" भरी बस के स्टैंड पर रुकने और सवारियां उतरने के समय एक साईकिल रिक्शे वाले के चेहरे पर जैसी आस जगी होती वही आस उसके 11 साल के चेहरे पर थी जब उसने मेरे नीचे गत्ते दफ्ती का छोटा सा ढेर देखा । नीचे घुस कर वो उसे ऐसे समेटने लगा जैसे सपनों में आया खजाना हो । पर पहिये के नीचे से गत्ता खीचने से मैं तनिक सी हिली भर कि मेरे संवेदनशील सेंसर अलार्म ने चिल्लाना शुरू कर दिया ' बीप ... बीप .... बीप .... बीप ' । चौकीदार मालिक भागते हुए आये , खीचते हुए उसे निकाल कर उसपर ' माँ बहन और चोर ' थोप दिया , कुछ हाथ जड़े सो अलग । जाते हुए उसने एक बार मुड़ कर मुझे नफरत भरे आंसुओं के साथ देखा ... मन हुआ बोल पडूं ' आओ ले जाओ अपना सामान नहीं चिल्लाऊंगी इस बार ' लेकिन ऐसा नहीं हो सकता था मेरी संवेदनशीलता दगा नहीं दे सकती । ये भले ही इंसान ने मुझे दी हो पर इंसान जैसी कतई नहीं हैं " ..... - एक कार की आत्मकथा से ©
.............कब यहां अमर विस्वास , अमिट है कब आस्था ? बस एक शून्य जिसमें होता सब कुछ विलीन , आबद्ध परिस्थिति - मनोवृत्ति की सीमा से , मै जो लिखता वह सब कितना अर्थहीन !
Tuesday, October 29, 2013
Saturday, October 26, 2013
सीमापार से गोलीबारी शुरू होते ही गुलफाम , उसके भाई बहन और माँ बाप उस बंकर नुमा गड्डे में छिप गए । पर ये क्या बकरियां आज खुले में ही बंधी रह गयीं । गुलफाम के माँ बाप एक दुसरे को इसके लिए दोषी ठहरा रहे थे । आखिर गुलफाम की माँ झल्ला कर बोली - ' खाने के वैसे ही लाले पड़े हैं अगर बकरी नहीं रही तो मेरे बच्चों को दूध भी नहीं मिलेगा ... मैं जा रही हूँ उन्हें छिपाने ' ....
गुलफाम का बाप बोला - ' रुक मैं भी आता हूँ ' ...... दोनों ने मिलकर जल्दी से सभी बकरियों को आड़ में किया और गड्ढे की ओर वापस लौटने लगे । पर माँ को न जाने कहाँ से पड़ोसी रउफ का मेमना गोलीबारी से सहमा हुआ इधर उधर भागता दिखाई दिया । ' उसे आड़ में नहीं किया तो कही वो गोली के निशाने में न आ जाए ' ये सोच कर उसकी ओर बढ़ी ही थी एक गोली उसकी पीठ से घुसते हुए सीने से निकल गयी । वो बेजान क्षत विक्षत पडी थी गुलफाम का पिता संवेदना रोष और शोक का सागर बना , रोते चीखते बच्चों को सम्हाले गड्ढे में खड़ा यही सोच रहा था ' गोली ने उसकी नीयत का भी लिहाज नहीं किया ' .... ©
गुलफाम का बाप बोला - ' रुक मैं भी आता हूँ ' ...... दोनों ने मिलकर जल्दी से सभी बकरियों को आड़ में किया और गड्ढे की ओर वापस लौटने लगे । पर माँ को न जाने कहाँ से पड़ोसी रउफ का मेमना गोलीबारी से सहमा हुआ इधर उधर भागता दिखाई दिया । ' उसे आड़ में नहीं किया तो कही वो गोली के निशाने में न आ जाए ' ये सोच कर उसकी ओर बढ़ी ही थी एक गोली उसकी पीठ से घुसते हुए सीने से निकल गयी । वो बेजान क्षत विक्षत पडी थी गुलफाम का पिता संवेदना रोष और शोक का सागर बना , रोते चीखते बच्चों को सम्हाले गड्ढे में खड़ा यही सोच रहा था ' गोली ने उसकी नीयत का भी लिहाज नहीं किया ' .... ©
Wednesday, October 23, 2013
करवा चौथ का नाश हो सत्यानाश हो ... नारी किसी की गुलाम नहीं ... क्यों रहे किसी के लिए भूखा प्यासा ... भूखे रहने से भी किसी आयु बढ़ती है क्या और कैसे ? ....और सबसे बड़ी बात " भूखे रहने का प्रेम से क्या सम्बन्ध ? " ...
