Thursday, January 16, 2014

सुकून

व्यस्ततम शेड्यूल से समय निकाल कर सुभाष को भारत आये तीन दिन हो चुके थे। उसके नब्बे वर्षीय पिता अस्पताल के आईसीयू में भर्ती थे । काफी समय से बीमार थे । उस रात काफी देर तक डाक्टर के कमरे में रहा वो । अगले दिन खबर आई पापा नहीं रहे । तनिक भी नहीं रोया वो , अंतिम संस्कार , त्रयोदशी सब निपट गए आज वो वापस लौट रहा है ... लोग बुदबुदा रहे हैं कि ' बूढा बाप था कौन लाश को ढोए ... यही सोचा होगा शायद ' .... इन बातों की तपिश उसका ह्रदय जलाए दे रही है पर गर्मियों में जलते आँगन में पिता द्वारा नंगे पैर दौड़ कर आना और उसे गोद में उठा लेना उसे याद है ... जल कर अपनों को सुकून देना उसने पिता से ही सीखा था । उसे भी सुकून था कि पिता को वेदना पीड़ा से मुक्ति मिली .... अनंत आकाश की ओर देखा तो पिता की मुस्कुराती हुई छवि दिखाई दी .... बदले में उसकी आँखों में बसा आकाश आज जमकर बरस रहा था .... ©

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