वो दोनों आज शायद आख़िरी बार मिल रहे थे , पारिवारिक दायित्वों अपेक्षाओं के चलते उन्होंने निर्णय किया की आज के बाद से उनके रास्ते अलग । पार्क के उस कोने में बैठे आज ज्यादातर चुप्पियों में बात कर रहे थे । अँधेरा घिर चुका था वो चलने को उठे तो उनके हाथ परस्पर आकर्षित होते चले गए , आज उनके शरीरों में एक उफान सा आया हुआ लगता था , ऐसा उफान जो कह रहा था ' सिर्फ एक बार ' । एकांत स्थान और अँधेरा , दोनों के अंतर में समान रूप से उठने वाली मिलन की ज्वाला के अनुकूल थे । जिस पल लगा कि किनारे टूटने ही वाले हैं वो अलग हो गए । वो अब जा चुके थे पर मैं रात के स्याह कम्बल में दुबका ये समझ चुका था कि उजाला सूरज से होता , जब वो नहीं होता उसके नूर से मैं जहाँन दमकाता पर जब न सूरज होता न मैं , इंसान खुद दमकता । - अमावस के चाँद की ज़ुबानी । © कौशल
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