हमारा रंग और ताजे होने की मिठास सबका मन भा लेती .... मौसम आता तो क्या अमीर क्या गरीब सब ले हमें जाते ... पर " ' लो पर अम्मा को न दिखाना , नहीं तो गुस्सा करेंगी ' कहकर पिताजी सब्जी के झोले से एक मुठ्ठी हमें निकाल कर दे देते जिसे झट से वो पिता के पुराने पैंट से बने नेकर में ठूस कर सरपट हो जाता " .... आज 30 साल बाद वो झोला नहीं है वो नेकर नहीं है पर हम है , जिसे अब वो खुद लाता आखिर बड़ा जो हो गया है , और पिता बूढ़े .... खैर ये तो जीवन चक्र है , हमें क्या .. पर एक बात हमें बहुत डराती .. सब्जी मंडी वाले मंदिर की चौखट पे हमसे भरा झोला रख कर वो प्रणाम करता .... किसी दिन अगर भगवान से पूँछ बैठा ' औलाद की उम्र माँ बाप को क्यों नहीं लगाते ? ' तो ... - हरी मटर की आत्म कथा से । ©
No comments:
Post a Comment