Tuesday, November 25, 2014

खरीददार

बहुत रसूखदार पत्रकार , साहित्यकार हैं वो, आज बहुत दिन बाद फ़ेसबुक पर लागिन किया तो उनकी प्रोफ़ाईल पर ’ सत्यमेव जयते ’ लगा हुआ हुआ पाया , पिछली बार की हुई बातें याद आ गईं ...
- सर आपके आफ़िस, घर, यहां तक कि प्रोफ़ाईल पिक कवर पिक सब पर फ़ूल रहते हैं लगता है आपको फ़ूल बहुत पसंद हैं ?
- हां !
- कोई खास वजह ?
- कई हैं ?
- मसलन ?
- पुष्प अपने आप में सकारात्मक सृजन का प्रतीक हैं , अनमोल होते हैं , मिट्टी कीचड और गंदगी में खिल आते हैं बस उजाला और पानी मिलता रहे ।
- वाह ! ... सर आपके घर पर फ़ुलवारी है?
- नहीं
- गमले ?
- नहीं ...
- तब तो आप फ़ूल खरीदते होंगे ?
- हां !
......:- ब्रह्म राक्षस ©

Tuesday, September 23, 2014

एक और कविता

अँधेरे गहरे कुएं में
बाल्टी गिरती है
और गूंजती है
छपाक की आवाज !
फिर
खीचना पड़ता है
जिसे पूरे जतन से
निकालने को
एक और अदद भरी बाल्टी

बस बिलकुल इसी तरह
ह्रदय के कुँए में
गूँज उठता है
तुम्हारा नाम
फिसलती साँसों को जकड़ कर
खीचता हूँ
ताकि निकल सके
एक और दिन । - ब्रह्म राक्षस ©

Thursday, September 18, 2014

आदमखोर

ज्वाईनिंग लेटर लेने के लिए रोज की तरह आफिस में शांतिपूर्ण भीड़ लगी थी । इस में आफिस में सब अपने मन चाहे शरीर के लिए आवेदन करते और साहब उनको उनके कर्मो के हिसाब से ही अगला जन्म आवंटित करते थे । आज इंसान के रिक्त पदों की संख्या कम थी इसलिए मनुहार गुहार भी चलन में थी , इसी क्रम में ' सर मैं पिछले जन्म में बाघ था और मुझे बहुत बुरी तरह गोलियों से छलनी कर लाठी डंडो से पीट कर , जिन्दा भून दिया गया था मैंने बहुत कष्ट सहे इसलिए मुझे इंसान बनाया जाए । ' एक आत्मा ने निवेदन किया । साहब ने उसकी फाईल देखना शुरू ही किया था तभी पीछे से दूसरी आत्मा बोली ' सर इसे नहीं इंसान मुझे बनाईये क्योंकि मेरे साहस और युक्ति के बल पर ही ये मारा जा सका था और लोगों को इसके आतंक से मुक्ति मिली , ये इंसान बनने का हकदार नहीं ये तो आदमखोर था । ' अब साहब मुश्किल में पड़ गए थे क्योंकि पहली आत्मा ने सवाल किया था ' सिर्फ आदमखोर होना अपराध होता क्या सर ? फिर भूख मिटाने के लिए आदमी क्यों ' हलाल ' किया करता है ? ' - ब्रह्म राक्षस ©

Tuesday, September 16, 2014

मिठास

' प्रसूता क्या जानबूझ कर बच्ची को जन्म देती ... नारी को जननी मानते है देवी मानते हैं ... जब कल को नारी नहीं होगी तो संसार में सृजन कैसे होगा ... पहले मेल फीमेल का रेशियो इतना था अब कम होकर इतना हो गया .. ' लड़की कॉफी टेबल पर सामने बैठे लडके को सुनाये जा रही थी । लड़के ने शुगर क्यूब की तरफ इशारा किया तो लड़की और भड़क गयी , सारी पुरुष जाति उसके निशाने पर आ गयी , काफी सुनाने के बाद लड़की ने लडके पर ही सवाल दाग दिया ' अच्छा तुम इकलौते हो माँ बाप के , कल को अगर तुम पिता बनो और लड़की हो तो क्या करोगे .. बोलो ? ' ... कॉफी मग से बाहर झांकते हुआ लड़का बोला ' करना क्या है .. या तो तुम उसे नाम दे देना नहीं तो मैं दे दूंगा तुम्हारा नाम ' ... लड़की झेपी मुस्कुराई और कॉफी मग को होठो से लगा लिया अब उसकी चमकती आँखे शायद कॉफी की मिठास को बयां कर रहीं थी । - ब्रह्म राक्षस ©

