Monday, September 30, 2013

न्यायिक प्रक्रिया में शिथिलता कैसे दूर हो इस विषय पर सेमीनार चल रही थी । बड़े बड़े गणमान्य विधिवेत्ता अपने अपने विचार रख रहे थे । कोई अधिवक्ताओं को , कोई प्रशासनिक प्रणाली को तो कोई राजनीतिक हस्तक्षेप को इसका कारण बताते हुए अपने विचार रख रहे थे । सबसे अंत में उनका नंबर आया । समय कम था और वो कवि थे तो दो पंक्ति में अपनी बात कह गए । 

" न्यायिक प्रक्रिया में शिथिलता दूर हो , 
अमा आप लोग कैसी बात करते है । 
ये जुवेनाईल फ्रेंडली constitution है । 
फैसले के लिए केस 18 का हो इसका भी इन्तेजार करते हैं । " ©
नदी किनारे अक्सर जाना होता है । इस बार महीने भर बाद गया तो पाता हूँ कि बाढ़ का पानी लौट चुका है। मिट्टी के गहरे टीले फिर से हरे भरे हो चुके है । झींगुरों का कंसर्ट अपने चरम पर है । पत्ते पेड़ सब चटक हरे हो गए है ... मिट्टी कीचड से सनी भैंसें कैट वाल्क को भी लजाती हुई चाल से घर लौट रही है ... तभी में में में करती एक आवाज कानो में पडी । आवृत्ति बढ़ती ही जा रही थी । उठ कर देखा तो एक ऊंचे टीले पर एक बकरी मिमिया रही थी । हरे भरे टीले में घास खाते खाते वो टीले के ऊपर पहुँच चुकी थी । अब शायद उतरने का रास्ता नही सूझ रहा था उसे । ' इच्छा पूर्ति के लिए विवेक को तिलांजलि देने से ऐसी ही परिणति होती ' उसकी बेबस मिमियाहट यही कह रही थी शायद .....

Saturday, September 28, 2013

ठेका देशी शराब

ठेका देशी शराब ... हां बस उसी ठेके के सामने वो नमकीन का ठेला लगता था । हर पीने वाला उसके यहाँ से नमकीन जरूर लेता । बड़े से बड़ा छोटे से छोटा ,; चोर बदमाश से लेकर सिपाही कोतवाल तक । अपनी एक तिहाई जिन्दगी नशेबाजो के साथ गुजारने के बाद भी वो पीता नहीं था । आये दिन जलालत गालियाँ सहता कभी कभी तो मार भी सहन कर लेता था । बहुत पूंछने पर बोला - भैया जी ये सब चलता रहता है फर्क नहीं पड़ता अब । यही गाली देने वाले पैर छूकर भी जाते अगले दिन । नशा सिर्फ गुमान देता और कुछ नहीं .... दो बिटिया ब्याहनी है लड़का पढ़ रहा है इन सबसे उलझूंगा काम बंद कर दूंगा तो कहाँ से हो पायेगा सब .. यही हमारा धरम करम है । ऐसा लगा मानो साक्षात भगवान कृष्ण आसक्ति भोगों से दूर रह कर कर्म में रत रहने का ज्ञान दे रहे हों ।  मन आया लगे हाथ पूँछ लूं कि गीता पढी है क्या कभी ? लेकिन तब तक वो प्लेट लेकर आगे बढ़ चूका था । ©

Friday, September 27, 2013

गरीब

शुक्रवार था , शाम होने को थी फिर भी भीड़ थी गल्ला मंडी में। सरकारी अनाज के ट्रक जो आयेंगे । 5 रुपया बोरी उतराई लेने वाले मजदूर खड़े थे भोला भी था । ट्रक आया सब बोरियां उतारने में लग गए । सुपरवाईजर का फ़ोन बजा ... सुपरवाईजर बोला - हेलो ... जी सर ठीक है 10 - 10 करवा दूंगा । सर हमारा भी ध्यान रखिएगा पिछली बार सूंघने भर को भी नहीं मिल पाया था । हा हा हा एक लम्बी हँसी के बाद फ़ोन बंद हो गया । 
फिर सुपरवाईजर की धमकाती हुई सी आवाज आयी - सुनो हर ट्रक से 10 - 10 बोरी बचा के छोटे गोदाम में रख देना । ऐसा ही किया गया ... पैसे लेकर सब चले गए तो भोला ने अकेले में सुपरवाईजर से कहा - बाबूजी थोडा गल्ला मिल जाई का रात हुई गयी है अब दुकान सब बंद हुई गयी .... गाडी के शीशे में अपना चेहरा अस्त करने से पहले सुपरवाईजर बोला - हराम का माल है , 200 रुपया पा तो गए हो ... साला तुम लोगों का कभी पेट नहीं भरता तभी गरीब हो । ....  
कृत्रिम रोशनी की चमक में भोला को शीशे में अपना प्रतिरूप दिखा ही था कि गाड़ी फुर्र हो गयी .. .....

 ©

Wednesday, September 25, 2013

हाथ बढ़ाये वो इसी आस में जीता था कि एक दिन वो उसका हाथ जरूर थामेगी । लेकिन नियति उसके पाले में नहीं थी । एक बार जाने के बाद उसने पलट कर भी नहीं देखा । ' तुम्हारे हाथों की लकीरों में वो नहीं है ' अब तो सब यही कहते थे । उसने हथेली पर उसका नाम अपने हाथों से उकेर लिया । जानता था कि बंद मुट्ठी कभी थामी नहीं जा सकती पर खोने से इतना डरता था कि बंद मट्ठी करके उसे हमेशा के लिए अपने समेट लिया । - कौशल ©

