हाट बाजार की चहल पहल से दूर बस्ती की गलियों में वो बुढ़िया हमसे भरी टोकरी लिए सुबह से घूम रही थी । गरीब की बेटी की तरह हमें भी कोई स्वीकार करने वाला नहीं मिल रहा था , कारण शायद उसका निशक्त स्वर था जो घरों को भेद नहीं पा रहा था । दोपहर ढलने को हुई सांस फूलने लगी तो थक हार कर उस बड़े से दरवाजे के सामने बैठ गयी । कुछ समय बाद अचानक एक नन्हा बालक भीतर से निकला बुढ़िया को फलों की टोकरी लिए देखा तो दाम पूंछ लिए , ' सेर के आधे सेर ' बुढ़िया बोली । कमर में करधनी दाहिने पैर में बजती पैंजनिया की तान पर अपने छोटे छोटे सुन्दर नग्न नितम्बो को नचाते हुए वो अन्दर भाग गया और जब आया तो अंजुलि में धान के बस कुछ दाने ही बचे थे .. बाकी सारे रास्ते भर बिखरे पड़े थे ... बालक पुनः दौड़ गया लेकिन परिणाम पूर्ववत ही रहा ... बालक ने कुछ और प्रयास किये परन्तु परिणाम में वो बस ला पा रहा था खाली पर समर्पण और याचना से लबालब अपनी छोटी सी अंजुलि ... बुढ़िया की आँखों से बहा अमृत हम पर टपक गया और हम अमर हो गए साथ ही हमारा प्रश्न भी जो था ' ये याचना और समपर्ण किससे उपजा था ? प्रेम से या भूख से ? ' ... क्योंकि कहते हैं वो बालक साक्षात ईश्वर था । - फलों की आत्म कथा से ....... ©
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