5 मिनट अब बढ़ कर आधा घंटा बन चुके थे , फोन की घंटिया अनसुनी करते लोगों में से अब शायद किसी को देर नहीं हो रही थी । आखिर वो उस भीड़ का हिस्सा थे जिसके केंद्र में दो भाई अपनी बहन के आशिक को उसकी औकात माँ बहन याद दिला रहे थे । मुंह लात हाथ जूते डंडे सब में गंभीर आघात करने की होड़ के बीच बस वो आँचल विहीन ही उसकी ढाल बनने का प्रयास कर रही थी और एक अधेड़ बार बार उस आँचल विहीन देह को ढंक कर अपने साए में लेने वात्सल्य भरी जिद ... पर उसकी कोशिश पर बेटी का तिरस्कार भारी पड़ा और अचानक उस अधेड़ की असफलता आँखों का बाँध तोड़कर इस उत्तर की खोज में बह निकली कि क्या इसीलिये बेटियां पराया धन कही जातीं ? ' .... ©
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