ब्रह्म राक्षस

लावारिस छिन्न भिन्न अधजली अधगली लाशों को ठिकाने लगाता था वो । बस यही उसका काम था । भाव शून्य शब्द शून्य था , किसी ने मुस्कुराते हुए भी नहीं देखा था उसे । लाश ठिकाने लगा कर चेहरे पर श्मशान जैसी वीभत्स शान्ति लिए आता और 50 रूपये और दारू की बोतल लेकर ओझल हो जाता । जुलाई का महीना था नदी में बाढ़ आयी थी बहुत से शरीर बह बह कर आ रहे थे । उसका काम और बढ़ गया था । हमेशा की तरह उस दिन भी आया , पैसे और दारू की बोतल पहले से निकाल कर रखी थी । पैसे उठाकर बोला - दारू की बोतल के बदले पैसे चाहिए ' पार्श्व में उसके ठेले से किसी बच्चे के रोने की आवाज आ रही थी ....©

Tuesday, September 24, 2013

मंदिर में रोज दो दिए जलाना उसका नियम था । एक दिन पुजारी पूँछ बैठे क्यों ये दो दिए जलाने का क्या तुक है ? सभी तो एक ही जलाते है । बिना कुछ कहे मुस्कुराकर कर चला गया वो । ( सुना था उसने कि किसी के लिए कुछ मांगो तो किसी पर जाहिर मत होने दो । ) उपेक्षित किये जाने के बाद भी चुपचाप उसकी क्लास में जाकर उसे देख आता था वो । बिना कुछ कहे बिना उसके सामने आये । उसे खिलखिलाता , हँसता , सफल देख कर उसके चेहरे पर एक मुस्कान आ जाती । बस इतना ही तो वो चाहता था । आखिर प्रेम करना उसने प्रेम कहानियों से ? गीतों से ? व्यक्तियों से नहीं इयरपीस से से सीखा था । .... जब साथ रहो तो एक दुसरे में पूर्णतः संलग्न रहो और जब कभी अलग भी हो तो एक दूसरे के पूरक बनकर जीवन में संगीत घोलते रहो । - कौशल ©

Monday, September 23, 2013

उस दिन एक वृद्ध ओवर ब्रिज पर अपने पूरे लदे हाथ ठेले को चढाने का दुर्गम प्रयास कर रहा था । पसीना पसीना हो गया था पर कोशिश जारी थी । फुर्र से एक बाईक ठेले के आगे आकर रुक गई । बाईक से दो नव युवक उतरे और मुस्कुराकर एक ने उस वृद्ध के साथ ठेले को धक्का देना शुरू कर दिया । चढ़ाई चढ़ने पर वृद्ध ने सकुचाते हुए युवक की पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा ' बस भईया अब हम लई जईबे ' । चमत्कार सा हो गया ... एक दिन पहले सिटी कप फ़ुटबाल में मिली सेमीफाईनल की हार का सारा दर्द निकल सा गया उस स्पर्श से ... ईश्वरीय स्पर्श की अनुभूति दे गया वो एक पल ।

( समोSहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योस्ति न प्रिय: ।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि तेषु चाप्यहम । ।अ-9 , 29 
मैं सभी भूतों में समभाव से व्यापक हूँ न कोई प्रिय है न अप्रिय ; परन्तु जो मुझे प्रेम से भजते है ( प्रेम करते है ) वे मुझमें है और मैं भी उनमें प्रत्यक्ष प्रकट हूँ । ) - कौशल ©

Sunday, September 22, 2013

अब तक समझने का प्रयास कर रहा कि तुम्हे क्या पसंद नहीं आया मैं ? मेरे प्रेम की स्वीकारोक्ति या स्वीकारोक्ति में दर्शायी तत्परता । कहते हैं ' प्रेम में वियोग सबसे अधिक पीड़ा देता है । ' पर मैं नहीं मानता विरह प्रेम का संकट काल नहीं हो सकता यह तो प्रेम में भक्तिकाल जैसा है , आपकी आस्था , प्रेम विश्वास को परखता है निखारता है और प्रगाढ़ करता है , हर पल आशा से ओतप्रोत रहता । सब कहते हैं आगे बढ़ो , क्यों जीवन किसी एक पर ख़त्म कर रहे हो । नहीं !! यही तो मेरे प्रेम की परीक्षा है । इससे भाग नहीं सकता । पर जानती हो सबसे ज्यादा क्या कचोटता है ? धीरे धीरे सब मुझसे दूर जा रहे है जीवन में जो प्रेम और सम्मान पाया वो भी दांव पर लगा है और तो और तुमने भी शब्दों का आदान प्रदान भी बंद कर दिया पर मैं बात करता हूँ ... हां ... ह्रदय में बसी तुम्हारी प्रतिमूर्ति से । तुम साथ नहीं हो मैं अकेला ही इस परीक्षा को दूंगा ... सफल असफल होने के लिए नहीं तुम्हे पाने खोने के लिए नहीं बल्कि अपने सत्य अपने प्रेम को साबित करने के लिए ..... ' ये सब वो इसलिए लिख सका क्योंकि उसका की बोर्ड वाटर प्रूफ था । जी हां XYZ कम्पनी का वाटर प्रूफ की बोर्ड । XYZ कम्प्युटर प्रोडक्ट्स आपके दुःख के साथी । - कौशल ©

