वो दोनों आज शायद आख़िरी बार मिल रहे थे , पारिवारिक दायित्वों अपेक्षाओं के चलते उन्होंने निर्णय किया की आज के बाद से उनके रास्ते अलग । पार्क के उस कोने में बैठे आज ज्यादातर चुप्पियों में बात कर रहे थे । अँधेरा घिर चुका था वो चलने को उठे तो उनके हाथ परस्पर आकर्षित होते चले गए , आज उनके शरीरों में एक उफान सा आया हुआ लगता था , ऐसा उफान जो कह रहा था ' सिर्फ एक बार ' । एकांत स्थान और अँधेरा , दोनों के अंतर में समान रूप से उठने वाली मिलन की ज्वाला के अनुकूल थे । जिस पल लगा कि किनारे टूटने ही वाले हैं वो अलग हो गए । वो अब जा चुके थे पर मैं रात के स्याह कम्बल में दुबका ये समझ चुका था कि उजाला सूरज से होता , जब वो नहीं होता उसके नूर से मैं जहाँन दमकाता पर जब न सूरज होता न मैं , इंसान खुद दमकता । - अमावस के चाँद की ज़ुबानी । © कौशल
.............कब यहां अमर विस्वास , अमिट है कब आस्था ? बस एक शून्य जिसमें होता सब कुछ विलीन , आबद्ध परिस्थिति - मनोवृत्ति की सीमा से , मै जो लिखता वह सब कितना अर्थहीन !
Friday, February 28, 2014
Tuesday, February 25, 2014
पशोपेश
बदन के घुमाव उभार सब स्पष्ट दिख रहे थे , दर्पण के सामने मात्र अधोवस्त्रों से ढंकी वो तरुण युवती अपनी पोशाक चयन को लेकर पशोपेश में थी । एक उठाती एक रखती फिर अचानक परेशानी मिश्रित मुखर कटाक्ष लिए एक स्वर फूटा ' क्या पहनूं कि लोगों की नज़र से बच जाऊं ? ' ... शारीरिक आकर्षण अब आँखों के रास्ते मस्तिष्क में पहुंच बहुतों की मानसिक वेदना का कारण बन चुका था । एक गंभीर चुप्पी लिए रंग मंच में तालियों का स्वर फूट पड़ा । ... विचारोत्तेजक साहसिक प्रस्तुति पर प्रशंसा के बावजूद भी अभिनेत्री के चेहरे के भाव तनिक भी न बदले । प्रस्तुति समाप्ति पर भी पशोपेश परेशानी ज्यो की त्यों थी... शायद प्रस्तुति से पूर्व अधोवस्त्र के रंग चयन पर दिए गए निर्देश अभी तक उसे ज़ार ज़ार किये हुए थे । - ©
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प्रारंभिक अंश नाट्य प्रस्तुति ( ज़रा ध्यान से ) से प्रेरित
Monday, February 24, 2014
सीख
अपना पसंदीदा टीवी सीरियल देखते हुए उसने तीन बार डोर बेल को अनसुना कर दिया लेकिन डोर बेल बजाने वाले हाथ जिद और धैर्य से रंगे हुए थे शायद , आखिर उसे उठना ही पड़ा और ' कौन है ? आ रही हूँ ' झल्लाहट भरी आवाज से डोर बेल सहम कर चुप हो गई । ' गुड आफ्टर नून मैम ' दरवाजा खोलने पर सामने खड़ा गोरा चिट्टा साफ़ सुथरा ब्लेजर पहने 22-24 साल का युवक बोला । युवक के व्यक्तित्व , वाक् सहजता के प्रभाव से महिला की झल्लाहट काफी कम हो चुकी थी फिर भी स्वर में नाराजगी लिए वो बोली ' हाँ ... बोलो '।
- मेम मेरा नाम नितिन है हम लोगों के educational project में आपकी help चाहिए ' युवक बोला ...
- ' मेरी help चाहिए ? ' स्वर में प्रश्नगत भाव से अधिक educational project में खुद की उपयोगिता को लेकर आश्चर्य था ..
- शांत गंभीर स्वर में युवक बोला ' जी मैम '
- कैसी हेल्प ?
- मैम हम लोग एक कंपनी के प्रोडक्ट्स पे सर्वे कर रहे है , हम उसको आपके सामने use करेंगे और आपको उस प्रोडक्ट की performance कैसी लगी उसका detail बताना होगा ..
