Sunday, March 30, 2014

डूबता सूर्य

' डूबता सूर्य
गोता लगाता है
गहन अँधेरे के सागर में
लाने के लिए
एक और प्रातः ;
बस इसी तरह
डूबता रहता है वो
क्षण दिन माह वर्ष कल्प के
आयामों में बंधा
बार बार
पर तब तक ,
जब तक
वो समर्थ है
पुनः उग आने को ,
और तब तक
जब तक
संघर्षों में
प्रकाश की बाट जोहता रहेगा
जीवन !
सच में आदित्य
तुम सिखाते हो
उगने के लिए
डूबने का महत्त्व ! ©

Friday, March 28, 2014

गुरु जी

तकरीबन 3 किलोमीटर बिना रास्तों के पहाड़ खेतों से गुजर कर उस छोटे से गाँव में आधा घंटा पता पूछने  के बाद एक बगीचे में गाँव के बच्चों को वो 54 वर्षीय पढ़ाते मिले । मुझे आता देख कर उन्होंने नमस्ते किया पर मैंने जवाब नहीं दिया ... सीधे पैर छुए । खुद ही पहचाने गुरु जी पूछने के बाद दुबारा जब मैंने अपना नाम उन्हें बताया तो अचरज से मुझे देखने लगे ...फिर  ढेर सारी बातें पुरानी यादें ताजा हो गई  । बड़े सख्त स्वाभिमानी अनुशासन प्रिय अध्यापक थे वो , 20 साल बाद उनसे मिलने आये किसी पुराने शिष्य का परिचय अपने नए शिष्यों को देते समय  भावुकता को छिपाने का जो प्रयास वो कर रहे थे उससे स्पष्ट था कि वो तनिक भी नहीं बदले । जब मैं चलने को हुआ तो गेट तक छोड़ने आये लेकिन न जाने क्यों अब वो चुप ही रहे । खैर मैंने बाईक स्टार्ट की और काफी आगे बढ़ आया था पर रिवर व्यू मिरर पर वो अभी तक मुझे देखते हुए दिख रहे थे । मुस्कुराता मैं सब समझता था , वो भले ही चुप रहे पर रिवर व्यू मिरर उनकी तरफ से बार बार ' objects in the mirror are closer than they appear ' ये ही बोल रहा था । - कौशल ©

Sunday, March 16, 2014

रेट

लगभग झल्लाते हुए सा वो अधेड़ बोला ' पिछले हफ्ते गिट्टी ईंटा बालू सब तुम्हारे यहाँ से ही गया तब 2200 की लगाई थी अब एक ट्राली बालू कम पड़ गयी तो तुम 3000 गा रहे हो ' .. उपकार बोध भरे स्वर में उसने कहा  ' बाबूजी जी रेट बढ़ गया आपके लिए 3000 है वरना 3200 चल रहा ' .. इस बार अधेड़ ने आश्चर्य से पूछा - हफ्ते भर पहले 2200 की ट्राली डाल रहे थे और अब सीधे 3200 , यार 2 किलोमीटर पे नदी है , मार्च चल रहा बरसात भी नहीं है  फिर  रेट कैसे बढ़ गया ? बेशर्म मुस्कान के साथ वो बोला ' ऊपर से डंडा है बाबूजी रेट न बढ़ाएं तो हमें कुछ नहीं मिलेगा .. ' अब वो झूठ नही बोल रहा था । अखबार का पेज नं. 3 ' नए पुलिस कप्तान ने कार्यभार सम्हाला , 89 बैच के IPS श्री .... ने साफ़ कर दिया असामाजिक तत्वों और खनन माफिया को बक्शा नहीं जायेगा ' उसकी बात की पुष्टि कर रहा था । - कौशल ©

Friday, March 14, 2014

होली

व्यस्त चौराहे की चिल्ल पों के बीच ' हैप्पी होली अंकल ' पीछे से एक प्यारी सी आवाज आई , मुड़ कर देखा  मोटरसाईकिल पर बैठी एक बच्ची थी । ' हैप्पी होली बेटा ' मैंने जवाब तो दिया पर दुविधा दूर करने के लिए उससे पूछा ' बेटा आप जानती हैं मुझको ? ' वो बोली ' नहीं '  । अब मैंने पूछा ' फिर मुझे क्यों विश किया ? '। कानो के रास्ते दिल में उतर गया जब उसने कहा ' होली तो सबको विश करते है न ' ... आगे उसने बताया  .. 4th में पढ़ती है ,  टाईफाईड से पीड़ित है , अभी इंजेक्शन लगवा के आ रही , और दवा दूध लेकर आये पिता के साथ जाते जाते अपना नाम .. ' अलीज़ा .. माय नेम इज अलीज़ा फ़िरोज़ ' कानो में गूंजता उसका नाम और दिल में बसी उसकी सूरत से सराबोर मैं सोच रहा था ' ज़रूरी नहीं कि हर बार ' प्रहलाद ' हिन्दू ही हो ' ... - कौशल ©

