Monday, April 12, 2010

" मै मानव सेवा करता हूं "


पथ के प्रतिबाधन ने इतना मुझे सिखाया है ;
नियति नहीं ये तो निज कर्मों की छाया है ।
सत , विवेक , पौरुष के बल जो आगे को आया ;
मनुज नहीं बस , सृष्टा ने भी उसको शीश झुकाया है ॥


मै उस भारत का वासी हूं जो जगत गुरु कहलाता है ;
जिसके वेदों की अमर ज्योंति से अंधकार कुम्हलाता है ।
मानव का मानव से नाता , पन्ना , दधीचि की धरती ये ;
पर हाय मनुज क्यों आज यहां यूं विप्रलाप फैलाता है ॥


इस विप्लव उन्मूलन को मैं अब शंखनाद करता हूं ;
जौहर की चिंगारी से , उर मे अनल दाह करता हूं ।
हल्दी घाटी की रज ,को भाल सजा कर कहता हूं ;
धर्म नहीं , मै जाति नहीं , मै मानव सेवा करता हूं ॥
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Thursday, April 8, 2010


रुद्र का आह्वान करता रक्त में उबाल दो ,
भस्म कर दो सब मलिनता वर हमें महाकाल दो ।


हर प्रताडित के हृदय की हाय अब गर्जन बने ,
आंख से बहते हुये अश्रु लावा बन बहे ।
भीम की ललकार हो हर दबी शोषित जुबान ,
द्वेष की लंका जलाने अंजनी का लाल दो ।।

ओ दया के सिन्धु सुन लो हमारी ये पुकार ,
इस विपद वेला मे जन करते गुहार ।
अज्ञानता के तिमिर का नाश करने के लिये ,
तप , ज्ञान , बुद्धि विवेक की तुम ज्वलित एक मशाल दो ।।


हैं मनुज हम जिनने मापी सिन्धु की गहराईयां ,

छू चुके हम अपने बूते ब्रहाण्ड की ऊंचाईयां ।
एक हार से टूटे नही , आगे बढे चलते रहें ,
पराजय यज्ञ के विध्वंस को तुम वीरभद्र विकराल दो ।।


ध्येय पथ पर हमारे शूल है बिखरे पडे ,

प्रबल सरिता , दुरुह गिरि मार्ग को अवरुद्ध करे ।
अटल विस्वास के स्वर में विजय के गीत हम गाते रहें ,
संकटो के उर मे धसाने राणा प्रताप का भाल दो ।।

रुद्र का आह्वान करता रक्त में उबाल दो ,
भस्म कर दो सब मलिनता वर हमें महाकाल दो ।
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