रिलीविंग लेटर लिए हुए ज्वाईनिंग लेटर की प्राप्त करने के लिए लगी शांत स्वरूपों की लाइन में वो एक मात्र उदास स्वरूप था .. पंक्ति में सबसे आगे लगा एक स्वरूप बार बार मुड़ कर उसे देख रहा था ... काफी देर हो गयी उससे न रहा गया .. अपना स्थान छोड़ कर वो उस उदास स्वरूप के पास आया और पूंछ बैठा क्या हुआ तुम उदास क्यों हो ? ... उदास स्वरूप बोला - मैंने हत्या की है .. एक हल्की सी मुस्कान लिए वो शांत स्वरूप बोला - हम आत्माओं को यहाँ आने के बाद किस योनि में रहे क्या कर्म किये याद नहीं रहता और फिर यदि याद भी रहे तो कर्म शरीर करता फिर हत्या को सोचकर तुम क्यों उदास हो .. ये सुनना था कि पंक्ति टूट गयी सारी आत्माएं ये सोच कर विचलित थी कि इसे अपने कर्म कैसे याद हैं और यदि याद भी हैं तो उदास क्यों हैं ? सब उससे इसका कारण जानने को उत्सुक थे । आखिर ' मैं इसलिए उदास हूँ क्योंकि मैं अब तक समझ नही पाया क्यों मेंरे शरीर ने उस दूसरे शरीर हत्या करने से पहले अपनी मुझ आत्मा को मार डाला था ' - गोडसे की वो आत्मा बोली । ©
.............कब यहां अमर विस्वास , अमिट है कब आस्था ? बस एक शून्य जिसमें होता सब कुछ विलीन , आबद्ध परिस्थिति - मनोवृत्ति की सीमा से , मै जो लिखता वह सब कितना अर्थहीन !
Thursday, January 30, 2014
Tuesday, January 28, 2014
यकीन
उस फाटक के अन्दर प्रवेश किया तो वहां तीन युवक दो अधेड़ बैठे हुए थे ... सहम कर मैंने पूंछा ' 5 साल से कम का कोई बच्चा है क्या ? ' .. सर्दियों में हवा जैसे कपडे चीर कर शरीर में लगती ठीक उसी नज़र से मेरे शरीर को घूरते उस समूह से आवाज आई " 18 साल से ज्यादा उम्र के हैं सब .... हा हा हा हा " और उस सामूहिक ठहाके के पहले ' आपको कौन चाहिए ? ' किनारे वाला युवक फुसफुसाया ... ' मानसिक अपंगो के घर के शारीरिक अपंग ही भला ' ये सोच कर मुड़ी ही थी कि पार्श्व से ' दीदी !! दीदी !! ' चिल्लाता वो आया और झट से ड्राप पीकर ' thank you दीदी ' बोलकर बरामदे में खडी अपनी माँ के पास भागकर ' देखो पी आया दवा ' जताते हुए सा खड़ा हो गया । न जाने क्यों मुझे यकीन हो चला था कि ये बच्चा जीवन में अब कभी नहीं ' गिरेगा ' .... - कौशल 27-01-2014 ©
Monday, January 27, 2014
दर्द
अपने सामने लाखो करोड़ों लोगों को झुकते , अकड़ते , गर्व महसूस करते देखा है किसी के लिए भगवान किसी के लिए शान तो किसी के लिए ईमान हूँ मैं .. इतने लोगों की भावनाओं का प्रतीक बन मुझे फक्र होता है लेकिन उस दिन मुझे सिरहाने रखकर सोये उस मासूम को सुबह उठने पर जब मैं नहीं मिला तो वो रोने लगा बड़ा अजीब लगा , खैर माँ आई और उसके पूछने पर सड़क के कोने वाले कूड़े के ढेर की तरफ इशारा कर दिया ... बेतहाशा भाग कर उसने मुझे उठाकर सीने से लगा लिया और उसी मनोयोग उत्साह से मुझे अपने नन्हे नन्हे हाथों से लहराने लगा जैसे कल लहरा रहा था .. शाम हो गयी पर आज किसी ने लड्डू टाफी देना तो दूर उसकी तरफ देखा भी नहीं ..वो नन्ही जान उदास हो गया शायद नाराज भी .. लगा अब वो भी मुझे फेंक देगा लेकिन उलट इसके , उसने मुझे सहेज कर रख लिया .. अब उसे ' अपना ' सा लगने लगा था मैं , क्योंकि तिरस्कार और कूड़े के ढेर पर फेंके जाने का दर्द वो समझता था शायद ... - एक तिरंगे की आत्म कथा ©
