आज के दौर लोगों के लिए जैसे फेसबुक , व्हाट्सएप हैं पिताजी के लिए गीता , रामायण , श्रीराम चरित मानस हैं ... दिन भर श्रवण गायन अध्ययन चलता रहता हैं । उनके मुख से व्याख्या और स्वरबद्ध चौपाई श्लोकों के श्रवण का भी अपना अलग आनन्द है । श्रीमद भगवत गीता का एक श्लोक है जो पढ़ा कम और उनके मुख से सुना असंख्य बार है । ये श्लोक साक्षात प्रतिपादित भी होता देख लिया । चित्रकूट में कामदगिरि प्रदक्षिणा पथ पर चार मुखार वृन्द हैं द्वितीय मुखार वृन्द से आगे बढ़ते ही मिठाईयों की दुकाने आ जाती है जिसे खोही कहते हैं एक बार विनोद के चलते पिताश्री ने इस स्थान को मिठार वृन्द कह दिया तब से इस स्थान को हम भी मिठार वृन्द कहने लगे । अब हुआ यूं कि मार्ग अवरुध्द होने के चलते मुख्य मार्ग से न जाकर शिवराम पुर से गए और वहां पीली कोठी से परिक्रमा मार्ग पर पहुचने का तय हुआ । पीली कोठी से गलियों का ऐसा जाल कि भटक गए और सीधे निकले खोही ' मिठार वृन्द ' पर ... पूरी परिक्रमा 'मिठार वृन्द' से 'मिठार वृन्द' तक पूरी की गई । और मन मे यही श्लोक गूंजता रहा ...
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥" अ- ६. श्लोक३० ॥
जो मुझे सर्वत्र देखता है और सब कुछ मुझमें देखता है उसके लिए न तो मैं कभी अदृश्य होता हूँ और न वह मेरे लिए अदृश्य होता है |
For one who sees Me everywhere and sees everything in Me, I am never lost, nor is he ever lost to Me.
No comments:
Post a Comment