Saturday, September 21, 2013

कालेज में सबसे अच्छा गाता था वो । खुश मिजाज , मिलनसार , सब पसंद करते थे उसको ... और शायद वो भी । पर अचानक न जाने क्या हुआ उसने बात करना बंद कर दिया । बहुत कोशिश की पर हर बार वो मुंह फेर लेती । आखिर एक दिन उसने कह दिया ' गाना पसंद था तुम्हारा इसका मतलब ये नहीं कि तुम्हे भी पसंद करूं , जाओ और अपनी आवाज फिर कभी मत सुनाना .... जीभ काट ली उसने ... अब घर पर ही रहता । पीछे वाला कमरा जो गली में खुलता उसके दरवाजे पर बैठा रहता अनजान सा ... पर 6 साल के चिंटू को देखकर न जाने क्यों मुस्कान आ जाती उसके चेहरे पर । महीने बीत गए ऐसे ही , फिर एक दिन दो बच्चे चिंटू से लड़ गए उसने झिड़क कर छुटाया तो एक का सर फूट गया .... अब चिंटू नहीं आता .. दरवाजे की जगह खिड़की लग गयी है... और खिड़की के नीचे कोई लिख गया है ' पागल से सावधान ' - कौशल त्रिपाठी ©
 वृक्ष जिसने प्राण वायु के साथ साथ कई बसंतों फल फूल छाया दी पंछियों , कीड़ों , गिलहरियों की अनगिनत पुश्तों को आश्रय दिया पर अब सूख चूका है उसकी डालों पर न पंछी कलरव करते हैं न गिलहरियाँ फुदकती है ; उसकी ही भांति हो गए थे वो । जर्जर शरीर एक कदम चलने के लिए साँसों , शरीर और छड़ी का पूरा जोर लगाना पड़ता था उन्हें , पर थे नियमित । उन्हें देखकर किसी को भी लग सकता था कि अब इस आयु में ये क्यों खुद को कष्ट देते हैं ? पर वो प्रतीक हैं संकल्प के , आशा के , जीवन के... वो जीवन जो किसी भी दिन ख़त्म हो सकता है , पर वो इसे हार कर नहीं ... जी कर , लड़ कर ख़त्म होने देना चाहते । - कौशल त्रिपाठी ©

Wednesday, September 18, 2013

पहले मैंने 
तुम्हे दिए 
अपने शब्द ,
फिर अर्पित किया 
अपना चिंतन ,
फिर अपनी आस्था भक्ति और विश्वास
 फिर अपनी मुस्कान और दिन 
और अब निछावर कर रहा हूँ 
तुम पर अपनी राते ,
 नींद और सपने । 
जानता हूँ 
बदले में कुछ नहीं मिलेगा । 
पर कम से कम मत मांगना
 मुझसे मेरी साँसे 
वो दो जोड़ी बूढ़ी 
आसराई आँखों की अमानत हैं ... ©
तुम 
मेरे लिए 
न फूल हो
न कली 
न बाग़ न उपवन
न नदी न झरना 
प्रेम के प्रतीक जो मेरे
अग्रज दे गए हैं 
उनमें से कुछ भी नहीं हो तुम 
मेरे लिए 

मेरे लिए 
तुम हो
जगमगाने वाला 
मन्दिर का दिया 
दूर से ही सही
पर सुनाई देने वाली 
घंटे की ध्वनि
तुम हो 
मेरी आस्था की प्रतीक ... ©





Tuesday, September 17, 2013

प्रेम

अचानक हवा तेज हो गयी । जलता दीपक बुझ न जाए इसलिए हाथों से ढँक लिया उसने । पर उसके हाथ झुलसने लगे और दीपक बुझने लगा । इस बात के लिए दीपक और वो एक दूसरे से नाराज थे । पर वो ये भी समझते थे कि दीपक बुझ न जाए इसलिए उसने उसे हाथों से ढका था और उसके हाथ झुलस न जाएँ इसलिए दीपक बुझने लगा था । .... - कौशल


Monday, September 16, 2013

अधुरी कहानी ( शायद आख़िरी भी )

दो - चार कहानी कविताएँ उस पर लिख कर और उनमे उसके like पाकर सोंचता था उसने उसे पा लिया । यहाँ तक तय कर लिया कि वो नहीं तो कोई नहीं ... पागल था ... पर प्रेम एक प्यास है जितना गहरा प्यार उतनी बड़ी प्यास । मिलन हो या विरह इस प्यास में बस आंसू ही पीने को मिलते । ( बस तुम्हारे इन्तजार में हूँ ... मुझे पता है तुम आओगी एक दिन मेरी कहानी पूरी करने ) । - कौशल 

Sunday, September 15, 2013

खाली जेब ....

चौबे के यहाँ से पान खा के जैसे ही चलने को हुआ एक मासूम सी आवाज आई - ' बाबूजी जूता पालिस कर दें ' मुड़ कर देखा तो 13-14 साल का लड़का खड़ा था काफी टाईट पेंट और थोड़ी बड़ी शर्ट पहने । ( किसी से मिले ही लगते थे ) 
- कै पैसे लोगे ?
- 5 रूपया 
- इतने ज्यादा ? तुम तो बड़े ठग निकले ( हंस कर कहा )
- जादा नहीं है बाबूजी , जूता बिलकुल चमका दूंगा 
- अच्छा चलो ठीक है 
 पान वाले के स्टूल पर बैठ गया और जूते दे दिए उसको । झोले से पालिश और ब्रश निकाल कर वो अपने काम में लग गया । इधर चौबे कहने लगा तिवारी जी मेहनती लड़का है । बाप रिक्शा चलता था कई रोज हो गए कोई कार चढ़ा दिया तब से लाचार हो गया बेचारा , महतारी बाप दो बहन और ये है । दो तीन रोज से आ रहा है । मैंने कहा ऊंची जात के हो पालिश करोगे कि स्टेशन में , गाड़ियों पान मसाला बेचोगे ? बोला - मुझे पैसा जोड़ना है पान मसाला बेचते बेचत खाब आई गया तो .. पालिस कर लूँगा । .... उसकी कहानी सुनता जा रहा था और उसके काम को देखता जा रहा था । नौसिखिया था , पर था मेहनती उसी आस्तीन से जूता और उसी से माथे का पसीना पोंछता जाता था । पालिश हो गयी थी फिर भी आस्तीन रगड़े जा रहा था ..... आखिरकार मैंने ही रोका उसे , जूते पहन कर ' ये लो 10 रूपये मेरे पास खुले नहीं है 5 बाद में दे देना ' मै चल दिया । वो बोला - अभी देता हूँ बाबूजी ... मैं मुड़ा और मन में आया कि कह दूं कि रख ले लेकिन तब तक उसकी छोटी हथेली में 5 का पालिश लगा सिक्का मेरे सामने चमक रहा था ।  

शाम को जब लौट कर आया तो वो वही बैठा अखबार पढ़ रहा था । बड़ा अच्छा लगा । मैंने पूंछा कितने तक पढ़े हो ? स्वर में निराशा लिए वो बोला - 6 में पढ्ता था ... और चुप हो गया । मैंने पूंछा पढना अच्छा लगता है ? उसके ' हाँ ' आँखों और मुस्कान में जो एकरूपता थी वो सीधे ह्रदय में लगी मैंने मन में ठान लिया कि सोमवार को इसकी पढाई की व्यवस्था करूंगा और परिवार में कुछ पैसे आयें उसकी भी .... 

