थी बन्दे की , प्रेरणादायक कविता ख़ास तौर से ' कोशिश करने वालों की हार नहीं होती है '  तो श्री मुख से ऐसे निकलती थीं जैसे प्लेटफार्म पर ' चाय गरम चाय ' का स्वर ...     बी.ए. हिन्दी फर्स्ट इयर की बात है ... नीली साईकिल वाली लड़की पर दिल आ गया पर कहने मे डरे ... गर्मी में ताल पोखरे सूख जाते वैसे ही आत्म विश्वास सूख जाए .... दोस्त के काम दोस्त न आये ऐसा हो सकता है भला ... आत्म विश्वास प्रेम की महानता के झाड पर चढ़ा कर ' कोशिश करने वालों की हार नहीं होती है ' का इंजेक्शन लगाया हमने तो बन्दे में आत्म विश्वास बरसात में शहर में भरे पानी की तरफ उफनाने लगा .... ' हे पिकबयनी हे मृगनयनी ' घोट कर पीगया बंदा , खुश इतना कि ऐसा लगने लगा कि ये मुस्कराहट महानगर की स्ट्रीट लाईट की तरह अब शायद कभी न बंद हो ... अगले दिन हिन्दी की क्लास नहीं आया बाहर मिला तो चेहरे की रोशनी ऐसे गायब जैसे मंत्री आने के बाद एक महीने तक गाँव में बत्ती न आई हो ... बहुत पूंछने पर बोला हमारी समझ में आ गया कि कोशिश करने वालो की न हार होती है न लड़की .. मार होती है  , वो नीली साईकिल जीव विज्ञान वाली थी पिकबयनी मृगनयनी सुनते ही ' रसीद ' दे दी ... ©

Tuesday, December 3, 2013

जुबाँ

भाई साहब के यहाँ जाना हो रहा था , उस बड़ी सी मिठाई की दूकान से मिठाई ली फिर कुछ फल लिए और जब वापस रिक्शे के पास आया तो रिक्शे वाला दूकान के काउंटर पर सजी जलेबियां इमरती गुलाब जामुन देख रहा था ...उसे टोंका नहीं  ... आँखे अगर आशिकों के लिये दिल की जुबाँ होती हैं तो गरीब के लिए पेट की .... ज़रा सी देर बाद मुझे पास भांप कर वो मुस्कुराकर बोला ' चलें बाबू जी ' ... घर आकर बीस के नोट के साथ चार बालूशाही भी निकाल कर दे दीं । ...... और अन्दर '  एक किलो भी नहीं लाये ' के टांट का जवाब ' भाभी मंदिर से चढ़ा कर लाया हूँ  ' के  खिलखिलाते हुए झूठ ने दे दिया । ©

Sunday, December 1, 2013

आकार में बड़ा था पर उसका होने की आकांक्षा भी प्रबल थी , इसलिए अपना आकार बदलने को तैय्यार हो छोटे छोट टुकड़ों में बंटना था मुझे .... प्रतिबद्धता समर्पण की तेज धार ने क्षण भर में मुझे टुकड़े टुकड़े कर दिया ...शायद उसने समझ लिया मेरे दर्द को इसीलिये झट से मुझ कटे फटे को अपने निश्छल निर्दोष आवरण से ढक लिया और मेरे छोटे छोटे टुकड़ों का आकार ले लिया ... जो शायद उसकी स्वीकारोक्ति थी ... और समर्पण में उस खौलती कढाही में मुझ तक कम तपिश आये इसलिए वो जलती रही भुनती रही । अब ये प्रेम की पवित्रता ही थी कि जब हम कढ़ाही से निकले तो ' कुंदन ' से दमक रहे थे । ...... ये अलग बात है कि ज़माने ने हमसे सीखा नहीं बस चटखारे ही लिए .... - आलू के पकोडों की आत्मकथा से ©