एक खबर

नेता जी की चुनावी सभा थी । व्यवस्था हो रही थी विकास सड़को के गड्डे भर रहा था , रोशनी सभा स्थल पर लगे जनरेटर्स से ईंधन पी रही थी , पूंजी निवेश मंच में एसी कूलर लगा रहा था , गरीबी बसों गाड़ियों में भर भर लाई जा रही थी , अशिक्षा पूड़ी सब्जी के पैकेट बना रही थी और स्वास्थ्य टेंट से दूर खड़ी दो गाड़ियों में भरी बोतल पाउचो की रखवाली कर रहा था । इन्फ्रास्ट्रक्चर बड़े से मैदान के एक छोटे से हिस्से को छाया दे रहा था । फिर मंत्री जी आये धर्मनिरपेक्षता - साम्प्रदायिकता - जातिवाद ...... हुंकार -  टंकार , माला - मुकुट , तलवार - गदा बन कर छाये रहे और सभा समाप्त हुई हुई । अगले दिन में बिके हुए सच में सबसे ऊपर बड़ी लिखावट और 20-25 पंक्तियों में छपा था ' भारी जन समूह - सफल सभा ' जिसकी नीव में थे क़त्ल , लूट , बलात्कार और बेरोजगार की आत्म हत्या के कुछ्ले दबे हुए 4 पंक्ति के सच । - ब्रह्म राक्षस ©

दारोगा

शाम को मैदान से आने के बाद सीधे अपने कमरे में चला गया ,  नहा धोकर स्वाध्याय करने बैठ गया  , व्यस्तता परीक्षा के दिनों की तरह खाना भी अपने कमरे में लाकर खा लिया । फिर सुबह रोज की तरह व्यायाम नित्य कर्म करके अखबार नाश्ता भी बाहर बरामदे में कर लिया । चुपचाप कचहरी को निकलने वाला था कि वो उम्र दराज , चश्मा लगा चेहरा जिसके सामने मैं कल शाम से नहीं आया था दरोगा के जैसे बोल उठा ' दाईं आँख को क्या हुआ छोटी छोटी सी क्यों लग रही ... इधर आ जरा ' । अब झूठ फिर हकला रहा था ' म्म म्म माँ कुछ नहीं हुआ ' । - ब्रह्म राक्षस ©

Monday, September 15, 2014

दस गाँव भोज

6-7 साल की देह को आज थोड़ी साफ़ और सिली चिरकोटी पहनने को मिल रही थी । आज जमीदार के यहाँ बरसी पर दस गाँव भोज था ,  बापू और बड़के दादा को दूसरा काम है इसलिए ' नन्हे ' और माँ जायेंगे । आज पहली बार नन्हे को ऐसी दावत देखने का अवसर मिला था तो बहुत खुश था । चलने को हुए तो माँ ने इसे एक डंडा पकड़ा दिया और उत्सुकता भरे प्रश्न ' ई काहे अम्मा ? ' को अनसुना कर हाथ थाम कर तेजी से आगे बढ़ गयी । ज़मीदार का आहाता दिखना शुरू नहीं हुआ था पर खाने की खुसबू आ रही थी , बाल चपलता को थाम पाना अब माँ के लिए मुश्किल होता जा रहा था ... खैर अब दोनों माँ बेटा अब जूठी पत्तलो , टूटे कुल्हड़ों के ढेर के पास खड़े थे , माँ जल्दी जल्दी अध खाई पूड़ियाँ और ना पसंद आई सब्जी बटोर रही थी ... तभी टूटे कुल्हड़ो में बची खीर को आकर कुत्ते चाटने लगे ' ठाड़ काहे हा .. भगा इनका .. यही के मारे तो डंडा दीन रहै ' ....
( एक जीवनी में पढी घटना पर आधारित )

