.............कब यहां अमर विस्वास , अमिट है कब आस्था ? बस एक शून्य जिसमें होता सब कुछ विलीन , आबद्ध परिस्थिति - मनोवृत्ति की सीमा से , मै जो लिखता वह सब कितना अर्थहीन !
- ये लीजिये ' चेक मेट ' ... शकील मियां - ओफ-ओ आज आप फिर blacks से खेलते हुए जीत गए शर्मा जी .. Black ?? पर पापा जीत तो लास्ट में अच्छे की होती है न ? 6 साल का गप्पू बीच में ही पूँछ उठा .... ©
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