Friday, January 24, 2014
नाम
तुम्हारे जन्म दिन का गिफ्ट मैंने लिया था कैसे भिजवाऊँ के जवाब में " मैं गिफ्ट सिर्फ उससे लेता जिसे दे सकूं " कहकर चुप हुआ ही था कि पलट कर वो फिर बोली ' तो क्या करूं उसका ? ' ... सोचा खामोशी को ही जवाब देने दें .... लेकिन उसने फिर चोट की , कुरेदते हुए बोली ' बताओ क्या करें उसका ? ' .. समंदर की वापस लौटती लहरों के स्वर में बोल उठा ' किसी और को दे देना ' ... उधर से आवाज आई - " नहीं , वो हम आपके लिए लाये थे ... रख लेंगे उन्हें अपने पास ' हमेशा ' " ... उस दिन पता चला रेत पर लिखे नाम लहरें मिटाने नहीं आती अपने साथ ले जाती है ' हमेशा ' के लिए शायद तब तक जब तक समंदर का अस्तित्व है ... ©
Wednesday, January 22, 2014
ट्यूशन पढ़ाकर जेबखर्च बचाकर उसने मुझे पाया था । मुझे अच्छी तरह याद है पहली बार मुझे पहनते समय वो उतना ही सावधान और उत्सुक था जितना एक किशोर चाचा मामा बुआ अपने नवजात भतीजे / भतीजी को गोद में उठाते समय होते हैं । मुझे सब याद है उसका मुझे पहन कर नए साल , गणतंत्र दिवस पर गाना गाना और मुझे पहन कर ही तो वो पहली बार ' उसके ' घर भी गया था ... और हाँ उन दसियों इंटरव्यू में भी तो मैंने उसका साथ दिया था । आखिर एक में वो सफल हुआ । उसकी सफलता ' टर्निंग प्वाईंट ' थी क्योकि उसके बाद से उसका मेरा रोज का साथ हफ़्तों में फिर महीनों में फिर सालों में होते होते बंद होगया । साथ तो दूर अब मेरी सुध भी नहीं ली किसी ने , अरसा हो गया था , लगता मेरा जीवन ख़त्म । फिर एक दिन उस पूस की रात वो कही बाहर से आया और मुझे निकलवा कर एक नज़र देखे बिना उसने मुझे बाहर दे दिया... काम निकलने के बाद इंसान कितना ' ठंडा ' हो जाता ये सोचने को हुआ ही था पर उस रिक्शेवाले के ठिठुरते सर्द शरीर को तपिश देने मैं फिर से जिन्दा हो रहा था उस दिन लगा उम्र भर जिसे गर्म रख कर जिलाता रहा वो मुझे कैसे मरने दे सकता था आखिर उसने आज ' संवेदनाओं की गर्मी ' से मुझे फिर से जिला ही दिया.. - एक कोट की आत्म कथा ©
Sunday, January 19, 2014
मछुआरे की नींद
समुद्र किनारे सोये उस गरीब मछुआरे की निद्रा कैमरे की क्लिक क्लिक से टूटी तो सामने एक सैलानी को खड़े पाया और उसे लगभग नज़र अंदाज करते हुए बीडी सुलगा के वो समुद्र तट को निहारने लगा ।..... आज मौसम सुहावना है तुमने खूब मछलियाँ पकड़ी होंगी है न ? सैलानी अपनी तरफ से बातचीत शुरू करते हुए बोला । हाँ एक चक्कर लगाया 6-7 मछली पकड़ीं । ..... ' तुम्हारी निजी जिन्दगी है लेकिन तुम्हे इस तरह समय बेकार नहीं गवाना चाहिए तुम तीन चार चक्कर और लगा सकते हो , रोज तुम इस तरह मेहनत से काम करोगे तो कल को एक बड़े मछली व्यापारी बन सकते हो ' सैलानी बोला । ....... फिर क्या होगा ? - मछुआरे ने पूंछा । .... फिर तुम्हारे नौकर चाकर होंगे वो तुम्हारा काम करेंगे और तुम आराम किया करना ....। वो तो मैं अभी भी कर रहा था तुम्हारे कैमरे की क्लिक क्लिक ने जगा दिया ... ( पूरी हो चुकी बीडी को फेंकते हुए मछुआरा बोला ) ।
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थोड़े से संशोधन और कांट छाँट के उपरांत नोबल विजेता जर्मन लेखक हाईनिश बोईल की एक लघुकथा ...