- अच्छा .. पर अभी मेरे पास time नहीं है .. Sorry
- मैम बस 10 मिनट लगेंगे .. रोज के 10 सर्वे करने पड़ते , आज 9 हो गए आप थोडा time दे दीजिये .. धूप भी बहुत हो रही
- अच्छा ठीक है पर जल्दी करना .. आओ अन्दर आ जाओ
अपने बैग को गेट पर ही रखकर उससे एक bottle , डायरी निकलकर वो अन्दर आया और बोला ' मैम ये एक advanced jewelry क्लीनर है आप लोग दुकानों पे जा के अपनी jewelry साफ़ करवाते वो लोग washing powder जैसी चीजे use करते उससे आपकी jewelry की shine तो कम होती साथ ही उसमे जो कास्टिक होता उससे jewelry की life भी घट जाती , इसलिए इस कंपनी ने ये advanced jewelry cleaner launch किया है ये gold , silver , platinum friendly है ... shine के साथ ये उसमे छिपे germs भी साफ़ करता और jewelry life long maintain रहती ... आप एक मग , पानी और news paper ले आईये फिर मैं आपको इसका demonstration करके दिखा दूं । महिला पानी से भरा मग ले आई और युवक ने अपनी जेब से एक अंगूठी और एक पायल निकालकर उसमें डाल दी ... 2 चम्मच केमिकल डालते ही पानी का रंग सफ़ेद हो गया और थोड़ी देर बाद उसने उससे अंगूठी पायल निकाल कर paper पर रखे .. सूखने पर वो वास्तव में चमकने लगे थे .. महिला से performance report लिखवा कर वो चलने को हुआ ही था कि
- महिला बोली ' ये मार्केट में तो मिलता है न ? ' ...
- नहीं मैम .. अभी टेस्टिंग चल रही .. वो कम्प्लीट होगी फिर market लांच करेगी कंपनी
-' अच्छा ठीक है फिर ' स्वर में निराशा लिए वो बोली , जिसे भांपते हुए युवक बड़ी सहजता सरलता से बोला ' मैम ये केमिकल हम किसी को नहीं दे सकते पर आपको कुछ क्लीन करना हो तो लाईये आप कर लीजिये ' ... नई jewelry मिलने की सी खुशी छलक आई महिला के चेहरे पर और ' ठीक है रुको अभी आती हूँ ' बोलकर वो अन्दर से अपनी चैन कंगन और अंगूठियाँ ले आई .. पहले की तरह ही युवक ने पानी भरे मग में उन्हें डाला पर केमिकल की बोतल खाली हो चुकी थी , बामुश्किल 1 चम्मच केमिकल ही निकला उससे ... ' मुझे दूसरी बोतल खोलनी पड़ेगी मैम .. और भी कुछ हो तो ले आईये ' महिला अन्दर से एक ' मेल चैन ' ले आई उसे भी युवक ने हलके सफ़ेद हो चुके पानी में डाल दिया और बाहर रखे अपने बैग से केमिकल की नई बोतल निकालने चला गया ... थोड़ी देर बाद महिला दहाड़ मार कर रोने लगी आस पड़ोस वाले आये तो उन्हें माजरा समझने में देर न लगी । ' मेल चैन ' वाला सफ़ेद पानी से भरा मग और एक खुला अखबार जिसमे राजनीतिक पार्टी को चुनावी चन्दा देने के आग्रह का विज्ञापन था भले ही सम्बद्ध न हो पर सब कुछ स्पष्ट कह रहे थे । ©
Saturday, February 22, 2014
बुद्ध
गोली बारूद की उस विनाश लीला के बीच आहत अर्ध चैतन्य जापानी सैनिक के मुंह में उस भारतीय सैनिक ने पानी डाला तो न जाने कब से प्यासे सैनिक में चैतन्यता लौट आई पर कृतज्ञता का भाव युद्धोन्माद से उपजे शत्रुत्व से न जीत पाया और उस जापानी ने भारतीय के शरीर में चाकू भोंक दी । अगले ही पल आसमान से एक आफत गिरी , धमाका हुआ और उसके बाद जब आँखे खुली तो रेडक्रास के अस्पताल में ... मरणासन्न जापानी के मुंह में विक्षत भारतीय ने इस बार पानी डाला तो भरी आँखों सुप्त मुस्कान से पहले वो इतना ही बोल पाया ' मुझे समझ आ गया बुद्ध भारत में ही क्यों जन्मे थे ' ... - समाचार पत्र में पढी एक बोध कथा ।
Wednesday, February 19, 2014
भविष्य
कचहरी के पास वाली चाय नास्ते की दूकान के बगल में वो लोगों का भविष्य बताता था । उसकी पिटारी में बंद सर्प शादी , नौकरी , शिक्षा , प्रेम , संपत्ति , स्वास्थ्य , विदेश यात्रा जैसे सवालों के जवाब बस हाँ और ना में देता था , लाल कपडे पर कुण्डली मारे तो उत्तर ' नही ' और हरे कपड़े पर कुण्डली से उत्तर ' हाँ ' होता था । कुछ एक भविष्यवाणियाँ सही भी निकलती , भीड़ भी लगती थी .. एक दिन किसी ने आकर ये साबित कर दिया कि सांप के पास इंसान सरीखी नज़र नहीं होती फिर क्या था सपेरे की धुनाई हुई और बिना ज़हर का सांप वहीं कुचल कर मर गया .. पता नहीं क्यों महीनों बाद वो सपेरा अब फिर आने लगा है दूकान में बैठे लोगों की चुनावी चर्चाएँ भविष्यवाणियाँ सुनकर विषभरी मुस्कान आती उसके चेहरे पर .. इस बार शायद उसे इन लोगों का भविष्य पता है ... - कौशल ©
