.............कब यहां अमर विस्वास , अमिट है कब आस्था ? बस एक शून्य जिसमें होता सब कुछ विलीन , आबद्ध परिस्थिति - मनोवृत्ति की सीमा से , मै जो लिखता वह सब कितना अर्थहीन !
अखंड मानस पाठ के उपरान्त आरती हुई , घंटे - घड़ियाल शंख की जोर दार आवाज बंद हुई , उद्घोष हुए ... ईश्वर मैले कुचैले कपड़ो में , कुछ दोनों हाथ फैलाए , कुछ गोदी में अपने सहोदर लिए मंदिर के बाहर जुटने लगे थे । ©
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