Wednesday, March 12, 2014

प्लेटफार्म नं. 1

प्लेटफार्म नंबर 1 से ट्रेन सरकना शुरू ही हुई थी कि प्लेटफार्म नंबर 3 की तरफ से एक 60-62 वर्षीय बुजुर्ग स्टेशन में दाखिल हुए । फिर जिस तरह से वो प्लेटफार्म ट्रेक कूद फांद कर सरकती ट्रेन के पास जा खड़े हुए लगा आवश्यकता आविष्कार के साथ तत्परता की भी जननी कहलानी चाहिए । ये उनके साथ आये व्यक्ति , अन्य लोगों का स्वर ' अरे ऐसे मत चढ़िएगा ' था या ट्रेन की ऊंचाई और गति वो चढ़े नहीं बस असहाय देखते रहे । असफलताओं से या तो अफसोस उपजता है या कुछ अविस्मरणीय । लोग भले ही इसे मूर्खता या हास्यास्पद की श्रेणी में डाल रहे थे पर वो बुजुर्गवार ट्रेन के निकलते ही  प्लेटफार्म पर चढ़े और चौक लगा दी , ट्रेन बस प्लेटफार्म छोड़ने ही वाली थी और बुजुर्ग पूरे शेष जीवट से समय के साथ दौड़ लगा रहे थे, ये पल अविस्मरणीय था क्योंकि ट्रेन धीमी हो रही थी आखिर जीवट के आगे तो ईश्वर की भी नहीं चलती फिर ट्रेन क्या चीज थी शायद इसीलिये जीवट की जीत का प्रमाण बनने सिग्नल पर लाल रोशनी चमक उठी थी । - कौशल ©

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