आज सोमवार था ... चौबे पान लगा रहा था और मेरी नजरें उसे खोज रहीं थी । 
चौबे - का हुआ तिवारी जी ? 
 - वो लड़का नहीं दिख रहा आज 
चौबे - वो सेठ साहब है न पेट्रोल पम्प वाले वो ले गए उसको कह रह थे मेहनती लड़का है दिल्ली में बहन के घर नौकर नहीं है तो काम करने भेजेंगे .... 
समझ नहीं आ रहा था किसे कोसूं खुद को या नियति को ... सोच में डूबा था तभी
तिवारी जी ... तिवारी जी ... का हुआ ? ये लीजिये पान चौबे बोला ...
पैसे देने को जेब में हाथ डाला और चौबे को दिया  वो वही 5 का सिक्का था , महज एक 5 का सिक्का। पर आज पूरी जेब खाली लग रही थी - मलंग ©


Saturday, September 14, 2013

जानती हो 
अब मैं होना चाहता हूँ 
लालची , लोभी , स्वार्थी 
समेट लेना चाहता हूँ
तुम्हारी पूरी दौलत
वो दर्द
वो बेबसी 
वो अकेलाप
न सिसकती रातों के 
टूटे हुए ख़्वाब 
तपाते आंसुओं में बह चुके
अरमानों की स्मृतियाँ 
जिन्हें तुम सहेजे रखे हुए थी 
बरसों से 
बिना बताये बिना जताए 
खाली कर दो अपना कोश 
क्योंकि फिर बसाने है मुझे इनमे अरमान
भरने है मुझे इसमें बहुत से सपने ,
अनगिनत आशाएं 
और थोडा सा मैं ..©

Friday, September 13, 2013

बस तुम्हारे लिए ...

 नहीं है मेरे पास बीघे 
एकड़ हेक्टेअर जमीन 
है तो बस
एक गमला जमीन 
तुम्हे लगाने के लिये ;

जानता हूँ तुम बढते हो
बिना जताए  बिना बताये 
सूख जाते हो इसीलिये शायद 
पर मैं 
सच की खुरपी से गहरा खोदूंगा
ताकि विश्वास रूपी जड़े 
अच्छे से विकसित हो पायें 
उसमें रख कर डालूँगा 
सपनों का पानी 
दूंगा तुम्हे स्थायित्व  
निरंतरता की धुप  
खड़ा होने के लिए दूंगा 
तुम्हे शरीर का संबल 
और जीवन रूपी समय 
बस बदले में 
मेरे गमले में जमा लेना 
अपने अस्तित्व की जड़े 
और पल्लवित हो जाना 
क्योंकि तुमसे 
फूल फल नहीं चाहिए 
खुशबू भी नहीं चाहिए 
तुम उससे भी बढ़कर 
दोगे मुझे कुछ... हाँ प्राण वायु  ।  © 

Thursday, September 12, 2013

कल्लू जमादार नहीं रहा । .... अरे ज़मादार था बूढा था इतना सोचना क्यों ? ..... सोंचना पड़ता है भई ... सर्दियों की वो कोहरे वाली सुबह जब हांथ शरीर से अलग नहीं किये जाते तब रजाई में धीमे स्वरे में सुनायी देती उसकी झाडू .. गर्मियों की धूल भरी शाम टूटे सूखे पत्तों के साथ मिल कर पंचम स्वर में गाती उसकी झाडू कर्मंडेय वाधिकारस्ते को चरितार्थ करते हुए बस यही आवाज निकालती थी ' कर .. कर ... कर ... कर '  ©
दोपहर थी 5 साल का वसु माँ के हाथ को तकिया बनाये लेटा था । कमरे में  वात्सल्य चरम पर था- बेटे में बातचीत का दौर जारी था ... । 
- मम्मा वो उस दिन सब हमारे घर पे क्यों आये थे ?
- पार्टी थी बेटा । वो तुम्हारे डैडी को मैडल मिला इसलिए । 
- मैडल मिलता तो पार्टी होती ? 
- हां ( माँ मुस्कुरा कर बोली ) 

कुछ महीने बाद *** 

गुप्ता जी के यहाँ आज बहुत भीड़ थी । मिसेज गुप्ता ने पिछले महीने एक सुन्दर से बच्चे को जन्म दिया । आज उसकी खुशी में दावत थी ... 5 साल का वसु भी बहुत खुश था चहक रहा था । दौड़ भाग मचाये था ... गुप्ता जी के दोस्त उसे पकड़ कर दुलराते हुए बोले - वसु बेटा आपके घर में आज क्या है ... वसु - पार्टी है .. मेरी मम्मा को मैडल मिला है - मलंग ©

