बाज़ार में चेहरे पर एक अजीब सी टीस लिये चुपचाप बैठी थी वो , अब ग्राहक कम ही आते , जो इक्का दुक्का आते बस भाव पूछ कर चले जाते , पुराने ग्राहक जो पहले उसी के पास आते थे उन्होंने भी मुंह फेर लिया था । " अधेड़ थुलथुल शरीर , लिज़लिजी चमड़ी , प्रयोगधर्मिता से लाल पड़ चुके बाल और रूप रंग को निखारने के स्थान पर उम्रदराज़गी छिपाने को लगाया मेक-अप , कुल मिलाकर शारीरिक आकर्षण के नाम पर बिलकुल निराश करती उस काया पर कौन अपना पौरुष खर्च करना चाहेगा ? " अपनी इस वास्तविकता को सोच कर वो थोडा निराश हो जाती लेकिन जैसे जैसे सूरज बूढ़ा होता वो खिलने लगती , उसने ज़माना देखा था अच्छी तरह जानती थी कि ' भूखे ' लोग सुन्दरता उम्र नहीं बस शरीर चाहते । बिकने के लिए अब बाज़ार में अपनी कीमत आधी कर दी उसने , आखिर कुछ अपनों की भी भूख का भी सवाल था । ... - कौशल ©
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