ईश्वर
अखंड मानस पाठ के उपरान्त आरती हुई , घंटे - घड़ियाल शंख की जोर दार आवाज बंद हुई , उद्घोष हुए ... ईश्वर मैले कुचैले कपड़ो में , कुछ दोनों हाथ फैलाए , कुछ गोदी में अपने सहोदर लिए मंदिर के बाहर जुटने लगे थे । ©
Friday, January 17, 2014
भीड़
खिचडी बट रही थी लम्बी लाइन लगी थी , झमाझम पानी बरस गया .... अब वहां वो क्रासिंग के पास रहने वाला कबाड़ी बूढा ही खड़ा था बस .. ©
कोड
- और पापा उस ATM card का कोड 6352 है ...
(06-03-1952) ©
- कितनी प्यारी बच्ची है ? बेटा क्या नाम है आपका ?
- ***** बोलकर वो भाग गयी
अपना नाम सुनकर वो चहक उठी , सर उठाकर देखा तो बच्ची पिता की गोद में खिलखिला रही थी , वो मुंह फेर कर चली गयी । ( किसी ने उससे कहा था तुम एक दिन दौड़ कर मेरी बाहों में आओगी , ये वादा है मेरा ) ©
- ये लीजिये ' चेक मेट ' ... शकील मियां
- ओफ-ओ आज आप फिर blacks से खेलते हुए जीत गए शर्मा जी ..
Black ?? पर पापा जीत तो लास्ट में अच्छे की होती है न ? 6 साल का गप्पू बीच में ही पूँछ उठा .... ©
Thursday, January 16, 2014
सुकून
व्यस्ततम शेड्यूल से समय निकाल कर सुभाष को भारत आये तीन दिन हो चुके थे। उसके नब्बे वर्षीय पिता अस्पताल के आईसीयू में भर्ती थे । काफी समय से बीमार थे । उस रात काफी देर तक डाक्टर के कमरे में रहा वो । अगले दिन खबर आई पापा नहीं रहे । तनिक भी नहीं रोया वो , अंतिम संस्कार , त्रयोदशी सब निपट गए आज वो वापस लौट रहा है ... लोग बुदबुदा रहे हैं कि ' बूढा बाप था कौन लाश को ढोए ... यही सोचा होगा शायद ' .... इन बातों की तपिश उसका ह्रदय जलाए दे रही है पर गर्मियों में जलते आँगन में पिता द्वारा नंगे पैर दौड़ कर आना और उसे गोद में उठा लेना उसे याद है ... जल कर अपनों को सुकून देना उसने पिता से ही सीखा था । उसे भी सुकून था कि पिता को वेदना पीड़ा से मुक्ति मिली .... अनंत आकाश की ओर देखा तो पिता की मुस्कुराती हुई छवि दिखाई दी .... बदले में उसकी आँखों में बसा आकाश आज जमकर बरस रहा था .... ©
महापुरुष
बड़ा भव्य पंडाल सजा था , सैकड़ों की संख्या में कैमरे तैय्यार थे , और हजारों की भीड़ थी जो बड़ी मुश्किल से काबू हो रही थी .. देश का ' यूथ आईकन ' , ' स्पोर्ट्स परसन आफ द डेकेड ' निशुल्क शिक्षा अभियान के ' ब्रांड एम्बेसडर ' के रूप में जो आ रहा था । रात ही आई स्पेशल नए रंगों की यूनिफार्म में बच्चों को घुसेड़ कर सुबह से ही बैठा दिया था । अपने कार्यक्रम अनुसार निर्धारित समय से 3 घंटे विलम्ब से आने के बाद ' महापुरुष बस्ते किताबें बाँटते हुए मुस्कुराते हुए फोटो खिचाने लगे , अचानक ... ' ले लो बेटा तुमने हाथ क्यों पीछे कर लिए ? ' ...... ' हम नही लेंदे ' - बच्चा बोला ... बालपन की अक्खड़ता समझकर महापुरुष ने हंसते हुए फिर पूंछा - क्यों ? ...' आप थराब बेचते हो हमने तीबी में देथा , थराब पीकर पापा मम्मा को मालते हैं ' .... महापुरुष के सफ़ेद पड़ चुके चेहरे को 'Oh Such a sweet & Naughty kid ' के रूप में हंसी का लबादा ओढ़ने से आज पहले सबने देख लिया था .... ©
Tuesday, January 14, 2014
-नमस्ते भाई साहब ... हैप्पी मकर संक्रांति
-आपको भी मिसेज सिंह
-ये लीजिये लड्डू खाईये
-अरे वाह शुभकामनाओं के साथ लड्डू भी हैं ... ( खाते हुए ) स्वादिष्ट भी है ...
