बदन के घुमाव उभार सब स्पष्ट दिख रहे थे , दर्पण के सामने मात्र अधोवस्त्रों से ढंकी वो तरुण युवती अपनी पोशाक चयन को लेकर पशोपेश में थी । एक उठाती एक रखती फिर अचानक परेशानी मिश्रित मुखर कटाक्ष लिए एक स्वर फूटा ' क्या पहनूं कि लोगों की नज़र से बच जाऊं ? ' ... शारीरिक आकर्षण अब आँखों के रास्ते मस्तिष्क में पहुंच बहुतों की मानसिक वेदना का कारण बन चुका था । एक गंभीर चुप्पी लिए रंग मंच में तालियों का स्वर फूट पड़ा । ... विचारोत्तेजक साहसिक प्रस्तुति पर प्रशंसा के बावजूद भी अभिनेत्री के चेहरे के भाव तनिक भी न बदले । प्रस्तुति समाप्ति पर भी पशोपेश परेशानी ज्यो की त्यों थी... शायद प्रस्तुति से पूर्व अधोवस्त्र के रंग चयन पर दिए गए निर्देश अभी तक उसे ज़ार ज़ार किये हुए थे । - ©
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प्रारंभिक अंश नाट्य प्रस्तुति ( ज़रा ध्यान से ) से प्रेरित
.............कब यहां अमर विस्वास , अमिट है कब आस्था ? बस एक शून्य जिसमें होता सब कुछ विलीन , आबद्ध परिस्थिति - मनोवृत्ति की सीमा से , मै जो लिखता वह सब कितना अर्थहीन !
Tuesday, February 25, 2014
पशोपेश
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लघुकथा
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