Friday, May 23, 2014

बेवकूफ

छोटे शहर का रेलवे स्टेशन आमतौर कुली वेंडर इक्का दुक्का यात्री दिखाई देते । हाँ पर ट्रेन आने के समय भीड़ ऐसे जुटती जैसे छुट्टी के बाद गर्ल्स कालेज के बाहर । कहने को तो  दो टिकट विंडो है पर चंद्रमा सूरज और पृथ्वी के बीच आ सकता है पर दोनों एक साथ खुल जाएं ऐसा शायद ही कभी हो , इसलिए खिड़की पर लाईन रूपी भीड़ ये कहती सी लगती ' ट्रेन में मिलने वाली भीड़ का ट्रेलर है ये जो इसे झेल सकता वही रेलवे में यात्रा करने का पात्र होगा ' ... खैर उस दिन लाईन के बगल से उस हरी शर्ट वाले आदमी ने टिकट लेने का प्रयास किया ही था कि ' ओ s s हरी शर्ट कहाँ बीच में घुस रहा है ....  क्या कर रहे हैं दादा.... भाईसाहब लाईन से आईये .... लाईन से आ बे हम बेवकूफ हैं क्या जो आधे घंटे से लाईन में लगे हैं . .'  एकता में अनेकता का एहसास दिलाते हुए भिन्न भिन्न स्वर फूट पड़े ।  वो झट से हट गया ..लाईन आगे को रेंग ही रही थी कि इसबार एक महिला बगल से आगई ... कुछ बुदबुदाते हुए चेहरों के सामने महिला ने टिकट लिया और मुड़ कर हरी शर्ट वाले के साथ चली गयी । लाईन अब भी वही थी विनम्रता उग्रता के चेहरों से भरी पर एक चेहरा एक पल को गायब हुआ और झट से लौट आया , इस बार गोद में बच्चा लिए साड़ी वाली को टिकट खिड़की की तरफ निर्देशित कर भेजते हुए  जो साफ़ दर्शा रहा था कि वो आधे घंटे से बेवकूफ ही बन रहा था पर अब नहीं .... ©

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