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-बड़ी जल्दी आगये आप मंदिर से ....
-हां थोड़ी देर हो गयी मिसेज सिंह मिल गईं थी रास्ते में ये लो लड्डू भी दिए
-आप तो पक्के उपरहिता बाह्मन निकले ... गए थे मंदिर खिचडी चढाने और दान में लड्डू ले आये
-अरे वो ... खा के देखो स्वादिष्ट ....
-स्वादिष्ट .... मैं तो जैसे कच्चा जला ही खिलाती आई आज तक ... तुम्ही खाओ ये दान के लड्डू ( चली जाती है )
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एक घंटे बाद :-
सुनिए ये लीजिये खिचड़ी ... आपकी पसंदीदा अमरूद की चटनी , तिल की गजक और लड्डू ... गरम ही खा लीजियेगा .. हम धुप लेने जा रहे
( जाते ही )
- ( बुदबुदाते हुए ) औरतें भी बहुमुखी प्रतिभा की धनी होती ... तिल का ताड़ और तिल के लड्डू दोनों बना लेतीं
- मम्मी S s s s ...
- मम्मी की संतान चुप हो जा . पतंग नहीं चाहिए क्या ? ले लड्डू खा ... ©
Friday, January 10, 2014
शगुन
भूमिका - बस पांच मिनट और दूध गर्म कर लूं ..
यतिन - तुम्हे भी दूध वुध सब अभी गर्म करने की पडी थी ,
6:10 हो गया 6:30 पे पहुंचना है , रास्ते में भी 30 मिनट्स लगेंगे
भूमिका - अरे वंश के लिए कर रही बाबा... माँ भी नहीं हैं और मेड ... न बाबा न
उसके भरोसे छोड़ के वो भी शाम को बिल्कुल नहीं
यतिन - बार बार माँ नहीं इसलिए दिक्कत हो रही मत जताओ ...
और बोटेल में दूध का तो मना किया था सबने ...
भूमिका - तुम्हारी पार्टी कम बिजनेस गैदरिंग ,
ड्रेस कोड में बिजनेस सूट ... कहाँ कैसे उसे सबके सामने दूध पिला
पाऊँगी .. बोलो
यतिन - ( उसकी बात अनसुनी करते हुए ) अच्छा अब जल्दी तो कर लो , मेरी हर ... ( कुछ बुदबुदाहट ) ....
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यतिन - रिवर व्यू होटल ले चलो रमेश ...
सुनो बाईपास से ले चलना शायद आज जैम न लगा हो
रमेश ( 50-70 मीटर चलने के बाद ) - नहीं लगा होगा सर ...
यतिन - क्या ? कैसे नहीं लगा होगा ?
रमेश - जाम नहीं मिलेगा सर वो देखिये बच्चे को दूध पिलाती गाय ...
शगुन होता ये .... ©
Wednesday, January 8, 2014
सिद्ध हनुमान जी
शहर के वीरान कोने में हनुमान जी का वो छोटा सा मंदिर था , कहते है द्वापर कालीन था ... मंगल शनिचर को छोड़ कर भूले भटके ही कोई पहुँचता था वहां ... पर जब भी जाओ तीन लोग हमेशा मिलते 70 साल का वो बूढा पुजारी और मंदिर के बाहर टाफी कैंडी के जार में बंद भुने चने इलाईची दाने बतासे अगरबत्ती लिए घास फूस की मड़िया बनाये ' राम आसरे ' ... और जीर्ण शीर्ण होते मंदिर में बैठे प्रफुल्लित तेजपूर्ण हनुमान जी । बगल में बहती नदी हरे भरे वृक्ष चहचहाते पक्षी पुष्प सुगंध प्रष्फुरित करती शीतल वायु.. प्राकृतिक स्थान का आकर्षण / सौन्दर्य कहिये या भक्ति की प्रबलता पर स्थान दिव्य लगता । फिर एक दिन नव नियुक्त मंत्री जी आये ... मंदिर का जीर्णोद्धार हो गया , मिट्टी के चबूतरे पक्के हो गए , बाउंड्री वाल बन गयी , पेड़ कटके टीन शेड लग गए , खेतों में पार्क बन गए , नदी में बोटिंग शुरू हो गयी पंक्षियों की चहचहाट रिंगटोन से बदल गयी और ' राम आसरे ' की मड़िया को हटा कर पक्की दूकाने बन गईं जिनमे प्रसाद से लेकर सिगरेट कोल्ड ड्रिंक सब मिलता ... अब वहां बहुत भीड़ लगती .. लेकिन न अब वो बूढा पुजारी है न राम आसरे पर हनुमान जी हैं कहते हैं उनकी मूर्ति सिद्ध है ... आँखों से आंसू आज भी निकल पड़ते है ...... ©
