Monday, November 11, 2013

वरदान

 शहर के सबसे पुराने और एक मात्र पुस्तकालय में खादी पहने टोपी लगाये अखबार हाथ में लिए पर शायद ही कभी उन्हें तन्मयता से अखबार पढ़ते पाया होगा । वो जब भी पुस्तकालय में आते पुस्तकालय पुस्तकालय नहीं चौपाल बन जाता । हंसी मजाक व्यंग्य विचार सब कुछ होते नहीं होती थी तो बस उदासी और शांति । एक दिन बुढापे में शारीरिक अक्षमता पर बात चली तो बोले ' बुढापे में नजर कमजोर होना , सुन नहीं पाना , दांत गिरना वरदान होता ' मैंने पूंछा कैसे तो बोले ' घर वालों के ताने नहीं सुन पाते, उनके फालतू के क्रिया कलाप नहीं देख पाते और पाचन शक्ति काम नहीं करती तो दांत नहीं है के बहाने से मुलायम चीजें खाने को मिल जातीं .... तो बोलो वरदान हुए कि नहीं ' हा हा हा .... ठहाका गूँज गया । समय बीता बात आई गयी हो गयी । इधर एक सप्ताह से ऊपर हो गया था वो नहीं आये , मन आशंकाओं से घिर गया । सोचा उनके घर जा कर पता करूं ... ऐसा ही किया । पता पूंछते - 2 उनके घर पहुंचा । तख़्त पर लेटे थे मुझे देख कर ऐसे खुश हुए जैसे स्कूल की छुट्टी ख़त्म होने पर दोस्त मिलते हैं । खूब गप्पे हांकी हम दोनों ने चाय नाश्ता भी किया । समय का पता तब चला जब अन्दर से आवाज आई ' दादा जी मम्मी पूँछ रही हैं कि आज खिचडी खायेंगे या दलिया ? ' । बातों बातों में शाम हो गई थी चलने को खड़ा हुआ तो पूँछ बैठा ' दद्दा चलने फिरने में लाचार हो गए अब , इसे भी वरदान मानते हैं क्या ? ' उस पोपले चेहरे पर आज हंसी नहीं थी , बूढ़ी धुंधली पड़ चुकी आँखे आज भर आई थी बोले ' हाँ वरदान ही मानता हूँ ये मेरी चलने फिरने में लाचारी बस उन्ही लोगों को मेरे पास लाती जो ' मेरे अपने ' हैं । उस बूढ़े खुरदरे हाथ का स्पर्श आज दिल तक पहुँच रहा था । कसम से उस दिन काले चश्मे ने लाज रख ली वरना आँखों ने कोई कसर नहीं छोडी थी चेहरे की मुस्कान का सच उगलने की ...... ' लहसुन धनिये की चटनी भी बना देना ' घर से निकलते समय कानों में पढ़ने वाले आख़िरी शब्द थे । ©

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