Friday, February 28, 2020

चिराग सी तासीर रखता हूँ  
घर किसका रोशन हुआ इसका न हिसाब रखता हूं ।

शै अंधेरे की समझ कर न कुरेदे कोई
दफन सीने में ज़र्रा-ए-आफताब रखता हूँ ।

दौर-ए-जहाँ शौक -ए - मिल्कियत चाहे 
वजूद में अपने मैं न इश्तियाक रखता हूँ ।

जाम , साकी , मोहब्बत , महबूब गिराँ होते
फकीर हूँ दिल लगाने को बस किताब रखता हूँ  ।

दिल मे आदमीयत लबों पे ईमान जिंदा रख
करम सज़दे में भी अपने बेसबाब रखता हूँ ।

बे इल्म , बे नूर , बे ज़ुस्तजू ही सही
हस्ती में आज भी इंक़लाब रखता हूँ ।