ये सब पढ़कर उसके अंतर्मन में विचारों के बादल आज पूरे वेग से बरस रहे थे , लगा परम्परा आस्था प्रेम रूपी बस्ती को बहाने से आज कोई नहीं रोक सकता .. इस मूसलाधार बारिश से दुबक कर थक कर कब नींद लग गयी पता ही न चला .... और जब सपना टूटा नींद खुली तो पाया हामिद और अमीना जा चुके चुके थे । लेकिन तीन पैसे का चिमटा और अमीना के प्रेमाश्रु छोड़ गए थे .... न जाने क्यों आज वो गोवर्धन थामे कृष्ण जैसे लग रहे थे । ©
ये सब पढ़कर उसके अंतर्मन में विचारों के बादल आज पूरे वेग से बरस रहे थे , लगा परम्परा आस्था प्रेम रूपी बस्ती को बहाने से आज कोई नहीं रोक सकता .. इस मूसलाधार बारिश से दुबक कर थक कर कब नींद लग गयी पता ही न चला .... और जब सपना टूटा नींद खुली तो पाया हामिद और अमीना जा चुके चुके थे । लेकिन तीन पैसे का चिमटा और अमीना के प्रेमाश्रु छोड़ गए थे .... न जाने क्यों आज वो गोवर्धन थामे कृष्ण जैसे लग रहे थे । ©
Monday, October 21, 2013
बरसात का मौसम था । धरा पर चारों और पर प्रकृति पल्लवित प्रस्फुटित हो रही थी । मैदान के उस कोने में न जाने कहाँ से वो यूकेलिप्टस का बीज पनपने लगा था । कोने की घास जो अब तक वीरान पडी रहती थी अब खुश थी । उसके जीवन में कोई हमदम जो आया था । पर यूकेलिप्टस ऊंचाई प्राप्ति का आकांक्षी था । समय बीता अब यूकेलिप्टस ' ऊंचाई ' छु रहा था और घास वहीं नीचे ' विस्तारित ' होती रही । सुबह जागिंग तो शाम को फुटबाल खेलने वालों के द्वारा रौंदी जाती और थोड़ी बढ़ने पर काट ली जाती लेकिन वही रही । इस बार तो गर्मियों में भी वो नहीं सूखी बस भूरी भूरी होकर रह गयी । पर ' ऊंचाई ' कभी नहीं झुकी वो खड़ी रही अडिग न कभी छाया दी न कभी फल .... पर कल जोर का तूफ़ान आया सारा पेड़ खड़े रहे लेकिन ' ऊंचाईयां ' आज उस ' विस्तार ' के आगोश आ पड़ी थी । .... क्या .... क्या कह रहे हो ? वो प्रेमियों का जोड़ा कल ही उसके तने पर ' दिल ' उकेर कर आया था .... ©
Sunday, October 20, 2013
तमाम उम्र गुजार देंगे तेरे इन्तेजार में
ज़र्रा ज़र्रा कतरा कतरा ही सही
जिन्दगी में आती रहना ।
दरख्त है पतझड़ उजाड़ कर जाते
बनके बहार का मौसम शाखों पर
जिन्दगी में आती रहना
तन्हाईयों में धड़कना बंद सा कर देता है जालिम
नफ़स की डोर हो तुम
जिन्दगी में आती रहना
आशिक हूँ माबूद की जूस्तजू में फिरता
जौ दैर-ए-दिया का बनके
जिन्दगी में आती रहना ...... ©
---------------------------
नफस - सांस
माबूद - आराध्य
जौ दैर-ए-दिया - मंदिर के दिए का प्रकाश
ज़र्रा ज़र्रा कतरा कतरा ही सही
जिन्दगी में आती रहना ।
दरख्त है पतझड़ उजाड़ कर जाते
बनके बहार का मौसम शाखों पर
जिन्दगी में आती रहना
तन्हाईयों में धड़कना बंद सा कर देता है जालिम
नफ़स की डोर हो तुम
