" ' लेडीज सीट ' है ? चलो खड़े हो जाओ " का तेज स्वर सुनकर वो ऊंघता हुआ युवक खड़ा हो गया । फोन पर ' पितृसत्ता नारीवाद लेख पत्रिका ' बडबडाते हुए वो महिला सीट पर बैठ गयी । ' लखनऊ से नवाबगंज तक खड़े खड़े आया था और अब जो सीट मिली तो ये महिला आ धमकी आज किसका मुंह देखा ' सोच कर किस्मत को कोस कर इयरफोन कानों में ठूंस कर ' तुम ही हो ' में खो गया । न जाने क्यों आज वो ' महिला सीट ' उसे उस अतिमहत्वाकांक्षी प्रेमिका की तरह लग रही थी जो साल में चार बार प्रेमी बदलती है । खैर बस थोड़ा दूर चली ही थी कि एक सज्जन हाईवे से गाँव के मोड़ पर उतरे । बस रुकवाने से लेकर उतरने तक जो हनक उन्होंने दिखाई उससे ' बस गाँव तक क्यों नहीं ले गए ? ' का यक्ष प्रश्न उत्पन्न हो गया था । खैर जाने दीजिये अब सरकारी बस की खाली होती सीट देख कर वो झट से उसपर काबिज हो गया अब किस्मत से गिला शिकवा काफूर हो चूका था खुश तो ऐसा था जैसे सरकारी बस की सीट नहीं सरकारी नौकरी मिल गयी हो । उन्नाव के पहले एक पति पत्नी चढ़े , भरी बस देख कर उन्होंने ऐसा मुंह बनाया जैसे तीसरी बार ' लड़की ' हुई हो । काफी देर खड़े रहे । पति ( पुरुष ) को कोई सीट दे ऐसा होना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था पर गर्भवती पत्नी ( महिला ) को भी अब तक स्थान नहीं मिला .... शायद सब व्यस्त थे कुछ मोदी राहुल केजरीवाल गाने में कुछ सोने में कुछ खाने में और वो माहिला सीट वाली महिला ' नारीवाद पितृसत्ता लेख पत्रिका ' का अचार डालने में ...ये सब देख. युवक का विवेक अब कृष्ण बन चूका था और शरीर अर्जुन बन खड़ा होने वाला ही था पर तब तक कंडेक्टर भीष्म बन महिला के लिए सीट छोड़ चूका था । आज कृष्ण फिर ' भीष्म ' के प्रति नतमस्तक थे । ©
.............कब यहां अमर विस्वास , अमिट है कब आस्था ? बस एक शून्य जिसमें होता सब कुछ विलीन , आबद्ध परिस्थिति - मनोवृत्ति की सीमा से , मै जो लिखता वह सब कितना अर्थहीन !
Thursday, November 28, 2013
Tuesday, November 26, 2013
सुचालक
' दहशत ' मेरा दूसरा नाम है , रोज रिक्शे टैम्पो ऑटो वालों से लेकर भिखारी शराबी भीड़ सब पर निर्बाध बरसता हूँ मैं , बिना किसी सोच संकोच के .... आंसू बहाते रोते लोग , उनके लाल नीले पड़ चुके शरीर देखकर भी मैं नहीं रुकता .... लगता संवेदना दर्द का कुचालक हूँ मैं .... समझावन निर्दयी निष्ठुर क्रूर न जाने कितने उपनाम थे मेरे । लेकिन उस दिन खुद का मुंह लाल किये मैं दर्द से कांप रहा था . मुझे थामने वाले की गलती आँखों , डूबते दिल से मैं फटा जा रहा था . शायद मैं सुचालक बन गया था .. बनता भी कैसे नहीं ..आखिर रात के अँधेरे में रेलवे ट्रैक पर मांस के लोथडो में सिमट चुकी इंसानी पहचान को बटोरने में लगा इंसानी दिमाग ' नहीं हमारी खुशबू नहीं हो सकती ये ' से कुरेदा उधेडा जो जा रहा था । - एक डंडे की आत्म कथा से ©
Tuesday, November 19, 2013
अमर प्रश्न