Wednesday, March 12, 2014

प्लेटफार्म नं. 1

प्लेटफार्म नंबर 1 से ट्रेन सरकना शुरू ही हुई थी कि प्लेटफार्म नंबर 3 की तरफ से एक 60-62 वर्षीय बुजुर्ग स्टेशन में दाखिल हुए । फिर जिस तरह से वो प्लेटफार्म ट्रेक कूद फांद कर सरकती ट्रेन के पास जा खड़े हुए लगा आवश्यकता आविष्कार के साथ तत्परता की भी जननी कहलानी चाहिए । ये उनके साथ आये व्यक्ति , अन्य लोगों का स्वर ' अरे ऐसे मत चढ़िएगा ' था या ट्रेन की ऊंचाई और गति वो चढ़े नहीं बस असहाय देखते रहे । असफलताओं से या तो अफसोस उपजता है या कुछ अविस्मरणीय । लोग भले ही इसे मूर्खता या हास्यास्पद की श्रेणी में डाल रहे थे पर वो बुजुर्गवार ट्रेन के निकलते ही  प्लेटफार्म पर चढ़े और चौक लगा दी , ट्रेन बस प्लेटफार्म छोड़ने ही वाली थी और बुजुर्ग पूरे शेष जीवट से समय के साथ दौड़ लगा रहे थे, ये पल अविस्मरणीय था क्योंकि ट्रेन धीमी हो रही थी आखिर जीवट के आगे तो ईश्वर की भी नहीं चलती फिर ट्रेन क्या चीज थी शायद इसीलिये जीवट की जीत का प्रमाण बनने सिग्नल पर लाल रोशनी चमक उठी थी । - कौशल ©

Tuesday, March 11, 2014

आपबीती

घर , आफिस , शापिंग हर जगह मैं खुद पर उसकी नज़रें नोटिस कर रही थी । कौन था वो ?  कोई मनचला कोई जानने वाला या मेरा भ्रम ? इस उधेड़बुन में महीना निकल गया और एक शाम अचानक वो मेरी आफिस बिल्डिंग में दिखाई दिया , आफिस से निकली तो आज नजरें नहीं वो खुद मेरा पीछा करता दिखा । मुझे अच्छी तरह से याद है उस दिन मैंने कोई शोर्ट ड्रेस तो दूर जींस टॉप भी नहीं पहना था पर सलवार कमीज का रंग ज़रूर गुलाबी था । वो मेरी जिन्दगी की कभी न भुला पाने वाली बात थी क्योंकि पता नहीं क्यों मैंने उसे अपने साथ लिफ्ट में घुसने से नहीं रोका और अचानक जब लिफ्ट बीच में रुक गयी तो उस धुंधली रोशनी में मैं अकेली उसके साथ थी , उस पल मेरी सीखी सेल्फ डिफेन्स की सारी तरकीबें जूडो जूजूत्सु किक बाक्सिंग और हैण्ड बैग में रखा पेप्पर स्प्रे कोई काम न आया , और उसने वो छीन लिया जो सालों से मेरा था ।  ' इनकी ' शराफत ने मेरा दिल अपना बना लिया था । - कौशल ©

Thursday, March 6, 2014

वेश्या


वो छोड़ के क्या गयी कि वो  उजड़ गया  ऐसा उजड़ा कि ज़िन्दगी के बसाये  नही बसा । फिर एक दिन आख़िरी प्रयास में दोस्त ने सब अरेंज कर उसे उस बंद कमरे में भेज दिया । शराब का नशा , पारदर्शक कपड़ों में छिपी उस मादक काया के उत्तेजक आमंत्रण , विचालित होने से न बच पाया , आवरण मुक्त हो वासना के झंझावातों में घिरा उन्माद के अंतिम क्षणों में उसके मुंह से बस वही  चिर परिचित  ' किसी का ' नाम निकला ... फिर अपने मसले जा चुके शरीर से बेपरवाह , इस सब की आदतन उस मादक काया ने अपनी मुठ्ठियाँ कस लीं , दांत भींच लिए , आँखे बंद कर लीं लेकिन चेहरा सफ़ेद पड़ने लगा ...बंद पलको के कोनों से रिसता समंदर उसकी चुगली कर रहा था  । आखिर आज वो फिर एक जिन्दा कब्रिस्तान बन गयी जिसमे किसी का प्यार दफ़न था । - © कौशल

Tuesday, March 4, 2014

बाज़ार

बाज़ार में चेहरे पर एक अजीब सी टीस लिये चुपचाप बैठी थी वो , अब ग्राहक कम ही आते ,  जो इक्का दुक्का आते बस भाव पूछ कर चले जाते , पुराने ग्राहक जो पहले उसी के पास आते थे उन्होंने भी मुंह फेर लिया था । " अधेड़ थुलथुल शरीर , लिज़लिजी चमड़ी , प्रयोगधर्मिता से लाल पड़ चुके बाल  और रूप रंग को निखारने के स्थान पर उम्रदराज़गी छिपाने को लगाया मेक-अप , कुल मिलाकर शारीरिक आकर्षण के नाम पर बिलकुल निराश करती उस काया पर कौन अपना पौरुष खर्च करना चाहेगा ? " अपनी इस वास्तविकता को सोच कर वो थोडा निराश हो जाती लेकिन जैसे जैसे सूरज बूढ़ा होता वो खिलने लगती , उसने ज़माना देखा था अच्छी तरह जानती थी कि  ' भूखे ' लोग सुन्दरता उम्र नहीं बस शरीर चाहते । बिकने के लिए अब बाज़ार में अपनी कीमत आधी कर दी उसने , आखिर कुछ अपनों की भी भूख का भी सवाल था । ... - कौशल ©