जिन्दगी में आती रहना
आशिक हूँ माबूद की जूस्तजू में फिरता
जौ दैर-ए-दिया का बनके
जिन्दगी में आती रहना ...... ©
---------------------------
नफस - सांस
माबूद - आराध्य
जौ दैर-ए-दिया - मंदिर के दिए का प्रकाश
आज साहित्य के क्षेत्र में सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि अब लोगों की समस्याओं का आत्मा या भावना से कोई लेना देना नहीं रह गया है । अब सबके मन में सिर्फ एक ही सवाल है ' मैं कब मशहूर बनूँगा / बनूंगी ? ' जो भी युवा लेखक लेखिकाएं हैं वे अपनी इस चाहत के कारण खुद से द्वन्द कर रहे हैं । इसी द्वन्द में वे ज़मीनी हकीकत और इंसानी भावनाओं को भूल गए हैं । उन्हें एक बार फिर जीवन के शास्वत सत्य और भावनाओं के बारे में सीखना होगा , क्योंकि इसके बिना कोई रचना बेहतर नहीं हो सकती । कवि या लेखक की जिम्मेदारी बनती है कि वह ऐसा लिखे , जिससे पढ़ने वाले व्यक्ति के मन में साहस , सम्मान , उम्मीद और ज़ज्बा पैदा हो , जो उसे प्रेरित कर सके अपने जीवन की मुश्किलों के आगे डटे रहने और जीतने के लिए । - विलियन फाल्क्नर (10 दिसंबर 1950 को नोबल पुरुस्कार ग्रहण करते समय दिए गए भाषण का अंश । )
Saturday, October 19, 2013
चाय ... डिप चाय ... कह के चाय वाला गया ही था कि वो अधेड़ क्रीज पर अपना गागर में सागर रूपी झोला लिए किताबे बेचने आ गया । खचाखच भरे कूपे में जगह बनाना उतना ही मुश्किल था जितना सचिन द्रविड़ और गांगुली के दौर में किसी नए बल्लेबाज के लिए टॉप 3 में जगह बनाना । लेकिन आपके पास टाईमिंग शाट सेलेक्शन और प्रतिभा हो तो मौके तो मिल ही जाते हैं । विनम्रता की चाशनी में डूबे बॉस , दादा जी , आंटी जी , दीदी जी जैसे संबोधनों ने उसको खड़ा होने की जगह दिला दी । दादी दादा जी के सामने कल्याण अखंड ज्योति , अंकल के सामने इंडिया टुडे तहलका आउटलुक , आंटी के सामने गृह शोभा , उनकी तरुण कन्या के लिए मेंहदी डिजाइन पाक शास्त्र ... तो सबसे छोटे राजा बाबू के लिए सरस सलिल चम्पक राज कामिक्स दिखाना गेंद को उसकी मेरिट के हिसाब से खेलने का लाजवाब उदाहरण था उसे सफलता भी मिली । अब खिड़की से बाहर झाँक रहे उस युवक के सामने उसने मुस्कुराते हुए ' मनोहर कहानियाँ ' चमकाई उसने ... युवक के चश्मे से तरेरती आँखों को देख कर अति आत्मविश्वास में स्पिन को पढ़े बिना आगे बढ़ कर लाफ्टेड शॉट मारने के प्रयास में विकेट गवां कर वो आगे बढ़ गया था । ... ©
चाक और पोतना से
घिस चुकी जीवन की पाटी पर
मैं लिखता हूं
मृत्यु की बातें
अंत की बातें
अवसान की बातें
क्योंकि
मुझे विश्वास है मृत्यु पर
साझा करेगी एक दिन
मेरी आत्मा पर पडा
पापों का बोझ
अन्तर्मन की कलुषितायें
हृदय की वेदना
और सत्य का रोष
असफ़लता , जडता
मूर्खता , धृष्टता