Tuesday, January 7, 2014
वर्दी वाला
रात के तीन बज रहे थे .... रुका तो नहीं था पर ब्लाकेज की वजह से धीमे हुए ट्रुक से वो वर्दी वाला लटक गया ... थोड़ी देर लटका रहा फिर कोशिश करके दरवाजे पर आया ही था कि जैक राड सर पर पडी , अगले ही पल वो जमीन पर और पिछले चारों पहियों ने उसको क्षत विक्षत लाश बना दिया ..... सुबह आस पास जुटी इंसानों की भीड़ ' साले दस दस रूपये के पीछे भागते है ये वर्दी वाले ... चढ़ा दिया होगा कोई ट्रक वाला ' यही कह रही थी .... और इस इंसानी शोर में मशीनी वायरलेस ' नंबर नोट किया जाए ट्रक यूं.पी. x xxxx ' बलात्कार और हत्या करके 3 अपराधी भागे है .... नंबर नोट किया जाए .... की आवाज आज दब गयी थी .... ©
Monday, January 6, 2014
हमारा रंग और ताजे होने की मिठास सबका मन भा लेती .... मौसम आता तो क्या अमीर क्या गरीब सब ले हमें जाते ... पर " ' लो पर अम्मा को न दिखाना , नहीं तो गुस्सा करेंगी ' कहकर पिताजी सब्जी के झोले से एक मुठ्ठी हमें निकाल कर दे देते जिसे झट से वो पिता के पुराने पैंट से बने नेकर में ठूस कर सरपट हो जाता " .... आज 30 साल बाद वो झोला नहीं है वो नेकर नहीं है पर हम है , जिसे अब वो खुद लाता आखिर बड़ा जो हो गया है , और पिता बूढ़े .... खैर ये तो जीवन चक्र है , हमें क्या .. पर एक बात हमें बहुत डराती .. सब्जी मंडी वाले मंदिर की चौखट पे हमसे भरा झोला रख कर वो प्रणाम करता .... किसी दिन अगर भगवान से पूँछ बैठा ' औलाद की उम्र माँ बाप को क्यों नहीं लगाते ? ' तो ... - हरी मटर की आत्म कथा से । ©
Saturday, January 4, 2014
अम्बेडकर पार्क , फैजाबाद रोड और गोमती नगर के बीच का इलाका , बड़ी चौड़ी सडको का मकड़जाल , भूल से गलत लेन में घुस आना और तो और हेलमेट और कान के बीच फंसे फोन से बार बार यही शब्द ' अरे जल्दी आओ , मुझे बुला के खुद कहाँ घूम रहे ' .... बड़ी आफत थी रास्ता पूंछने के लिए भी कोई नहीं दिख रहा या कहूं रुक रहा था । दूर सड़क के उस छोर पर एक स्कूटी खड़ी दिखी तो बाईक दौड़ा दी , एक मैडम पुल के किनारे थी (शायद )फोन पर बात कर रही थी ... हम जैसे गांव देहात वालों से न जाने क्यों excuse me नहीं कहा जाता .... तो सीधे ' सुनिए मैडम ये फन वेव्स किधर पड़ता ' बोल दिया .... उनके ईशारे नहीं समझा तो बेझिझक बोला ' जी समझा नहीं ' .... थोडा पास आकर उन्होंने बाकायदा दायें बाएं करके समझा दिया ... शुक्रिया बोलने को उनकी तरफ गौर से देखा तो नजरें थम गयीं जबान जम गयी... आखें आंसुओं से भरी थी उनकी ... वाह रे औरत अपना दुःख रोक कर भी मदद करने चली आई ... पूंछने को हुआ ही था कि ' कोई परेशानी है ? कोई मदद कर सकता हूँ ' पर फोन पर 'वो ' बोल उठी ' पता पूंछने को मैडम ही मिली थी ... जल्दी आओ ' .... बाईक मोड़ कर दौड़ा दी वो मिली बड़ा हसीं सुकून देने वाला पल था ... पर अगले दिन अखबार सीने में नश्तर चुभा रहा था ' गोमती में युवती की लाश मिली ' छपा था ... ©