Thursday, September 11, 2014

' इतना खूंखार गिरोह है कि मामला जरा सा इधर उधर हुआ नहीं कि ' पकड़ ' को ख़त्म कर देते हैं आपके बच्चे को छोड़ दिया इसे चमत्कार मानिए .. क्योंकि गिरोह में से किसी ने मदद की इसकी , यकीन मानिए उन दरिंदो से इतनी अच्छाई की उम्मीद हमें नहीं थी it was beyond our expectations  ..  ' पुलिस अफसर ने अपाहिज बच्चे को परिवार को सौपते हुए कहा । सब खुश , उल्लास से ओत प्रोत थे पर  दादा जो कुछ समय पहले दादी की बात  ' मैंने कहा था कि पीपल में भगवान् का वास होता है गीता में भगवान खुद कहे हैं कि वृक्षों में मैं पीपल हूँ पर मुझ बुढ़िया की किसी ने ना सुनी ... सारे पौधे उखड़ा दिए ... उसी का फल है ये ... हाय मेरा चिंटू कहा होगा ? ' । पर  ' पगला गयी है बुढ़िया नाली नाला गटर सबसे इसके भगवान निकला करते है ' बुदबुदाते हुए कोस रहे थे .. अब नाली से उगते नन्हे पीपल को बड़े गौर से देख रहे थे  ... - ब्रह्म राक्षस ©

Wednesday, August 27, 2014

जिन्दा

मंदिर जाते समय गाँव से गुजरते एक रास्ते पर .. 3-4 साल की उमर
होगी , बिखरे बाल , कपड़ों के नाम पर मैले कुचैले चीथड़े , और एक
चोटिल हाथ जिस पर ढंग का प्लास्टर भी नहीं था । बीच सड़क
पर अपनी बहन के साथ चलते चलते अचानक बाईं तरफ भागा पर बाईक
देख कर फिर दाएं को पलटा... मेरी जान सूख गयी .. आम तौर पर
60- 70 चलने वाला मैं 50 पर चल रहा था पर तब भी क्लिच गियर
ब्रेक के सारे संयोजन पूरे नियंत्रण , तत्परता और शक्ति के साथ करने
पड़े ... अब वो मासूम गाडी के बिलकुल सामने हाथ में खाने
वाला पीला पीला ' पोंगा ' थामे तकरीबन 3-4 फीट दूर दहशत
से गिरा पड़ा था ... क्या हुआ एक पल को कुछ समझ न आया फिर
पीछे से पिलियन की क्रोध भरी आवाज आना और उसका सहमते
डरते हुए भाग खड़ा होना ... ये सुनिश्चित कर रहा था कि ' मैं
अभी जिन्दा हूँ '... - © ब्रह्म राक्षस

Saturday, August 23, 2014

जीत


कमाऊ पति की पत्नी  और दो प्यारे गोल मटोल बच्चों की माँ थी । लेकिन जब वो मिला तो सब भूल गई ... प्रेम में पड़ गयी अब न उसे घर की सुध रहती न द्वार की । और एक दिन लड़के ने उसे बुला ही लिया मिलने ... दोनों मिले ,  नजरे नज़रों में उतरीं , हाथों ने हाथ थामे फिर लडके ने उसको भविष्य दिखाया और भविष्य में था एक ' सिलवट भरा बिस्तर ' .. पहले बरसात और उसके बाद की धूप सी चटख हो गयी वो ... फ़नक कर ऐसे भागी जैसे कोई बुरा सपना टूटा हो । ... अब लड़का बंद अँधेरे कमरे में बैठा था  किसी आशा किसी प्रतीक्षा किसी पश्चाताप में नहीं ... बस इस अनोखे सत्य के साथ कि ' अच्छाई पर कभी कभी बुराई भी जीतती है ' ... © ब्रह्म राक्षस

Monday, July 21, 2014

बदचलन

पुलिस ने क्या गजब की तत्परता दिखाई थी इस बार , सामूहिक बलात्कार - हत्या की गुत्थी बस तीन दिन में सुलझ गयी । महिला स्वयं अभियुक्त के साथ रात में अनजान जगह गयी थी , वहां उसकी हत्या हुई थी बलात्कार नहीं और एक मात्र दोषी पकड़ा जा चुका था । परिणाम स्वरूप प्रति हजार / बलात्कार के आंकड़ो में ' वांछित ' कमी आ गयी । ... और ये अलग बात है कि दबी दबी जुबान में ही सही फिर एक औरत को ' बदचलन ? ' कहा जा रहा था । © - ब्रह्म राक्षस

