Tuesday, July 21, 2020

मिठार वृन्द

आज के दौर लोगों के लिए जैसे फेसबुक , व्हाट्सएप हैं पिताजी के लिए गीता , रामायण , श्रीराम चरित मानस हैं ... दिन भर श्रवण गायन अध्ययन चलता रहता हैं । उनके मुख से व्याख्या और स्वरबद्ध चौपाई श्लोकों के श्रवण का भी अपना अलग आनन्द है । श्रीमद भगवत गीता का एक श्लोक है जो पढ़ा कम और उनके मुख से सुना असंख्य बार है ।  ये श्लोक साक्षात प्रतिपादित भी होता देख लिया ।  चित्रकूट में कामदगिरि प्रदक्षिणा पथ पर चार मुखार वृन्द हैं द्वितीय मुखार वृन्द से आगे बढ़ते ही मिठाईयों की दुकाने आ जाती है जिसे खोही कहते हैं एक बार विनोद के चलते पिताश्री ने इस स्थान को मिठार वृन्द कह दिया तब से इस स्थान को हम भी मिठार वृन्द कहने लगे । अब हुआ यूं कि मार्ग अवरुध्द होने के चलते मुख्य मार्ग से न जाकर शिवराम पुर से गए और वहां पीली कोठी से परिक्रमा मार्ग पर पहुचने का तय हुआ । पीली कोठी से गलियों का ऐसा जाल कि भटक गए और सीधे निकले खोही ' मिठार वृन्द ' पर ... पूरी परिक्रमा 'मिठार वृन्द' से 'मिठार वृन्द' तक पूरी की गई । और मन मे यही श्लोक गूंजता रहा ... 
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥" अ- ६. श्लोक३० ॥

जो मुझे सर्वत्र देखता है और सब कुछ मुझमें देखता है उसके लिए न तो मैं कभी अदृश्य होता हूँ और न वह मेरे लिए अदृश्य होता है |

For one who sees Me everywhere and sees everything in Me, I am never lost, nor is he ever lost to Me.

Friday, February 28, 2020

चिराग सी तासीर रखता हूँ  
घर किसका रोशन हुआ इसका न हिसाब रखता हूं ।

शै अंधेरे की समझ कर न कुरेदे कोई
दफन सीने में ज़र्रा-ए-आफताब रखता हूँ ।

दौर-ए-जहाँ शौक -ए - मिल्कियत चाहे 
वजूद में अपने मैं न इश्तियाक रखता हूँ ।

जाम , साकी , मोहब्बत , महबूब गिराँ होते
फकीर हूँ दिल लगाने को बस किताब रखता हूँ  ।

दिल मे आदमीयत लबों पे ईमान जिंदा रख
करम सज़दे में भी अपने बेसबाब रखता हूँ ।

बे इल्म , बे नूर , बे ज़ुस्तजू ही सही
हस्ती में आज भी इंक़लाब रखता हूँ । 



Sunday, April 15, 2018

हवस

सुनो मुहम्मद !
सुनो राम !
क्या दे सकते हो
एक वरदान
अगर हां
तो भर दो
हमारे हृदयों को
ममता , प्रेम और वात्सल्य से
ताकि बिना भेद
और संकोच के
लगा सकें
नन्ही जानों को
कलेजों से
बचा सके  इन्हें
उन शिकारी नजरों से
इंसान की खाल में दरिंदों से
जो खोजते हैं
' जिंदा ' जिस्म शरीर की भूख के लिए
और उन पिशाचों से
जो पाकर एक ' लाश '
मिटाने लगते हैं अपनी
राजनीतिक , वैचारिक और धार्मिक ' हवस ' - © ब्रह्म राक्षस

Sunday, August 9, 2015

पहचान


दिन, हफ्ते, महीनों से गुजरते हुए सम्मान की उनकी लड़ाई अब सालों तक पहुँच चुकी थी । कभी लगता कि जीत सामने है तो कभी वो आसमान का तारा बन जाती फिर भी सब पूरी प्रतिबद्धता , जीवट  से लगे हुए थे  लेकिन एक दिन अचानक उन्होंने अपनी पहचान बदल ली ' 100 परिवारों ने धर्म बदला ' की खबर 22 सालों में पहाड़ कटने की कहानी को भोथरी कर चुकी थी और शायद एक नया गणित समझा रही थी कि 100 में दो शून्य नहीं 99 शून्य होते हैं । - ब्रह्म राक्षस ©

Thursday, July 23, 2015

अंत्येष्टि


5000 साल, तुलसी, मनु, द्रोणाचार्य, धर्मशास्त्र  उनकी प्रबुद्धता के क्षिति  जल पावक गगन समीर थे । आरक्षण से पाई नौकरी और प्रमोशन के बदले वो समाज में जातिगत भिन्नताओं को समाप्त करने का जाप किया करते थे । ' रोटी - बेटी में जातीय बाध्यताएं समाप्त होंगी तभी समाज से जातिवाद हटेगा, सामाजिक परंपराएं टूटेगीं ' नियम से दिन में पांच बार ये कहते थे । पर इधर एक हफ्ते से उनकी कोई खबर नहीं... उनके लाख समझाने के बावजूद कि ' उसका कोई भविष्य नहीं और आरक्षण का लाभ भी न मिलेगा ' उनकी एकलौती बेटी ने अपने सवर्ण प्रेमी से विवाह का निश्चय कर लिया .... उनकी प्रबुद्धता की अंत्येष्टि अगले माह की 8 तारीख को है , और वो चाह कर भी इस बात पर खुश नहीं हो सकते कि सामाजिक परम्पराओं को तोड़कर उनकी बेटी ही ये करेगी ..... - ब्रह्म राक्षस ©

Wednesday, July 15, 2015

पुजारी

ऑस्कर ले गया ये, ऑस्कर मिलना चाहिये इसे , सदी का सबसे बेहतरीन अभिनेता है ये ' बस यही कहा जा रहा था 22 वर्ष के संघर्ष, परिश्रम, त्याग, लगन , प्रेम और जीवट की सत्य घटना पर आधारित फ़िल्म के ट्रेलर लांच पर...... और दूर कहीं टूटे काटे जीते हुए भगवान फिर से पत्थर में बदल रहे थे , अब उनके पास पुजारी आ गया था .... - ब्रह्म राक्षस (कौशल)

Saturday, February 14, 2015

सवाल

बिना मडगार्ड बिना पैडल की साइकिल के डंडे पर बैठी  नन्ही सी जान आज बहुत खुश थी ... प्लास्टिक का बैट बाल जिसकी चाहत ने उसे पिछले महीनों में कई बार उसे पिटवाया, रुलाया था आज पूरी हो गयी थी .. बाप - बेटे चहकते बतियाते जा रहे थे  लेकिन फिर अचानक बाप चुप हो गया .. मासूम ने बस इतना ही पूछा था ' बापू तू रोज गुलाब क्यों नही बेंचे ? ' " - ब्रह्म राक्षस ©