- ताला सही करते हो ?
- पापा करते है
- तुम क्या करते हो
- पढ़ता हूँ
- किस क्लास में ?
- दो में
- क्या नाम है ?
- कलन
- कलन ? ये कैसा नाम है ?
- * एक प्यारी मुस्कान *
- सही नाम बताओ
- कलन नहीं करन ( पान गुटखा बेचने वाला लड़का बोला )
- अच्छा करन है..
- हाँ
- तुम भी बनाते हो ताले ?
- नहीं पापा बनाते
- तुम्हे बनाना आता ?
- नहीं
- थोडा बहुत भी नहीं ?
- * एक प्यारी सी मुस्कान * नहीं
- अच्छा ताले बनाना अच्छा लगता ?
- नहीं
- फिर क्या अच्छा लगता ?
- पढना
मुस्कान मेरे चेहरे पर थी अब .....
.............कब यहां अमर विस्वास , अमिट है कब आस्था ? बस एक शून्य जिसमें होता सब कुछ विलीन , आबद्ध परिस्थिति - मनोवृत्ति की सीमा से , मै जो लिखता वह सब कितना अर्थहीन !
Thursday, April 10, 2014
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Monday, April 7, 2014
हिसाब बराबर
कानपुर जाने को खड़ी बस में वो 18-19 वर्ष का तरुण युवक चढ़ा , बस भरी नहीं थी पर अधिकतर सवारियां आगे और खिड़की पर काबिज थीं । अक्सर आता जाता रहता इसलिए जानता था कि ज्यादा पीछे बैठना शरीर के लिए असमय बुढापे का अनुभव कराने जैसा होगा । ठीक कंडेकटर की सीट के पीछे खाली सीट जिसमे मात्र 35-36 वर्ष का एक प्रौढ़ युवक बैठा था बैठने को हुआ ही था कि प्रौढ़ युवक बोला ' खाली नहीं है ' । प्रौढ़ युवक के मौन और तरेरती आँखों से ' कोई बैठा है क्या ? ' का जवाब पाकर वो तरुण युवक सहज भाव से पीछे की सीट पर चला गया । सीट पाने के बाद रास्ते के लिये कुछ खाने का प्रबंध करने हेतु नीचे उतरने के दौरान अनायास ही उसके कानों में प्रौढ़ युवक अपने बड़े से फोन पर कहता सुनाई दिया ' समझा करो डार्लिंग इलाहाबाद जा रहा हूँ .. बहुत जरूरी है ... कल नहीं तो परसों वापस आ ही जाऊँगा ' अब जलपान को छोड़ बस से उतर कर उसने फिर से बस के गन्तव्य का पता किया । बस कानपुर ही जा रही थी निश्चिन्त होकर उसने सोचा बस में चढ़ेगा तो उन्हें भी बता देगा कि बस कानपुर जा रही इलाहाबाद नहीं । पर जैसे ही बस में चढ़ा प्रौढ़ युवक को कंडेक्टर से कानपुर का टिकट लेते पाया । जलपान और अचरज के साथ वो अपनी सीट पर जाके बैठ गया , उसकी जिज्ञासा प्रौढ़ युवक के प्रति बढ़ गयी थी लेकिन पुरानी सरकारी बस और पुरानी बहुएं आवाज अधिक करती हैं इसलिए उसे फोन का वार्तालाप स्पष्ट समझ नहीं आ रहा था । शहर छोड़ मुख्य सड़क पर आ चुकी बस और सीट पर अभी तक अकेले बैठे उस प्रौढ़ युवक का एक फोन जेब में रख दूसरा निकाल कर बात करना , अनायास ही मुस्काना फिर बड़े फोन पर कुछ टाईप करना सब स्पष्ट कर रहा था । तरुण युवक का मन खिन्न हो गया न जाने क्यों उसे उस अज्ञात ' डार्लिंग ' से हमदर्दी हो रही थी लेकिन वो कर भी क्या सकता था इसी उधेड़बुन के बीच कानो में इयर फोन ठूस कर वो कब