Monday, July 21, 2014

बदचलन

पुलिस ने क्या गजब की तत्परता दिखाई थी इस बार , सामूहिक बलात्कार - हत्या की गुत्थी बस तीन दिन में सुलझ गयी । महिला स्वयं अभियुक्त के साथ रात में अनजान जगह गयी थी , वहां उसकी हत्या हुई थी बलात्कार नहीं और एक मात्र दोषी पकड़ा जा चुका था । परिणाम स्वरूप प्रति हजार / बलात्कार के आंकड़ो में ' वांछित ' कमी आ गयी । ... और ये अलग बात है कि दबी दबी जुबान में ही सही फिर एक औरत को ' बदचलन ? ' कहा जा रहा था । © - ब्रह्म राक्षस

सुबह - सुबह


लड़का - हे बेब !
लड़की - एक बार में समझ नहीं आता तुम्हे ...
लड़का - क्या ?
लड़की - Don't call me babe .
लड़का - अच्छा अच्छा sorry ..
लड़की - ठीक है ।
लड़का - अच्छा Hey bomb चलेगा ? ( हँसते हुए )
लड़की - मर जाओ तुम ...  Im not replying ..
लड़का - ( फिर से हँसते हुए )अब समझा तुम हनुमान चालीसा क्यों नहीं पढ़ती ..
लड़की आँखे बंद कर के चेहरा घुमा लेती है ... जरूरी थोड़ी न है कि हर बार आखें आंसू ही छिपायें । © - ब्रह्म राक्षस

Sunday, July 20, 2014

मर्यादा

वो रक्त रंजित विदीर्ण शरीर तड़पता रहा रात भर । जीने के लिए .. अपनी  असहाय संतानों से एक आख़िरी बार मिलने के लिए और एक चुल्लू पानी के लिए । पर उसे कुछ भी नसीब न हुआ ... सुबह को ' पेट के बल ' पड़ी मिली उसकी लाश और चारों तरफ बिखरा खून लोगों के लिए उसका ' घिसटना ' भर था पर वास्तव में वो छिपाना चाहती थी अपने रात भर नोचे घसोट अंग .. क्योंकि जानती थी वो सभ्य समाज का सच  ... और इसकी मर्यादा । - © ब्रह्म राक्षस

Friday, July 18, 2014

प्यार

उस दिन ये कालेज से जल्दी घर आ गया  , एकांत निजता को पूरी तरह सुनिश्चित करने के बाद इसने अखबार के गड्ड के सबसे नीचे वाले अखबार में छिपी वो पत्रिका निकाली । माथे पर पसीना , चेहरे पर खिलती मुस्कान , दिल की धड़कन और पलटते पन्नो में गजब का सामंजस्य बिठाते हुए  फोन पर कन्फर्म किया ' तीन बजे आओगी न ? ' .... ' हाँ और  ..  ' जवाब पूरा सुने बिना ही इसने फोन काट दिया । अब पूरा समय था इसके पास ,  मेरे साथ अपने काम में जुट गया , चूंकि पहली बार ये सब कर रहा था इसलिए गजब का नर्वस था , बार बार पसीना पोछता कांपते हाथों से इसने बहुत कुछ किया , पर अति उत्साह अनुभवहीनता ने बेमेल नमक चीनी मसालों का रूप ले रखा था ,  लेकिन हम जानते थे जिसका जन्म दिन है उसे ये सब नहीं खलेगा , बेजान कहे जाने वाले हम जब खुद में उड़ेले ' प्यार ' को चख पा रहे तो फिर वो तो इसकी ' माँ ' है  । - कढाही की आत्मकथा © - ब्रह्म राक्षस

Sunday, July 6, 2014

जवाब

उस छोटे कस्बे से इस बडे महानगर मे आई मां बिल्कुल भी नहीं बदली थी । स्टेशन , मंदिर या बाजार हर जगह फ़ैलने वाले खाली हाथ मे कुछ न कुछ डाल देती । आखिर बेटे ने मां से कह ही दिया ’ अरे मां ये शहर है , ये सब हाथ इसलिये नहीं फ़ैलाते क्योंकि ये मजबूर हैं , जरूरतमंद हैं , ये तो इनका काम – धंधा  है , व्यापार है  … है न पिताजी ? “ बदले में मां की सदाबहार झिडक तो समझ गया पर पिताजी की मुस्कान सवाल बन के रह जाती .. अगर अगले दिन पिता के साथ कार में सफ़र करते हुये उनके एक सवाल पर खुद के दिये इस जवाब  “ पिताजी सडक पर कौन सा गड्ढा कितना गहरा है पानी भरा होने की वजह से पता नहीं चलता इसलिये हर बार धीमी कर के सावधानी बरत रहा हूं “ पर उन्हे फ़िर से उसी तरह मुस्कुराता हुआ न पाता ।  - © ब्रह्म राक्षस ( कौशल )