सुबह - सुबह


लड़का - हे बेब !
लड़की - एक बार में समझ नहीं आता तुम्हे ...
लड़का - क्या ?
लड़की - Don't call me babe .
लड़का - अच्छा अच्छा sorry ..
लड़की - ठीक है ।
लड़का - अच्छा Hey bomb चलेगा ? ( हँसते हुए )
लड़की - मर जाओ तुम ...  Im not replying ..
लड़का - ( फिर से हँसते हुए )अब समझा तुम हनुमान चालीसा क्यों नहीं पढ़ती ..
लड़की आँखे बंद कर के चेहरा घुमा लेती है ... जरूरी थोड़ी न है कि हर बार आखें आंसू ही छिपायें । © - ब्रह्म राक्षस

Sunday, July 20, 2014

मर्यादा

वो रक्त रंजित विदीर्ण शरीर तड़पता रहा रात भर । जीने के लिए .. अपनी  असहाय संतानों से एक आख़िरी बार मिलने के लिए और एक चुल्लू पानी के लिए । पर उसे कुछ भी नसीब न हुआ ... सुबह को ' पेट के बल ' पड़ी मिली उसकी लाश और चारों तरफ बिखरा खून लोगों के लिए उसका ' घिसटना ' भर था पर वास्तव में वो छिपाना चाहती थी अपने रात भर नोचे घसोट अंग .. क्योंकि जानती थी वो सभ्य समाज का सच  ... और इसकी मर्यादा । - © ब्रह्म राक्षस

Friday, July 18, 2014

प्यार

उस दिन ये कालेज से जल्दी घर आ गया  , एकांत निजता को पूरी तरह सुनिश्चित करने के बाद इसने अखबार के गड्ड के सबसे नीचे वाले अखबार में छिपी वो पत्रिका निकाली । माथे पर पसीना , चेहरे पर खिलती मुस्कान , दिल की धड़कन और पलटते पन्नो में गजब का सामंजस्य बिठाते हुए  फोन पर कन्फर्म किया ' तीन बजे आओगी न ? ' .... ' हाँ और  ..  ' जवाब पूरा सुने बिना ही इसने फोन काट दिया । अब पूरा समय था इसके पास ,  मेरे साथ अपने काम में जुट गया , चूंकि पहली बार ये सब कर रहा था इसलिए गजब का नर्वस था , बार बार पसीना पोछता कांपते हाथों से इसने बहुत कुछ किया , पर अति उत्साह अनुभवहीनता ने बेमेल नमक चीनी मसालों का रूप ले रखा था ,  लेकिन हम जानते थे जिसका जन्म दिन है उसे ये सब नहीं खलेगा , बेजान कहे जाने वाले हम जब खुद में उड़ेले ' प्यार ' को चख पा रहे तो फिर वो तो इसकी ' माँ ' है  । - कढाही की आत्मकथा © - ब्रह्म राक्षस

Sunday, July 6, 2014

जवाब

उस छोटे कस्बे से इस बडे महानगर मे आई मां बिल्कुल भी नहीं बदली थी । स्टेशन , मंदिर या बाजार हर जगह फ़ैलने वाले खाली हाथ मे कुछ न कुछ डाल देती । आखिर बेटे ने मां से कह ही दिया ’ अरे मां ये शहर है , ये सब हाथ इसलिये नहीं फ़ैलाते क्योंकि ये मजबूर हैं , जरूरतमंद हैं , ये तो इनका काम – धंधा  है , व्यापार है  … है न पिताजी ? “ बदले में मां की सदाबहार झिडक तो समझ गया पर पिताजी की मुस्कान सवाल बन के रह जाती .. अगर अगले दिन पिता के साथ कार में सफ़र करते हुये उनके एक सवाल पर खुद के दिये इस जवाब  “ पिताजी सडक पर कौन सा गड्ढा कितना गहरा है पानी भरा होने की वजह से पता नहीं चलता इसलिये हर बार धीमी कर के सावधानी बरत रहा हूं “ पर उन्हे फ़िर से उसी तरह मुस्कुराता हुआ न पाता ।  - © ब्रह्म राक्षस ( कौशल ) 

