ट्यूशन पढ़ाकर जेबखर्च बचाकर उसने मुझे पाया था । मुझे अच्छी तरह याद है पहली बार मुझे पहनते समय वो उतना ही सावधान और उत्सुक था जितना एक किशोर चाचा मामा बुआ अपने नवजात भतीजे / भतीजी को गोद में उठाते समय होते हैं । मुझे सब याद है उसका मुझे पहन कर नए साल , गणतंत्र दिवस पर गाना गाना और मुझे पहन कर ही तो वो पहली बार ' उसके ' घर भी गया था ... और हाँ उन दसियों इंटरव्यू में भी तो मैंने उसका साथ दिया था । आखिर एक में वो सफल हुआ । उसकी सफलता ' टर्निंग प्वाईंट ' थी क्योकि उसके बाद से उसका मेरा रोज का साथ हफ़्तों में फिर महीनों में फिर सालों में होते होते बंद होगया । साथ तो दूर अब मेरी सुध भी नहीं ली किसी ने , अरसा हो गया था , लगता मेरा जीवन ख़त्म । फिर एक दिन उस पूस की रात वो कही बाहर से आया और मुझे निकलवा कर एक नज़र देखे बिना उसने मुझे बाहर दे दिया... काम निकलने के बाद इंसान कितना ' ठंडा ' हो जाता ये सोचने को हुआ ही था पर उस रिक्शेवाले के ठिठुरते सर्द शरीर को तपिश देने मैं फिर से जिन्दा हो रहा था उस दिन लगा उम्र भर जिसे गर्म रख कर जिलाता रहा वो मुझे कैसे मरने दे सकता था आखिर उसने आज ' संवेदनाओं की गर्मी ' से मुझे फिर से जिला ही दिया.. - एक कोट की आत्म कथा ©
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