उज्ज्वलता , प्रखरता समेत
आत्म मूल्यांकन का सारा कोष
और बदले में देगी
मुझे एक सुप्त मुस्कान
जब तक दुबारा निकल न जाऊं
मैं उसके साथ जीवन की खोज पर । ......©
घिस चुकी जीवन की पाटी पर
मैं लिखता हूं
मृत्यु की बातें
अंत की बातें
अवसान की बातें
क्योंकि
मुझे विश्वास है मृत्यु पर
साझा करेगी एक दिन
मेरी आत्मा पर पडा
पापों का बोझ
अन्तर्मन की कलुषितायें
हृदय की वेदना
और सत्य का रोष
असफ़लता , जडता
मूर्खता , धृष्टता
उज्ज्वलता , प्रखरता समेत
आत्म मूल्यांकन का सारा कोष
और बदले में देगी
मुझे एक सुप्त मुस्कान
जब तक दुबारा निकल न जाऊं
मैं उसके साथ जीवन की खोज पर । ......©
Friday, October 18, 2013
हमारे जीवन में सीखने का बड़ा महत्त्व बताया गया है । सीखना एक कला है विज्ञान है आवश्यकता है ऐसा प्रायः पढ़ने सुनने में आता है । सीखने को जीवन पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया भी कहा गया है । पर कभी सोच कर देखिये हम क्या ' सीखते हैं ? ' .... जिसके प्रति हम सीखना सीखना कहकर प्रतिबद्धित रहते वो क्या सच में सीखना है ? ... नहीं बिलकुल नहीं । ये सीखना नहीं अनुकरण है जो हमें सीमित कर देता , ताँगे मे जुते घोड़े की तरह जिसकी आँखों पर बंधी युक्ति उसे सीधा देखने को विवश करे रहती । घोडा चलता है दौड़ता है लक्ष्य तक भी पहुँचता है पर अपने नहीं ।
बात विज्ञान की करें तो विश्व के हर कोने में आईन्सटीन , न्यूटन के प्रतिपादित सिद्धांत पढाये जाते / सिखाये जाते ? क्या हम सच में उन्हें सीखते ? नहीं हम बस उन तक सीमित होकर उत्तर पुस्तिका में उनका उपयोग करते । हम इन सिद्धांतों को तब तक सीख नहीं पायेंगे जब तक हम उनके प्रतिपादन में लगी जिज्ञासा परिश्रम असफलता लगन को अपने स्तर से नहीं जियेंगे ।
कला और साहित्य के क्षेत्र में ही देखिये । नवांगतुक रचनाकारों को प्रसिद्ध रचनाकारों को पढने और सीखने का सुझाव देते लोग मिल जायेंगे । पर क्या वो सही है ? क्योंकि पढ़कर सीखने की कोशिश से हमारी रचना शैली और वैचारिक स्तर प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता ? तो फिर हमने जो सीखा वो अनुकरण ही हुआ न ?
सृष्टि में मानवीय विकास के चरणों में आग जलाना सबसे बड़ी खोज माना जाता है ? सृष्टि के उस पहले पुरुष ने आग जिज्ञासा आवश्यकता के वशीभूत होकर जलाने के अनगिनत असफल प्रयास किये होंगे तब जाकर उसे सफलता मिली होगी । पर साथ ही उसे पत्थर रगड़ते रगड़ते भिन्न भिन्न पत्थरों के अन्य उपयोग इनकी कठोरता भी समझ आई होगी । उसे ये सब किसी सीखने की लालसा से नहीं मिला । उसे ये सब करने के प्रतिफल स्वरूप मिला । इसलिए सीखने की वैशाखी छोडिये और लक्ष्य के मनोविज्ञान से बचिए और खोजने / जिज्ञासा के जूते पहन कर निकल पड़िये ...