Friday, June 20, 2014

आंकड़े

कीट पतंगे अब बहुत खुश रहते है  , विज्ञान उनके लिए अब किसी भगवान से कम नहीं है , देखिये न  कितनी सहूलियत हो गयी उन्हें , आखिर अब दिए - कुप्पी का स्थान बल्ब , सी ऍफ़ एल , एल ई डी ने ले लिया है । अब बिना जले बिना सुलगे वो मस्ती में उन्मुक्त होकर प्रकाश के साथ प्रकाश में खेल सकते हैं ... लेकिन वायरिंग , बोर्ड , होल्डर के पीछे छिपी छिपकलियाँ  अब जरूर गाहे बेगाहे उन्हें अपना ग्रास बना लेती हैं ... पर सहूलियत के लिए ' इतना तो चलता है ' । " साल के 1476 रेप / शोषण / उत्पीड़न के मामलो में 167 थानों में / पुलिस कर्मियों द्वारा हुए " के आंकड़ों पर  I.G. साहब ने भी तो यही कहा था उस दिन .... - ब्रह्म राक्षस ©

Monday, June 9, 2014

Network busy

देर तक काम था आज , तो आफिस से निकलते निकलते रात हो गयी , भैय्या को तीन बार फोन मिलाया तो Call ended .... Network busy  लिख कर आया । दो मिनट रुक के मिलाऊँगी सोच वो आफिस से सड़क पर आई ही थी कि घर के लिए ऑटो मिल गया । लेकिन वो कभी घर नहीं पहुँची अगले दिन उसकी लाश मिली सोने की चैन , अंगूठी , महंगा स्मार्ट फोन , कैश सब उसके पास था बस नहीं थे तो बदन पर पूरे कपड़े । शहर में आग लग गयी मोमबत्तियों की बिक्री बढ़ गयी खूब प्रदर्शन , बवाल और राजनीति हुई । आज घटना को हफ्ता भर होने जा रहा है , आज फिर दो जवां साँसे कानो से होते दिल में उतर रहीं हैं ... और जब रात की खामोशी में दिल की धड़कन फोन के रास्ते कानों में पड़ती तो दोनों एक दूसरे के आभास में बरबस सिमट के रह जाते। आज वो दोनों फिर उसी दिन की तरह अनलिमिटेड काल की नाव से रात के गहरे मौन सागर में प्यार का सफ़र तय कर रहे थे । और दूर कही फिर किसी को ' Call ended .... Network busy ' लिख कर आ रहा था । - © ब्रह्म राक्षस ( कौशल )

Sunday, June 8, 2014

देहाती औरत

सास कहे खा - तो खाती , सास कहे सो - तो सोती ,  सास कहे जाग - तो जागती ... सास कहे बोल - तो बस सर हिला देती ।  ऐसी आज्ञाकारी सेवक बहू कि पूरे गांव में मिसाल दी जाती पर शहर में ' इनके ' ममेरे ससुर के लड़के की शादी से जब से आई तब से बहुत उदास खोई खोई ...  असली बात क्या है किसी को कुछ पता नहीं क्या बात , पर उड़ती उड़ती सुनी है कि वहां बहू ने खूब काम किया जो बोला वो किया न सोने की फिकर न खाने की बस हुकुम बजाया पर जब नेग की बात आई तो साड़ी अहमदाबाद वाली को मिल गयी ... इसने पूछा कि ' हमें काहे नहीं मिली ? ' जवाब आया ' न तू कभी बोली न कभी आगे आई न कभी मुंह खोला .. तो कहाँ से कुछ मिलेगा ' .. सच ही है ' देहाती औरत ' को साड़ी भी नहीं मिलती ....© ब्रह्म राक्षस ( कौशल )