हाट बाजार की चहल पहल से दूर बस्ती की गलियों में वो बुढ़िया हमसे भरी टोकरी लिए सुबह से घूम रही थी । गरीब की बेटी की तरह हमें भी कोई स्वीकार करने वाला नहीं मिल रहा था , कारण शायद उसका निशक्त स्वर था जो घरों को भेद नहीं पा रहा था । दोपहर ढलने को हुई सांस फूलने लगी तो थक हार कर उस बड़े से दरवाजे के सामने बैठ गयी । कुछ समय बाद अचानक एक नन्हा बालक भीतर से निकला बुढ़िया को फलों की टोकरी लिए देखा तो दाम पूंछ लिए , ' सेर के आधे सेर ' बुढ़िया बोली । कमर में करधनी दाहिने पैर में बजती पैंजनिया की तान पर अपने छोटे छोटे सुन्दर नग्न नितम्बो को नचाते हुए वो अन्दर भाग गया और जब आया तो अंजुलि में धान के बस कुछ दाने ही बचे थे .. बाकी सारे रास्ते भर बिखरे पड़े थे ... बालक पुनः दौड़ गया लेकिन परिणाम पूर्ववत ही रहा ... बालक ने कुछ और प्रयास किये परन्तु परिणाम में वो बस ला पा रहा था खाली पर समर्पण और याचना से लबालब अपनी छोटी सी अंजुलि ... बुढ़िया की आँखों से बहा अमृत हम पर टपक गया और हम अमर हो गए साथ ही हमारा प्रश्न भी जो था ' ये याचना और समपर्ण किससे उपजा था ? प्रेम से या भूख से ? ' ... क्योंकि कहते हैं वो बालक साक्षात ईश्वर था । - फलों की आत्म कथा से ....... ©
Monday, November 18, 2013
विजय -पराजय
घास मिट्टी पत्थर से बनी बस एक अस्पष्ट और जड़ स्वरूप थी मैं ... उस किशोर की आस्था ने अस्तित्व दिया मुझे , उसके समर्पण लगन ने मुझे स्वरूप और उसके विश्वास ने मुझमे प्राण फूंक दिए और प्रतिफल में उसने स्वयं मुझसे प्राप्त किया एक अद्वितीय कौशल । एक दिन हाथ से रुधिर और नैनो में नीर और ह्रदय में ' आपका अर्जुन सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बने ' का भाव भरे वो मेरे पास आया , उसके ह्रदय में शोक क्षोभ नहीं वरन ' गुरु दक्षिणा ' सम्पूर्ण कर उपजा विजय का भाव था । पर मैं पराजित थी मेरे मानव स्वरूप ने मुझे प्रतिद्वंदी मानकर मुझसे मेरा शिष्य जो छीन लिया था ... - एक मूर्ति की आत्मकथा से ©
Thursday, November 14, 2013
विजेता सम्राट की सभा में सिपाहियों से घिरा जंजीरों में जकड़ा वो राजपुरुष अभय मैत्री की याचना करते अन्य राजाओं वीरों को देख रहा था । अमूल्य रत्नों आभूषणों के थाल के थाल जीवन याचना के साथ प्रस्तुत किये जा रहे थे ... पर विजयी सम्राट रत्नों आभूषणों की चमक से उदासीन था ... राजपुरुष को देखकर कुछ बोला जिसे दुभाषिये ने ' राजन आपके साथ क्या व्यवहार किया जाए ? ' कह कर व्यक्त किया । राजपुरुष जो सोंच में था कि ' क्या एक राजा योद्धा के जीवन का मूल्य महज रत्नों आभूषणों में सिमटा है ? याचना में सिमटा है ? स्वाभिमान की अंत्येष्टि में सिमटा है ? ' ने एक पल को अपनी आँखे बंद कर अंतर्मन में झाँका और फिर बोला ' ठीक वैसा जैसा एक योद्धा एक योद्धा के साथ एक राजा एक राजा के साथ करता है ' ..... आज वो विश्व विजयी यवन सम्राट स्वयं मैत्री के लिए उठ खड़ा हुआ था । ढेर लगे रत्नों आभूषणों की चमक को निस्तेज करती राजपुरुष के जाज्वल्यमान ललाट की आभा उसे आकर्षित कर रही थी । अपने देश से हजारों मील दूर उसे आज उसे कोई मिला जो पराजित था मगर योद्धा था जंजीरों में जकड़ा था पर राजा था , क्योंकि वो जीवन का याचक नहीं था । ©
Wednesday, November 13, 2013
क़र्ज़
मौसमी फल केले सिंघाड़े आम खीरे अमरूद बेचकर अनीस अपने परिवार का पेट पालता था । गुलाबी सर्दियाँ थी और वो अमरूद का ठेला सजा कर अगरबत्ती कर रहा था चौराहे पर तैनात पाण्डेय हवलदार आया और रोज की तरह 2-3 अमरूद छांटे और बोला ले काट के दे । अनीस के काट के नमक लगाए अमरूद उदारातीत करके पांडे आगे बढ़ा ही था पर आज अनीस बोला ' साहेब अभई बोहनी नहीं हुई कुछ तो देते जाईये ' पांडे ने घूर कर देखा और फिर जेब से 2 का सिक्का देते हुए चिर परिचित पुलिसिया अंदाज में बडबडाते हुए आगे बढ़ गया ।