Tuesday, February 18, 2014
5 मिनट अब बढ़ कर आधा घंटा बन चुके थे , फोन की घंटिया अनसुनी करते लोगों में से अब शायद किसी को देर नहीं हो रही थी । आखिर वो उस भीड़ का हिस्सा थे जिसके केंद्र में दो भाई अपनी बहन के आशिक को उसकी औकात माँ बहन याद दिला रहे थे । मुंह लात हाथ जूते डंडे सब में गंभीर आघात करने की होड़ के बीच बस वो आँचल विहीन ही उसकी ढाल बनने का प्रयास कर रही थी और एक अधेड़ बार बार उस आँचल विहीन देह को ढंक कर अपने साए में लेने वात्सल्य भरी जिद ... पर उसकी कोशिश पर बेटी का तिरस्कार भारी पड़ा और अचानक उस अधेड़ की असफलता आँखों का बाँध तोड़कर इस उत्तर की खोज में बह निकली कि क्या इसीलिये बेटियां पराया धन कही जातीं ? ' .... ©
दो से चार , चार से आठ , आठ से सोलह और सोलह से बत्तीस होने क्रम में सड़क किनारे मजमा जुट रहा था । भीड़ में चेहरों पर हंसी , शालीनता सोच संवेदना की जमानत जब्त कर रही थी । अन्दर से आ रही क्रंदन चीख की आवाज सुनकर किनारे खड़े एक जनाब से पूंछा - क्या हो गया भाई साहब ? .. उनके पान चबाते हुए बोलने के कारण ' लौंडा लौंडिया ... भाग .. धुलाई ' इतना ही समझ आया पर ' पिच्च ' से थूकी पीक अन्दर रक्त रंजित हो चुके प्रेम को अच्छे से व्यक्त कर गयी थी । .. ©
Monday, February 17, 2014
जिस घाव को लोग आंसू संवेदनाओं और शुभेच्छाओं से भरने का प्रयास कर रहे थे उसको उसने क्लीनर से डूबी रूई घुसेड़ कर पाशविक निर्दयता से रगड़ दिया .. और सावधानी से चीख को अनदेखा करते हुए उसमे दवा उड़ेल कर घाव को लपेट दिया .. दर्द से बिलबिलाई उस देह को वो आघात करने वाले से भी क्रूर लगा । पर कुछ देर बाद उसके कंधे के सहारे बढाया एक एक कदम ड्रेसिंग रूम में उपजे शत्रुत्व के भाव को पग पग पीछे छोड़ रहा था .... - एक समालोचक की डायरी से ©
Sunday, February 16, 2014
सबसे मधुर होते
विरह के गान
वेदना से बंधे होते
ह्रदय के तान
बादलों की भीड़ से
झाकते सूर्य सा
सूने हो चुके अंतर्मन से
निकले जब ज्ञान
तब बहेगा जीवन
अनवरत
और प्रकाशित होंगे
कही कोई
कुछ और ' मन ' .. ©
Tuesday, February 4, 2014
गिफ्ट
' जन्म दिन की ढेरों शुभकामनाये ' उस तरफ से आवाज आई । ' शुभकामनाएं एक ही चलेंगी अगर गिफ्ट ढेरों हो ' - बन्दर सी ढीठता के साथ मैं बोला ... सर्दियों की धूप जैसा सुखद एहसास था वो , जब उसने कहा ' अच्छा बताओ क्या चाहिए गिफ्ट में ? ' ... मन खिल उठा बस बोलने को था ' तुम ' ... लेकिन फिर याद आया वो तीन साल से कम्मिटेड है। ... मेरे मौन पर उसका बार बार बोलना ' बताओ न यार क्या चाहिए ?' अब जेठ की धूप बन चूका था , जिससे मैं और न जाने कैसे कट चुकी उस लैंड लाइन काल की बीप बीप करती आवाज सरीखा धड़कता मेरा दिल झुलसे खड़े थे ... - कौशल 04-02-2014 ©
Saturday, February 1, 2014
रोटी
" . . . ' शहर में जिसके यहाँ जाओ ' चाय चलेगी ? ' पूंछते , पर गांव में सीधे आदेश देते ' रोटी खाके जाना बेटा । अब सोमेश की समझ में आ गया था कि क्यों कहते शहर की अमीरी से गाँव की गरीबी भली । " गल चुके अखबार में छपी सप्ताह की सबसे श्रेष्ठ , पुरुस्कृत इस लघुकथा का अस्तित्व भी मिट चुका था । पर समझ ये नहीं आया कि दो जून रोटी की तलाश में शहर आया वो शक्स तो अनपढ़ था फिर स्याही के अस्तित्व को किसने चुनौती दी । क्या अखबार में लिपटी उन 2 अधपकी पसीजती रोटियों ने ? ... - कौशल 01-02-2014 ©