Thursday, May 29, 2014

भूतनी


Hostel  campus B ब्लाक ऊपरी मंजिल का बाएं किनारे से दूसरा कमरा ,  C-11 , ऊपरी मंजिल तो दूर B ब्लाक़ में रहने को मजबूरी में ही कोई तैय्यार होता था । क्योंकि वहां भूतनी ( यही नाम दिया था लोगों ने उसे ) अब भी रहती है और अक्सर देर रात  अँधेरे में  C-11 के बाहर बरामदे में  और कभी बालकनी में , चैनल के पीछे , वाटर कूलर के पास वो  अकेला साया दिख जाता है , रूह काँप ऊठती है लोगों की उसे देखते ही , वीभत्स अभिशप्त चेहरे की ऐसी दहशत  थी कि डर लोगों की हड्डियों में घुस कर उन्हें मोम बना चुका था किसी में इतनी हिम्मत नहीं कि उसके पास फटक सके। ऐसा नहीं था कि उसे हटाने के प्रयास नहीं किये गए बहुत किये गए ... हर संभव प्रयास किये गए  पर वो हटती ही नहीं थी बस भरभराती आवाज में गीता सुनाती है कहती है '  वो अभी मरी नहीं है ,  ज़िंदा है  अभिशप्त वीभत्स अकेली होकर भी वो अभी जिन्दा है , चेहरा वक्ष और  हाथ जलाए हैं तेज़ाब ने आत्मा नहीं ' .. हां आप सही समझे " नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि ...... " । - ब्रह्म राक्षस ©

Friday, May 23, 2014

बेवकूफ

छोटे शहर का रेलवे स्टेशन आमतौर कुली वेंडर इक्का दुक्का यात्री दिखाई देते । हाँ पर ट्रेन आने के समय भीड़ ऐसे जुटती जैसे छुट्टी के बाद गर्ल्स कालेज के बाहर । कहने को तो  दो टिकट विंडो है पर चंद्रमा सूरज और पृथ्वी के बीच आ सकता है पर दोनों एक साथ खुल जाएं ऐसा शायद ही कभी हो , इसलिए खिड़की पर लाईन रूपी भीड़ ये कहती सी लगती ' ट्रेन में मिलने वाली भीड़ का ट्रेलर है ये जो इसे झेल सकता वही रेलवे में यात्रा करने का पात्र होगा ' ... खैर उस दिन लाईन के बगल से उस हरी शर्ट वाले आदमी ने टिकट लेने का प्रयास किया ही था कि ' ओ s s हरी शर्ट कहाँ बीच में घुस रहा है ....  क्या कर रहे हैं दादा.... भाईसाहब लाईन से आईये .... लाईन से आ बे हम बेवकूफ हैं क्या जो आधे घंटे से लाईन में लगे हैं . .'  एकता में अनेकता का एहसास दिलाते हुए भिन्न भिन्न स्वर फूट पड़े ।  वो झट से हट गया ..लाईन आगे को रेंग ही रही थी कि इसबार एक महिला बगल से आगई ... कुछ बुदबुदाते हुए चेहरों के सामने महिला ने टिकट लिया और मुड़ कर हरी शर्ट वाले के साथ चली गयी । लाईन अब भी वही थी विनम्रता उग्रता के चेहरों से भरी पर एक चेहरा एक पल को गायब हुआ और झट से लौट आया , इस बार गोद में बच्चा लिए साड़ी वाली को टिकट खिड़की की तरफ निर्देशित कर भेजते हुए  जो साफ़ दर्शा रहा था कि वो आधे घंटे से बेवकूफ ही बन रहा था पर अब नहीं .... ©

Thursday, April 10, 2014

पसंद

- ताला सही करते हो ?
- पापा करते है
- तुम क्या करते हो
- पढ़ता हूँ
- किस क्लास में ?
- दो में
- क्या नाम है ?
- कलन
- कलन ? ये कैसा नाम है ?
- * एक प्यारी मुस्कान *
- सही नाम बताओ
- कलन नहीं करन ( पान गुटखा बेचने वाला लड़का बोला )
- अच्छा करन है..
- हाँ
- तुम भी बनाते हो ताले ?
- नहीं पापा बनाते
- तुम्हे बनाना आता ?
- नहीं
- थोडा बहुत भी नहीं ?
- * एक प्यारी सी मुस्कान * नहीं
- अच्छा ताले बनाना अच्छा लगता ?
- नहीं
- फिर क्या अच्छा लगता ?
- पढना
मुस्कान मेरे चेहरे पर थी अब .....

