चिराग सी तासीर रखता हूँ
घर किसका रोशन हुआ इसका न हिसाब रखता हूं ।
शै अंधेरे की समझ कर न कुरेदे कोई
दफन सीने में ज़र्रा-ए-आफताब रखता हूँ ।
दौर-ए-जहाँ शौक -ए - मिल्कियत चाहे
वजूद में अपने मैं न इश्तियाक रखता हूँ ।
जाम , साकी , मोहब्बत , महबूब गिराँ होते
फकीर हूँ दिल लगाने को बस किताब रखता हूँ ।
दिल मे आदमीयत लबों पे ईमान जिंदा रख
करम सज़दे में भी अपने बेसबाब रखता हूँ ।
बे इल्म , बे नूर , बे ज़ुस्तजू ही सही
हस्ती में आज भी इंक़लाब रखता हूँ ।
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