Tuesday, March 11, 2014

आपबीती

घर , आफिस , शापिंग हर जगह मैं खुद पर उसकी नज़रें नोटिस कर रही थी । कौन था वो ?  कोई मनचला कोई जानने वाला या मेरा भ्रम ? इस उधेड़बुन में महीना निकल गया और एक शाम अचानक वो मेरी आफिस बिल्डिंग में दिखाई दिया , आफिस से निकली तो आज नजरें नहीं वो खुद मेरा पीछा करता दिखा । मुझे अच्छी तरह से याद है उस दिन मैंने कोई शोर्ट ड्रेस तो दूर जींस टॉप भी नहीं पहना था पर सलवार कमीज का रंग ज़रूर गुलाबी था । वो मेरी जिन्दगी की कभी न भुला पाने वाली बात थी क्योंकि पता नहीं क्यों मैंने उसे अपने साथ लिफ्ट में घुसने से नहीं रोका और अचानक जब लिफ्ट बीच में रुक गयी तो उस धुंधली रोशनी में मैं अकेली उसके साथ थी , उस पल मेरी सीखी सेल्फ डिफेन्स की सारी तरकीबें जूडो जूजूत्सु किक बाक्सिंग और हैण्ड बैग में रखा पेप्पर स्प्रे कोई काम न आया , और उसने वो छीन लिया जो सालों से मेरा था ।  ' इनकी ' शराफत ने मेरा दिल अपना बना लिया था । - कौशल ©

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