Wednesday, September 11, 2013

कुछ दिन से उसके मेसेज , काल्स आना बंद हो गए थे । वो फ़ोन करता तो काट दिया जाता ..। आज आफ़िस से छुट्टी ली हुई थी उसने ... रात में 12 बजे फ़ोन किया तो कोई रेस्पोंस नहीं मिला इसलिए सुबह सुबह गुलाब का पूरा गुच्छा ( उसे बहुत पसंद थे न ) लेकर उसके घर पहुँच गया उसे जन्म दिन विश करने ... दरवाजा खोलते ही वो बोली क्यों आये हो इतनी सुबह , पागल , यूं आर एन इडीएट , ए साईको . लोग सही कहते हैं . फॉर गाड्स सेक लीव मी एलोन खुद तो किसी लायक नहीं हो 10000 कमाते हो तुम्हारा खुद का कोई फ्यूचर नहीं है मुझे क्या दोगे ....गो टू हेल ... और दरवाजा बंद हो गया । न जाने क्यों वो अभी तक दरवाजे पर खड़ा था ... तभी अन्दर से आवाज आयी । हेलो सर ... थैंक्यू .. इतना लेट विश कर रहे हैं आप , आप से तो ऐसी उम्मीद नहीं थी ......... अच्छा अच्छा बहाने मत बनाइये ..... मेरी तीनो पोएम्स छाप रहे हैं न आप ? .......
 फूल वही रख कर वो चल दिया ... अन्दर के आख़िरी शब्द जो कानों में पड़े .... " हाँ बाबा उसी रोमांटिक नावेल पे ही काम कर रही हूँ " ....  ©

Tuesday, September 10, 2013

जाम ...

चलो चलो सब ... जाम खुल रहा है । सबने चैन की सांस ली ; रात से जाम लगा था आखिर .. भूखे प्यासे थके लोगों में एक नई स्फूर्ति आ गयी . सब गाडियां निकलने की आपाधापी में लग गए । घटना स्थल पर दोनों ट्रक जिनका आपस में टकराव हुआ था एक तरफ पलटे पड़े थे ... उन्हें देख कर " पक्का साले दारूपीकर चला रहे होंगे , तभी लड़ गए , बड़े कमीने होते हैं ये ट्रक वाले , पूरी रात खराब हो गयी इनकी वजह से " - गुजरने वाला हर दूसरा आदमी यही कह रहा था ... वही सड़क के बाईं तरफ खून के छींटे से सने अख़बार में लिपटा ' बेबी सूट ' , एक तरफ लुढका हुआ टूट चूका लकड़ी का वाकर , उसके साथ ही जमीन पर पड़ा तीन घंटियों वाला झुनझुना जिसकी एक घंटी निकल चुकी थी ... अपनी किस्मत पे रो रहे थे . एक पिता के प्रेम , खुशी को व्यक्त करने से वंचित रह गये थे तीनो ...... ©


काफी संघर्ष करने के बाद उसे स्थायी नौकरी नहीं मिली । वो प्रयास अब भी कर रहा था लेकिन अपने खर्चों के लिए उसने साधारण वेतन पर एक सामान्य से विद्यालय में प्रवक्ता बनने का निश्चय किया ।

- और सुना यार कैसा जा रहा तेरा टीचिंग एक्सपीरिएंस ? 

- बढ़िया ... पर बच्चों को कुछ पता ही नहीं कोर्स के नाम पे पिछली क्लासों में - कुछ पढ़ाया ही नहीं गया उनको .. मैंने तो अतिरिक्त कक्षा के लिए कहा है नहीं तो कोर्स भी पूरा न हो पायेगा ।

- तुम क्या हो यार ? अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मार रहे । कोर्स पूरा नहीं था तो उन्हें घर पे कोचिंग दे देते । बहुत फायदा होता ...

- अरे पर ...

- क्या अरे पर .. इस आदर्शवाद से पेट भी नहीं भरेगा । " तेरा कुछ नहीं हो सकता " .... - मलंग ©


ट्रेन सरपट भागी जा रही । सामान्य श्रेणी के डिब्बे में राजनीति , धर्म , आध्यात्म , जीवन दर्शन , विज्ञान , खेल को समेटे एक खुली चर्चा चल रही थी । किशोर , युवा , वृद्ध , अधेड़ सब अपने अपने विचार रख रहे थे । खिड़की से बाहर शून्य में झांकता हुआ सा वो ... बीच बीच में हर विषय पर जानकारी पूर्ण और सटीक टिप्पणी कर देता ... ... इतने कम समय में ही उसकी योग्यता / विद्वता के सब कायल हो गए थे .. ऐसा लगने लगा कि कोई ऐसा विषय नहीं जिसका वह ज्ञाता न हो हर विषय पर बोल सकता था वो . फिर अचानक एक वृद्ध ने जिज्ञासावश पूँछ लिया कि - बेटा आप करते क्या हैं ? ...उसके पास कोई जवाब नहीं था । आखिर एक बेरोजगार जो था ....- मलंग ©
- अच्छा तुम्हे कैसे गाने पसंद है ? हूँ इज योर फेवरेट सिंगर ? 
- रोमांटिक .. ग़ज़ल भी सिंगर तो कई पसंद है .. जैसे शान सोनू निगम जगजीत सिंह.. और आपको ? 
टीवी पर आ रहे गीत ' पहली पहली बार बलिये दिल गया हार बलिये ' की वोल्यूम बढ़ाते हुए बोला .... मुझे भी ... 
 पार्श्व में पूजा करते पिता की आवाज भी आई ' सुबह सुबह टीवी और उस पर इतनी तेज फ़िल्मी गाने कौन चला रहा है मयंक की मम्मी कोई आया है क्या ' ? - मलंग  ©

Monday, September 9, 2013

" देखो रामायण नहीं राम चरित मानस पढी होगी तुमने । रामायण तो घरों में बहुत कम होती पर मानस तो लगभग हर घर में पाई जाती । ' दिनकर जी को तो तुमने पढ़ा ही होगा कुरुक्षेत्र रश्मिरथी जैसे काव्य सो काव्य .. गद्य साहित्य भी गजब का लिखा संस्कृति के चार अध्याय शुद्ध कविता की खोज आदि ... अच्छा पुराने गाने पसंद है तुम्हे ? मैंने जो लिखा था ' कई बार यूं ही देखा है ' वो तुम्हे मुझसे ही पहली बार पता चला था न ... कैसा लगा बताओ " बकर बकर करते करते उसने देखा कि वो चेहरे पर मुस्कान , आँखों में मन की चीज मिलने की खुशी की चमक लिए अपनी चेहरा हाथों में टिकाये बस उसे ही देख रही है ... उसकी आँखों में झांकते ही उसे सारे उत्तर मिल गए । पर एक पल उसकी आँखों में देखने के बाद उसने नजर हटा ली ... परिवार , समाज , जाति , कुल , गोत्र , आर्थिक स्थिरता , कुलीनता संबंधी भावी प्रश्नों ने उसके दिमाग में जगह बनाना शुरू कर दिया था .... - मलंग ©

Sunday, September 8, 2013

-तिवारी जी गुड मार्निंग ..

