.............कब यहां अमर विस्वास , अमिट है कब आस्था ? बस एक शून्य जिसमें होता सब कुछ विलीन , आबद्ध परिस्थिति - मनोवृत्ति की सीमा से , मै जो लिखता वह सब कितना अर्थहीन !
सबसे मधुर होते विरह के गान वेदना से बंधे होते ह्रदय के तान बादलों की भीड़ से झाकते सूर्य सा सूने हो चुके अंतर्मन से निकले जब ज्ञान तब बहेगा जीवन अनवरत और प्रकाशित होंगे कही कोई कुछ और ' मन ' .. ©
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