Monday, April 7, 2014

हिसाब बराबर

कानपुर जाने को खड़ी बस में वो 18-19 वर्ष का तरुण युवक चढ़ा , बस भरी नहीं थी पर अधिकतर सवारियां आगे और खिड़की पर काबिज थीं । अक्सर आता जाता रहता इसलिए जानता था कि ज्यादा पीछे बैठना शरीर के लिए असमय बुढापे का अनुभव कराने जैसा होगा । ठीक कंडेकटर की सीट के पीछे खाली सीट जिसमे मात्र 35-36 वर्ष का एक प्रौढ़ युवक  बैठा था बैठने को हुआ ही था कि प्रौढ़ युवक बोला ' खाली नहीं है ' । प्रौढ़ युवक के मौन और तरेरती आँखों से ' कोई बैठा है क्या ? ' का जवाब पाकर वो तरुण युवक सहज भाव से पीछे की सीट पर चला गया । सीट पाने के बाद रास्ते के लिये कुछ खाने का प्रबंध करने हेतु नीचे उतरने के दौरान अनायास ही उसके कानों में प्रौढ़ युवक अपने बड़े से फोन पर कहता सुनाई दिया ' समझा करो डार्लिंग  इलाहाबाद जा रहा हूँ .. बहुत जरूरी है ... कल नहीं तो परसों वापस आ ही जाऊँगा ' अब जलपान को छोड़ बस से उतर कर उसने फिर से बस के गन्तव्य का पता किया । बस कानपुर ही जा रही थी निश्चिन्त होकर उसने सोचा बस में चढ़ेगा तो उन्हें भी बता देगा कि बस कानपुर जा रही इलाहाबाद नहीं । पर जैसे ही बस में चढ़ा प्रौढ़ युवक को कंडेक्टर से कानपुर का टिकट लेते पाया । जलपान और अचरज के साथ वो अपनी सीट पर जाके बैठ गया , उसकी जिज्ञासा प्रौढ़ युवक के प्रति बढ़ गयी थी लेकिन पुरानी सरकारी बस और पुरानी बहुएं आवाज अधिक करती हैं इसलिए उसे फोन का वार्तालाप स्पष्ट समझ नहीं आ रहा था । शहर छोड़ मुख्य सड़क पर आ चुकी बस और सीट पर अभी तक अकेले बैठे उस प्रौढ़ युवक का एक फोन जेब में रख दूसरा निकाल कर बात करना , अनायास ही मुस्काना फिर बड़े फोन पर कुछ टाईप करना सब स्पष्ट कर रहा था । तरुण युवक का मन खिन्न हो गया न जाने क्यों उसे उस अज्ञात ' डार्लिंग ' से हमदर्दी हो रही थी लेकिन वो कर भी क्या सकता था इसी उधेड़बुन के बीच कानो में इयर फोन ठूस कर वो कब सो गया पता नहीं चला और जब गर्मी पसीने की वजह से नींद खुली तो रेलवे क्रासिंग पर बस को खड़ी और प्रौढ़ युवक को बड़े फोन पर ' चालू ' पाया ... अंगड़ाई लेते हुए पानी की बोतल मुंह से लगाई ही थी कि एक क्लास मेट का फोन आ गया ... अब उसकी आँखे चमक उठीं , मुंह में गया पानी झट से अन्दर करते हुए उसने खड़े होकर फोन पिक किया और चिल्लाते हुए बोला ' कानपुर जा रहा हूँ ... कानपुर ... हाँ हाँ कानपुर जा रहा हूँ .. 9 बजे चली थी बस ... कानपुर जा रहा हूँ .. कानपुर ' । अब बस में उसे बड़ी विचित्र नज़रों से देखा जा रहा था , ' पागल कहीं का ' कुछ लोग बुदबुदाए भी पर उसे फर्क नहीं पड़ता ...उसे हिसाब बराबर करना था वो उसने कर लिया । - कौशल ©

Sunday, April 6, 2014

सवाल

श्रृद्धालुओं के जत्थों के बीच ' जय माता की ! जै मैय्या की ! जय माँ की ! ' के तेज उद्दघोष करने की होड़ मची थी , सब पूरे जोश से इसमे अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर रहे थे । आगे वाला जत्था बोलता फिर पीछे वाला उसका जवाब देता काफी देर चलने के बाद विश्राम जलपान के लिए वो जत्था रुका और फिर जब दुबारा चला तो बड़ों का जयघोष मौन में बदल चुका था आस्था श्रृद्धा भक्ति से फूटते प्रचंड स्वर आज एक मासूम सवाल से घुट कर रह गए थे । ' कन्या के रूप में आई मैय्या ' बजने के बीच माँ से तमाचा बाप से झिड़क और ' ये सिखाते है आप ' जैसे प्रश्न उठने से पहले उस अबोध बच्ची ने बस इतना पूछ लिया था ' पापा अंकल आज आप लोग पूरा क्यों नहीं बोल रहे ... जैसे रोज बोलते हैं ' तेरी माँ की ** ' .... - कौशल ©