दोपहर ढलने को थी अनीस सड़क के उस पार लघुशंका करने गया ही था कि ठेले पर ग्राहक देख कर वापस लौटने को हुआ पर सड़क पर आते ही एक तेज रफ़्तार suv ने उसका काम तमाम कर दिया । .... महीने बीत गए पांडे अब निलंबित चल रहा । आखिर धमकी और लाखों के प्रलोभन के बावजूद भी उसने उस ' किशोर चालक ' को शिनाख्त परेड में पहचान लिया था । और तो और सुना है कि ' नमक ' का कर्ज़ उतारने वाले को आज कल बेटी की शादी के लिए क़र्ज़ नहीं मिल रहा ..... ©
दोपहर ढलने को थी अनीस सड़क के उस पार लघुशंका करने गया ही था कि ठेले पर ग्राहक देख कर वापस लौटने को हुआ पर सड़क पर आते ही एक तेज रफ़्तार suv ने उसका काम तमाम कर दिया । .... महीने बीत गए पांडे अब निलंबित चल रहा । आखिर धमकी और लाखों के प्रलोभन के बावजूद भी उसने उस ' किशोर चालक ' को शिनाख्त परेड में पहचान लिया था । और तो और सुना है कि ' नमक ' का कर्ज़ उतारने वाले को आज कल बेटी की शादी के लिए क़र्ज़ नहीं मिल रहा ..... ©
Monday, November 11, 2013
वरदान
शहर के सबसे पुराने और एक मात्र पुस्तकालय में खादी पहने टोपी लगाये अखबार हाथ में लिए पर शायद ही कभी उन्हें तन्मयता से अखबार पढ़ते पाया होगा । वो जब भी पुस्तकालय में आते पुस्तकालय पुस्तकालय नहीं चौपाल बन जाता । हंसी मजाक व्यंग्य विचार सब कुछ होते नहीं होती थी तो बस उदासी और शांति । एक दिन बुढापे में शारीरिक अक्षमता पर बात चली तो बोले ' बुढापे में नजर कमजोर होना , सुन नहीं पाना , दांत गिरना वरदान होता ' मैंने पूंछा कैसे तो बोले ' घर वालों के ताने नहीं सुन पाते, उनके फालतू के क्रिया कलाप नहीं देख पाते और पाचन शक्ति काम नहीं करती तो दांत नहीं है के बहाने से मुलायम चीजें खाने को मिल जातीं .... तो बोलो वरदान हुए कि नहीं ' हा हा हा .... ठहाका गूँज गया । समय बीता बात आई गयी हो गयी । इधर एक सप्ताह से ऊपर हो गया था वो नहीं आये , मन आशंकाओं से घिर गया । सोचा उनके घर जा कर पता करूं ... ऐसा ही किया । पता पूंछते - 2 उनके घर पहुंचा । तख़्त पर लेटे थे मुझे देख कर ऐसे खुश हुए जैसे स्कूल की छुट्टी ख़त्म होने पर दोस्त मिलते हैं । खूब गप्पे हांकी हम दोनों ने चाय नाश्ता भी किया । समय का पता तब चला जब अन्दर से आवाज आई ' दादा जी मम्मी पूँछ रही हैं कि आज खिचडी खायेंगे या दलिया ? ' । बातों बातों में शाम हो गई थी चलने को खड़ा हुआ तो पूँछ बैठा ' दद्दा चलने फिरने में लाचार हो गए अब , इसे भी वरदान मानते हैं क्या ? ' उस पोपले चेहरे पर आज हंसी नहीं थी , बूढ़ी धुंधली पड़ चुकी आँखे आज भर आई थी बोले ' हाँ वरदान ही मानता हूँ ये मेरी चलने फिरने में लाचारी बस उन्ही लोगों को मेरे पास लाती जो ' मेरे अपने ' हैं । उस बूढ़े खुरदरे हाथ का स्पर्श आज दिल तक पहुँच रहा था । कसम से उस दिन काले चश्मे ने लाज रख ली वरना आँखों ने कोई कसर नहीं छोडी थी चेहरे की मुस्कान का सच उगलने की ...... ' लहसुन धनिये की चटनी भी बना देना ' घर से निकलते समय कानों में पढ़ने वाले आख़िरी शब्द थे । ©
Saturday, November 9, 2013
अग्नि परीक्षा