- गुड मार्निंग मंसूरी साहब .. आज लेट कैसे हो गए ? 

- रात बेगम के भाई की बेटी को लेकर परेशान रहा ... मुजफ्फरनगर में है न वो जाकिया ...

- वहां के हालात तो बेहद खराब है , ज़ाकिया लोग ठीक तो हैं न ? 

- हां ठीक तो हैं ... पर आप तो जानते हैं न दंगे बड़े गहरे जख्म दे जाते ... सियासी खेल होंगे अब इस पर लोग भूलना चाहे तो भी जख्म कुरेदे जायेंगे बे वजह बेगुनाह परेशान होंगे 

- मंसूरी साहब ... जिस शहर में दंगे होते वहाँ बेगूनाह कोई नहीं ... लोग कहते है की दंगे सियासी लोग करवाते ... हम नहीं मानते । चार सफ़ेद पोश आये चार बातें की और आप चले एक दूसरे का कत्ले आम करने ... जनाब बड़े बुजुर्गों को चाहिए नहीं कि अपनी औलादों रिश्तेदारों को ये सब करने से रोकें ... सच पूछिए तो दंगो में ही शराफत और मोहब्बत की परीक्षा होती ... - मलंग ©.
' नमस्ते ... अपनी बात किस तरह कहूं समझ नहीं आ रहा । बस ये जान लीजिये कि रोज रोज आपकी प्रोफाईल देखता हूँ । आपकी प्रोफाईल पिक्चर ओपन है उसे निहारता रहता हूँ । जानती हो आपके कवर पर लगे चित्र में जैसे अँधेरे में चाँद चमक रहा है । ठीक वैसे ही आपके मुस्कुराते चेहरे में आपकी आँखे चमकती हैं । आपकी प्रोफाईल में आपके रोज रोज आपके वही वर्क प्लेस , वर्क पोस्ट पढता हूँ लेकिन फिर भी उमंग से भर जाता हूँ । आपका सानिध्य चाहता हूँ । आपको सोचता हूँ । आपसे बातें करना चाहता हूँ । आपको जानना चाहता हूँ ? क्या आप मेरी ' तुम ' बनेंगी ? ' लिखा और साथ में ' कई बार यूं भी देखा है ' गीत का वीडियो अटैच किया लेकिन send बटन दबाने से पहले ही उसे याद आगई उसे अपने अतीत के कुछ सच ... जो शायद 'सभ्य' समाज में स्वीकार्य नहीं होंगे और जिन्हें छिपाने को उसकी अंतरात्मा कभी नहीं कहेगी । क्योंकि आत्मा पर झूठ का बोझ बहुत भारी लगता है ..... - मलंग 

Saturday, September 7, 2013

सरकारी खजाने में गबन के कारण पिता जेल में था चौराहे पर उसका लड़का सुनील फल का ठेला लगाने लगा था । शर्मा जी हर रोज आते और एक किलो सेव ले जाते । न बरसात की चिंता न गरमी की , न कोई मोल भाव , न कोई बात बस सेव तुलाते ले जाते छः महीने से ऊपर हो गए थे । पर 10 दिन हो गए सेव लेने वो नहीं आये । फिर अचानक एक दिन 18-19 साल का लड़का आया सुनील को एक हजार के नोट की 2 गड्डी दी और बोला - पापा ने देने को कहा था । तुम्हारे पिता का कर्ज था उन पर , पापा की गवाही के कारण ही उन्हें सजा हुई । सुनील का चेहरा तमतमा उठा । आँखे लाल हो गईं । रूपये की गड्डी को फेंकते हुए वो लड़के का गिरेबान झकझोरता हुआ बोला - तो वो तेरा बाप था ? कौन था वो ? वो कमीना खुद क्यों नहीं आया ? लड़का - (गहरी सांस लेते हुए ) वो अब इस दुनिया में नहीं है । लाल बाईक से जिसपे ' रोहित ' लिखा था सेव लेने आते थे वही थे .... सुनील के हाथों से गिरेबान छूट गया और लाल आँखों में पानी और अविश्वास उत्पन्न हुआ और मुंह से अनायास ही निकल पड़ा - अरे नहीं .. कैसे ? ( निरंतरता से बने सम्बन्ध भी प्रेम की तरह प्रगाढ़ होते है ) ©.

Friday, September 6, 2013

नई उम्मीद

न्यूज चैनल की वैन सरपट दौड़े जा रही थी । गांव जाकर रुकी आखिर रेल बजट में आज नई रेलवे लाईन की घोषणा हुई थी । गांव वाले भी खुश थे । पत्रकार सबसे पूँछ रहा था कि इस रेलवे लाइन से क्या उम्मीद आसरा लगाए हो । कोई यातायात की सुलभता बताता तो कोई कृषि व्यापार में बढ़ोत्तरी की । घुरई से पूंछा कि रेलवे लाइन पास हुई तुम क्या उम्मीद आसरा लगाए हो ? घुरई - बहुत आसरा लगाए हूँ बाबूजी । ठाकुर साहब के खेत में हगत हगत ( शौच करते करते ) बहुत दिन हुई गए अब रेल पटरी के किनारे आराम से करिहौं ....  ©
- अम्मा री मोय मेई साल गिरा पे रिमोट वाई कार दिबाये दियो 

- लल्लू रे जे रिमोट वाई कार का होवे ?

