समुद्र किनारे सोये उस गरीब मछुआरे की निद्रा कैमरे की क्लिक क्लिक से टूटी तो सामने एक सैलानी को खड़े पाया और उसे लगभग नज़र अंदाज करते हुए बीडी सुलगा के वो समुद्र तट को निहारने लगा ।..... आज मौसम सुहावना है तुमने खूब मछलियाँ पकड़ी होंगी है न ? सैलानी अपनी तरफ से बातचीत शुरू करते हुए बोला । हाँ एक चक्कर लगाया 6-7 मछली पकड़ीं । ..... ' तुम्हारी निजी जिन्दगी है लेकिन तुम्हे इस तरह समय बेकार नहीं गवाना चाहिए तुम तीन चार चक्कर और लगा सकते हो , रोज तुम इस तरह मेहनत से काम करोगे तो कल को एक बड़े मछली व्यापारी बन सकते हो ' सैलानी बोला । ....... फिर क्या होगा ? - मछुआरे ने पूंछा । .... फिर तुम्हारे नौकर चाकर होंगे वो तुम्हारा काम करेंगे और तुम आराम किया करना ....। वो तो मैं अभी भी कर रहा था तुम्हारे कैमरे की क्लिक क्लिक ने जगा दिया ... ( पूरी हो चुकी बीडी को फेंकते हुए मछुआरा बोला ) ।
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थोड़े से संशोधन और कांट छाँट के उपरांत नोबल विजेता जर्मन लेखक हाईनिश बोईल की एक लघुकथा ...
.............कब यहां अमर विस्वास , अमिट है कब आस्था ? बस एक शून्य जिसमें होता सब कुछ विलीन , आबद्ध परिस्थिति - मनोवृत्ति की सीमा से , मै जो लिखता वह सब कितना अर्थहीन !
Sunday, January 19, 2014
मछुआरे की नींद
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लघुकथा
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