एक हारे हुए नगर के प्रांगण में आज भीड़ जुटी हुई थी । लकड़ियों का ढेर लगाया जा रहा था और भीड़ प्रतीक्षारत थी एक ऐतिहासिक परीक्षा की .... महिला को लाया गया .....पति , संबंधी , सेवक , दर्शक .. प्रेम क्षोभ भक्ति की प्रतिमूर्ति बने जड़ खड़े थे । लकड़ियों के बीच महिला को स्थापित कर अग्नि प्रज्ज्वलित की गयी । आकाशगामी लपटों का तेज , अग्नि के समक्ष खड़े लोगों के लिए असहनीय था फिर अन्दर ? .... अन्ततोगत्वा परीक्षा संपन्न हुई । महिला की पवित्रता निर्दोष और निष्कलंक प्रमाणित हुई । चारों दिशाओं में विजय उदघोष गुंजार हो उठा ' जय सीता राम '... पति संबंधी सेवक और दर्शक सभी महिला की पवित्रता के प्रति नतमस्तक थे । दूर कही नेपथ्य में वैधव्य श्रृंगार से सजी एक अकेली स्त्री सजल हो चुके नेत्रों को बंद कर के स्मृति बन चुके अपने ' प्रेम ' के प्रति भी श्रृद्धा से नतमस्तक हो रही थी आखिर वह भी तो सफल हुआ था इस परीक्षा में ..... ©
Tuesday, November 5, 2013
उजाले की विरासत
शहर के उस ' अछूत ' मोहल्ले में दिवाली की आतिशबाजी से निकली चिंगारी आग भड़का गयी थी । दमकल के आने तक कईयों के सपनों के आशियाँ राख बन चुके थे । पर हाथ रिक्शा चलाने वाले हरीश को इस आग ने सबसे ज्यादा झुलसाया था । अपनी झुलसे बीबी बेटी बेटे को लिए अस्पताल की तरफ बेतहाशा भागा जा रहा था । इमरजेंसी में डाक्टर को बैठा देख कर उसे ईश्वर प्राप्ति जैसी अनुभूति हुई और हमेशा की तरह धरती के इस ईश्वर ने उसे निराश नहीं किया , हरीश का परिवार अब खतरे से बाहर था । हरीश की आँखों के आंसूओं का कारण अब बदल चूका था डा. के पैर पकड़ कर उन्हें बोला ' साहेब आप आज हमरे खातिर भगवान हुई गए । हमरे जिन्दगी का उजियार ( उजाला ) बचा लीन्ह्यो । ' डा. राजेश उसे उठाने के स्थान पर जड़ खडे थे उन्हें याद आ रहा था कि कैसे पत्नी बच्चों के ' दस साल हो गए इस बार दिवाली साथ मनाईये ' की जिद मानकर वो साहब के पास पहली बार मिठाई लेकर गए थे और साहब ने कहा था ' तुम्हे क्या लगता राजेश तुम गिफ्ट मिठाई नहीं लाते इसलिए तुम्हारी ड्यूटी लगती ? नहीं .... ये मिठाई गिफ्ट लाने वाले ड्यूटी लगने पर क्या लापरवाही करते मुझे पता है .. इसलिए तुम्हे चुनता क्योंकि तुम अपने काम के प्रति ईमानदार हो समर्पित हो ... ' उजाले की विरासत ' हो ... ©
Friday, November 1, 2013
तेरस = 13 = तेरह = तेरा ...... तेरस = तेरा
आज बाज़ार जाने वाले लोग
जाते हैं समर्पण के साथ
मन में बिठा कर ये
कि धन तेरस है
और बाज़ार में बैठे लोग
अधिकार समझते हैं
आपके समर्पण को
क्योंकि धन तेरस है । :)
आज बाज़ार जाने वाले लोग
जाते हैं समर्पण के साथ
मन में बिठा कर ये
कि धन तेरस है
और बाज़ार में बैठे लोग
अधिकार समझते हैं
आपके समर्पण को
क्योंकि धन तेरस है । :)
स्वरूप आकार और प्रकृति सामान होती है हमारी , आप चाहे तो हमें जुड़वां कह सकते हैं । रोज हम कीचड़ लगे , चमकते हुए , कोमल बजने वाले , प्रकाशित करने वाले ,नए - पुराने , घिसे - सिले , वैश्विक ब्रांड से लेकर 250 रूपये जोड़ा वाले पैरों को आरोह अवरोह से उपजे लक्ष्य तक पहुंचाते हैं । यही हमारा जीवन कर्म है । रोचक नहीं लगा न ? हमें भी नहीं लगता , भला रोज रोज भार उठाना किसे भायेगा ? मन करता बंद पड़ जाए लेकिन फिर गूंजने लगते है कुछ शब्द " देखो ऐसे पैर रखो ... हां ऐसे सम्हाल के ... डरो मत मैं हूँ न साथ .. लो मेरा हाथ पकड़ लो " कोई माने या न माने पर ह्रदय जैसे हम भी अनवरत चलने को प्रतिबद्ध हो जाते आखिर अपनेपन का स्पर्श , प्रेम और विश्वास हमसे भी जो उपजता । - एस्कलेटर की आत्मकथा से ©
Subscribe to:
Posts (Atom)