-  रिमोट वाई कार बड़ी चोखी होवे , बड़े बाबू को छोरा आगरे ते लाओ है । बाये दूर ते ही चालानो पडत । बड़ो मजा आवे

- दूर ते काये चलावों पड़े ? बामे बैठवे को न होत का कछु ? तेये बापू तो टिरेक्टर बैठ के ही चलावे ...

- बापू ठीक कहे है तू निपट गंवार ही रहेयी ... मैं जाय रओ खेलवें ( भाग जाता है )

- सही कहे छोरा निपट गवांर ही रहूँ मैं न तेयो बापू कछु समझाये पाओ न तू ...... आय रई हूँ काये मरी जाय रही है ( रंभाती भैंस को पानी पिलाने लगती है ) - मलंग 
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- एक लोहे की ग्रिल बननी है है
- बन जायेगी मास्टर साहब
- ये लो नाप 
- कितना खर्च आएगा 
- यही कोई 1500 रूपये 
- ठीक है मिलेगी कब 
- कल मिल जायेगी 
- ठीक है मैं कल आऊँगा कुछ एडवांस चाहिए
- कल ही ले लूंगा मास्टर साहब 
- ठीक है
- मास्टर साहब चाय पिए जाईये 
- नहीं तुम लोग पियो 
- अरे मास्टर साहब पी लीजिए अब आ गयी है ।
 मास्टर जी ( हसते हुए ) - पैसे के मामले में गणित सही है तुम्हारी पर चाय के मामले में गड़बड़ा गयी । चाय चार गिलास ही हैं और मुझे मिला कर पांच लोग .. वैसे भी आर्डर तुमने मेरे आने से पहले दिया फिर मेरे लिए चाय कैसे आयेगी ?
- मास्टर जी पैसों में व्यापार वाली गणित लगाता और चाय में सत्कार वाली ... हम चारों तीन की चार कर लेंगे आप पूरी ले लीजिये ..... - मलंग 

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कुलीनता

आपका ये साईकिल प्रेम कब बंद होगा ( वन्दना झल्ला कर बोली )

अब क्या हुआ अब किसने क्या कह दिया - विनोद बोला

किसने ? अरे पूरी कालोनी ने मजाक बना रखा है । बाई बता रही थी सेठी साहब कह रहे थे कि पेट्रोल के पैसे तक नहीं हमारे पास गरीबी आ गई हमारे - वन्दना बोली 

विनोद - हा हा हा

वंदना ( सब्जी काटते हुए )- हां आप तो हंस कर आफिस चले जाओगे और यहाँ मेरी दिन भर हंसाई होती है । आपको तो याद दिलाना पड़ता है उस दिन जब दूध लेकर आये थे तो वो वर्मा जी क्या कह रहे थे कि भाई साहब दो कैन बाँध लीजिये हम सबका भी दूध ले आया कीजिये । पर आपको तो कोई परवाह ही नहीं न अपनी इज्जत की न हमारी 

विनोद ( वन्दना के हाथों से चाकू लेते हुए ) - यार चाकू वाकू लेकर इतना गुस्सा मत किया करो डर लगता है । 

वन्दना - जाओ अब सब्जी काटने दो 

विनोद - वन्दना देखो सब्जी दूध ब्रेड खरीदने अगर एक दो किलोमीटर साईकिल से जाता हूँ तो उसमे नुकसान क्या है ? पर्यावरण प्रदूषण कम होता , व्यायाम भी हो जाता । पेट्रोल बचता सो अलग . ये तो समाज सेवा है.. बीस हजार के ट्रेड मिल पर दौड़ने से बेहतर है ये .... जो हंसते हैं उनमे आत्म विश्वास नहीं है इस सामाजिक आवश्यकता को समझने , स्वीकार करने का  ...ध्यान रखो कुलीनता खर्च करने दिखावा करने में नहीं होती । कुलीनता सदुपयोग में होती । - कौशल मलंग ©

Thursday, September 5, 2013

पापा 100 रुपये दीजिये कल स्कूल में टीचर्स डे सेलीब्रेट करने के लिए फंड इकठ्ठा कर रहे हैं । - 12 साल का बिपिन बोला । पिता - तुम्हारे स्कूल वाले भी किसी न किसी बहाने पैसे ऐंठते रहते हैं । हजारों जो फीस में देते वो टीचर्स के काम ही तो आती फिर ये टीचर्स डे के लिए अलग से पैसे क्यों ? ( पिता किताब एक तरफ रखते हुए बोले )बिपिन - आपको पता भी है कि हम टीचर्स डे क्यों मनाते हैं ? हमारे second president काbday होता है । डा. राधाकृष्णन जी का । पापा - अच्छा वो पर वो तो अब हैं नहीं और president का bday तुम क्यों मनाते हो ? क्या किया था उन्होंने ?बिपिन - पापा वो एक टीचर थे बहुत intelligent थे बहुत सारी बुक्स लिखी उन्होंने जानते हो उनके bday पे country के अच्छे अच्छे टीचर्स को मैडल देते । हम भी अपने टीचर्स के साथ celebrate करेंगे तो उन्हें भी अच्छा फील होगा । अब मुझे पैसे दो सोना है ...पिता जो relgion science and culture नामक पुस्तक पढ रहे थे मुस्कुरा कर पैसे दे देते हैं । - मलंग 