Thursday, April 3, 2014

दोष

आफिस के अन्दर बॉस और आफिस के रास्ते पर ट्रैफिक जाम शांतिपूर्ण नौकरी के लिए  दो सबसे बड़ी मुसीबतें होती हैं । भारी ट्रैफिक के बीच एक कार वाला अधेड़ व्यग्रता तत्परता से समय के साथ प्रतिद्वंदिता करता भागा चला जा रहा था पर गांधी रोड की रेड लाईट पार की तो कड़ाके की ठण्ड में स्कूटर पर माँ बाप के बीच बैठे बच्चे को देखकर मानो समय रुक गया । इससे पहले कि वो रतन टाटा बनता कि उसे अपना परिवार याद आगया उसे ये याद आया कि कैसे अन्तरंगताओं के उन क्षणों में उसकी संतान बीच में आ जाती और जिस शरीर का वो आलिंगन चाहता उससे लिपट कर सो जाती , कैसे वो पति पत्नी से पहले माँ बाप हुआ करते थे  , एक पल को चेहरे पर मुस्कान खिल उठी लेकिन  ' आप कैसे किसी को मेरे लिए चुन सकते हैं .. पापा मेरी निजताएं स्वतंत्रताएं हैं Its my life .. Its my life' सोच कर कब वो ऊर्ध्वापातित हुई भनक तक न लगीं , और Its my life का स्वर बाईं तरफ से लेन में घुसने का प्रयास करती बाईक के कर्कश हार्न में तब्दील हो गया .. अब न चाहते हुए भी उसे ब्रेक लगाना पड़ सकता है , जानता है कि दोष हमेशा बड़ी गाडी वाले को ही दिया जाता ... - कौशल ©

Sunday, March 30, 2014

डूबता सूर्य

' डूबता सूर्य
गोता लगाता है
गहन अँधेरे के सागर में
लाने के लिए
एक और प्रातः ;
बस इसी तरह
डूबता रहता है वो
क्षण दिन माह वर्ष कल्प के
आयामों में बंधा
बार बार
पर तब तक ,
जब तक
वो समर्थ है
पुनः उग आने को ,
और तब तक
जब तक
संघर्षों में
प्रकाश की बाट जोहता रहेगा
जीवन !
सच में आदित्य
तुम सिखाते हो
उगने के लिए
डूबने का महत्त्व ! ©

Friday, March 28, 2014

गुरु जी

तकरीबन 3 किलोमीटर बिना रास्तों के पहाड़ खेतों से गुजर कर उस छोटे से गाँव में आधा घंटा पता पूछने  के बाद एक बगीचे में गाँव के बच्चों को वो 54 वर्षीय पढ़ाते मिले । मुझे आता देख कर उन्होंने नमस्ते किया पर मैंने जवाब नहीं दिया ... सीधे पैर छुए । खुद ही पहचाने गुरु जी पूछने के बाद दुबारा जब मैंने अपना नाम उन्हें बताया तो अचरज से मुझे देखने लगे ...फिर  ढेर सारी बातें पुरानी यादें ताजा हो गई  । बड़े सख्त स्वाभिमानी अनुशासन प्रिय अध्यापक थे वो , 20 साल बाद उनसे मिलने आये किसी पुराने शिष्य का परिचय अपने नए शिष्यों को देते समय  भावुकता को छिपाने का जो प्रयास वो कर रहे थे उससे स्पष्ट था कि वो तनिक भी नहीं बदले । जब मैं चलने को हुआ तो गेट तक छोड़ने आये लेकिन न जाने क्यों अब वो चुप ही रहे । खैर मैंने बाईक स्टार्ट की और काफी आगे बढ़ आया था पर रिवर व्यू मिरर पर वो अभी तक मुझे देखते हुए दिख रहे थे । मुस्कुराता मैं सब समझता था , वो भले ही चुप रहे पर रिवर व्यू मिरर उनकी तरफ से बार बार ' objects in the mirror are closer than they appear ' ये ही बोल रहा था । - कौशल ©