सो गया पता नहीं चला और जब गर्मी पसीने की वजह से नींद खुली तो रेलवे क्रासिंग पर बस को खड़ी और प्रौढ़ युवक को बड़े फोन पर ' चालू ' पाया ... अंगड़ाई लेते हुए पानी की बोतल मुंह से लगाई ही थी कि एक क्लास मेट का फोन आ गया ... अब उसकी आँखे चमक उठीं , मुंह में गया पानी झट से अन्दर करते हुए उसने खड़े होकर फोन पिक किया और चिल्लाते हुए बोला ' कानपुर जा रहा हूँ ... कानपुर ... हाँ हाँ कानपुर जा रहा हूँ .. 9 बजे चली थी बस ... कानपुर जा रहा हूँ .. कानपुर ' । अब बस में उसे बड़ी विचित्र नज़रों से देखा जा रहा था , ' पागल कहीं का ' कुछ लोग बुदबुदाए भी पर उसे फर्क नहीं पड़ता ...उसे हिसाब बराबर करना था वो उसने कर लिया । - कौशल ©
Sunday, April 6, 2014
सवाल
श्रृद्धालुओं के जत्थों के बीच ' जय माता की ! जै मैय्या की ! जय माँ की ! ' के तेज उद्दघोष करने की होड़ मची थी , सब पूरे जोश से इसमे अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर रहे थे । आगे वाला जत्था बोलता फिर पीछे वाला उसका जवाब देता काफी देर चलने के बाद विश्राम जलपान के लिए वो जत्था रुका और फिर जब दुबारा चला तो बड़ों का जयघोष मौन में बदल चुका था आस्था श्रृद्धा भक्ति से फूटते प्रचंड स्वर आज एक मासूम सवाल से घुट कर रह गए थे । ' कन्या के रूप में आई मैय्या ' बजने के बीच माँ से तमाचा बाप से झिड़क और ' ये सिखाते है आप ' जैसे प्रश्न उठने से पहले उस अबोध बच्ची ने बस इतना पूछ लिया था ' पापा अंकल आज आप लोग पूरा क्यों नहीं बोल रहे ... जैसे रोज बोलते हैं ' तेरी माँ की ** ' .... - कौशल ©
Thursday, April 3, 2014
दोष
आफिस के अन्दर बॉस और आफिस के रास्ते पर ट्रैफिक जाम शांतिपूर्ण नौकरी के लिए दो सबसे बड़ी मुसीबतें होती हैं । भारी ट्रैफिक के बीच एक कार वाला अधेड़ व्यग्रता तत्परता से समय के साथ प्रतिद्वंदिता करता भागा चला जा रहा था पर गांधी रोड की रेड लाईट पार की तो कड़ाके की ठण्ड में स्कूटर पर माँ बाप के बीच बैठे बच्चे को देखकर मानो समय रुक गया । इससे पहले कि वो रतन टाटा बनता कि उसे अपना परिवार याद आगया उसे ये याद आया कि कैसे अन्तरंगताओं के उन क्षणों में उसकी संतान बीच में आ जाती और जिस शरीर का वो आलिंगन चाहता उससे लिपट कर सो जाती , कैसे वो पति पत्नी से पहले माँ बाप हुआ करते थे , एक पल को चेहरे पर मुस्कान खिल उठी लेकिन ' आप कैसे किसी को मेरे लिए चुन सकते हैं .. पापा मेरी निजताएं स्वतंत्रताएं हैं Its my life .. Its my life' सोच कर कब वो ऊर्ध्वापातित हुई भनक तक न लगीं , और Its my life का स्वर बाईं तरफ से लेन में घुसने का प्रयास करती बाईक के कर्कश हार्न में तब्दील हो गया .. अब न चाहते हुए भी उसे ब्रेक लगाना पड़ सकता है , जानता है कि दोष हमेशा बड़ी गाडी वाले को ही दिया जाता ... - कौशल ©