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भूरा - घर के पास ही थी वो बिल्डिंग मैटेरियल्स की दूकान । ' भूरा ' वहीं काम करता था । दिन हो या रात सर्दी हो या गर्मी अपने पुराने साईकिल रिक्शे में वो सीमेंट गिट्टी बालू की बोरियों को आस पड़ोस में डाला करता था । प्लास्टिक की मोटे सोल वाली चप्पलें जिसमें बाएं पैर का तलवा दायें से अधिक घिसा हुआ ,एड़ी से दो इंच ऊपर तक का पैंट और बनियान उसका वेश था । कंधे गले हाथों में सीमेंट और पसीने के कारण उपजी खुजली के जख्म उसके पुरुस्कार थे । ' उस दिन 4 बोरियां लेकर आया धुप थोड़ी तेज थी तो पानी पीकर बरामदे में बैठ गया । ये पूंछने पर कि ऐसा हाल क्यों बनाए रखते हो दिक्कत नहीं होती भूरा ? ... हँसने लगा बोला - का करैं यहै हमार किस्मत हवे । औउर हमार नाम भूरा नाही है बाबूजी लक्ष्मी प्रसाद है , सिलीमेंट ( सीमेंट ) बारू ( बालू ) ढोए ढोए ऊजर ( सफ़ेद ) हुई गा हौं यहै से सब भूरा कहत हैं । ......- मलंग 
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नहीं नहीं इन चार चादरों के हम 500 रूपये ही देंगे - महिला बोली
फेरी वाला - बीबी जी 125 में एक मीटर शर्ट का कपड़ा न आयेगा और आप दो सवा दो मीटर की इम्पोर्टेड चादर के लिए कह रही हैं । चलिए 400 की एक कह रहा था आप 1500 दे दीजियेगा ।
महिला - इम्पोर्टेड सिम्पोर्तेद कुछ नहीं है पिछली बार ऐसे ही बोल कर गया था तुम जैसा कोइ दो बार धुलने के बाद चादर सिकुड़ गयी थी रंग खराब हुए सो अलग 500 की देना हो तो दो
फेरी वाला - बीबी जी इस बार मुझसे लेकर देखिये खराब हो तो पैसे वापस चादर दूंगा सो अलग । आपके लिए 300 की एक लगा दूंगा इससे कम में नुक्सान होगा 
महिला - तुम सब ऐसे ही कहते एक बार के बाद कोइ नहीं आता । 500 से ज्यादा नहीं दूंगी ।
फेरी वाला - मैं आता हूँ बीबी जी वो 12 नम्बर वाली वर्मा बीबी जी के यहाँ मैं 6 साल से आ रहा आप नयी आयी हो मेरे बारे में पता नहीं आपको ... 500 में नहीं होगा । 500 में तो खरीद भी नहीं ... दिन भर भूखे प्यासे घुमते हैं आप नुक्सान करवा रही है 200 की लगा दूंगा इससे कम में बिलकुल न होगा । 
महिला - भूखे प्यासे हो ? सुन राधिका ( छोटी बहन ) इसे खाना खिला दे बेचारा भूखा है । ( 600 रूपये देते हुए ) ये लो अब ठीक है । 
फेरी वाला - एक हाथ में 4 रोटी और भिन्डी की सब्जी की प्लेट और एक हाथ में 600 रूपये ले लेता है । 
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( अन्दर ) राधिका - वाह दीदी तुम्हारा जवाब नहीं तुम्हारी रोटियों ने लूट लिया बेचारे को..... - मलंग 

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Wednesday, September 4, 2013

मंदिर के बाहर वो बूढा रोज बैठता था । मिली हुई टी शर्ट मटमैला पैजामा पहने एक झोली एक झाडू और सरकारी कम्बल की पूंजी समेटे बस वहीं मंदिर की सीढ़ियों में बैठा रहता और एक हाथ किसी दुर्घटना में गवां चूका था फिर भी रोज मंदिर की दहलीज तक झाडू लगाना और आने जाने वालों से राम राम हरि ॐ कहता रहता था , पर मांगना हाथ फैलाना उसकी फितरत में नहीं था । वो ' बाबूजी ' भी 10 बजे के आस पास रोज आते थे। मंदिर के गेट से सीढ़ियों तक लगे पत्थरों में उनका भी नाम लिखा था । मंदिर के गेट पर गाडी खडी करके आते अपने महंगी वाली चप्पलें सीढ़ियों पर उतारते अन्दर जाते दर्शन प्रसाद प्राप्त कर वापस आ जाते । सीढ़ियों पर बैठे भिखारियों से उनका छत्तीस का आंकड़ा रहता था , रोज किसी न किसी को झिडकते सीढियां उतरते थे । बूढ़े से कुछ ख़ास ही चिढ होती थी बात करना देखना तो दूर उसके राम राम का जवाब शायद ही कभी दिया हो । पर आज सीढियां तप रहीं है बाबूजी जैसे तैसे सीढियां उतरते हैं । पर ये क्या आज उनकी चप्पलें गायब हैं बाबूजी बुरा भला कहते हुए आगे जाने की कोशिश करते है पर आज उनके नाम लिखे पत्त्थर ही उनके पैर जला रहे हैं । वो बूढा अपनी फटी चप्पलें आगे करके कहता है बाबूजी ये पहन लीजिये गेट पर उतार दीजियेगा । बाबूजी शब्द शून्य होकर वैसा ही करते हैं ....  ©

Tuesday, September 3, 2013

खुले आँगन में तुलसी के पौधे लगे थे और वही भगवान शिव की प्रतीक ' बटइया ' थी । माँ रोज 7-8 के बीच उनका जलाभिषेक करती । दीपक जलाती चन्दन रोली चावल चढ़ाती । थोड़ी देर में न जाने कहाँ से एक गौरैय्या आती और चावल चुन कर फुर्र हो जाती । माँ के संज्ञान में आते ही चावलों की मात्रा एक चुटकी से बढ़ कर एक मुट्ठी हो गयी । अब तो ये हालत थी कि माँ की पूजा से पहले ही वो आ जाती थी । आज 9 बज रहे हैं वो बरामदे में आकर चहक रही है इधर उधर देख रही है । माँ आज पूजा नहीं कर सकती बीमार है पर आज श्रुद्धा के आगे प्रेम की चलेगी । माँ चावल आँगन में डाल देती है । ....  ©
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