बात विज्ञान की करें तो विश्व के हर कोने में आईन्सटीन , न्यूटन के प्रतिपादित सिद्धांत पढाये जाते / सिखाये जाते ? क्या हम सच में उन्हें सीखते ? नहीं हम बस उन तक सीमित होकर उत्तर पुस्तिका में उनका उपयोग करते । हम इन सिद्धांतों को तब तक सीख नहीं पायेंगे जब तक हम उनके प्रतिपादन में लगी जिज्ञासा परिश्रम असफलता लगन को अपने स्तर से नहीं जियेंगे ।
कला और साहित्य के क्षेत्र में ही देखिये । नवांगतुक रचनाकारों को प्रसिद्ध रचनाकारों को पढने और सीखने का सुझाव देते लोग मिल जायेंगे । पर क्या वो सही है ? क्योंकि पढ़कर सीखने की कोशिश से हमारी रचना शैली और वैचारिक स्तर प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता ? तो फिर हमने जो सीखा वो अनुकरण ही हुआ न ?
सृष्टि में मानवीय विकास के चरणों में आग जलाना सबसे बड़ी खोज माना जाता है ? सृष्टि के उस पहले पुरुष ने आग जिज्ञासा आवश्यकता के वशीभूत होकर जलाने के अनगिनत असफल प्रयास किये होंगे तब जाकर उसे सफलता मिली होगी । पर साथ ही उसे पत्थर रगड़ते रगड़ते भिन्न भिन्न पत्थरों के अन्य उपयोग इनकी कठोरता भी समझ आई होगी । उसे ये सब किसी सीखने की लालसा से नहीं मिला । उसे ये सब करने के प्रतिफल स्वरूप मिला । इसलिए सीखने की वैशाखी छोडिये और लक्ष्य के मनोविज्ञान से बचिए और खोजने / जिज्ञासा के जूते पहन कर निकल पड़िये ...
Wednesday, October 16, 2013
" प्रेम के सामने जैसे ' मैं ' नहीं टिकता उसी तरह मेरे आवरण भी ज्यादा देर नहीं टिके । मेरी कोमलता उसकी प्यास के उन्माद से छिन्न भिन्न हुई जा रही थी मुझमे भरी सारी मिठास घुल रही थी । विडम्बना तो देखिये मेरे जैसी दिखने वाली मेरे जैसी कोमलता का गुण लिए वो भी मेरी सहायता नहीं कर रही थी , इधर उधर होते ही वो फिर से मुझे समेट कर उस कठोरता तीक्ष्णता के बीच चबने के लिए प्रस्तुत कर देती देती इतना ही नहीं थोड़ी थोड़ी देर में वो दोनों मिलकर मेरी नुमाईश करने के लिए बाहर निकालते । आखिर पूरी तरह चबाने निचोड़ने छिन्न भिन्न करने के बाद उसने सावधानी से मुझे ' कागज ' के टुकड़े में लपेट कर गुणहीन स्वादहीन करके अँधेरे कोने में जहाँ मुझे खोज पाना मुश्किल था , थूंक दिया । " - रेड लाईट एरिया से मिली डायरी का अधजला पन्ना .....©
Tuesday, October 15, 2013
मुझे नहीं भाते है
क्रीज जमे परिधान
चमकते जूते
रोज एक सी आने वाली खुशबू
डीसेंट हेयर कट
और एक चिपकी सी मुस्कान
मुझे नहीं भाता है दृढ़ता
विचारधारा वाद ज्ञान की पगडंड़ियों
पर रोज रोज चलना
मेरे लिए जीवन नहीं है बस
जूते की एडियाँ घिसना
शायद इसीलिये तुम पाओगे
मेरे जूतों को कम घिसा पर
मिट्टी से गोबर से रेत से भरा
तले में धसे कांटे
जिनसे कभी खून था उभरा
हां मैं ऐसा ही हूँ
उधडी हुई नेकर पहने
गालों पर बहे आंसू के निशान लिए
छिले हुए घुटनों के साथ
फिर से खेलने जाने की जिद करते बच्चे जैसा ... ©
क्रीज जमे परिधान
चमकते जूते
रोज एक सी आने वाली खुशबू
डीसेंट हेयर कट
और एक चिपकी सी मुस्कान
मुझे नहीं भाता है दृढ़ता
विचारधारा वाद ज्ञान की पगडंड़ियों
पर रोज रोज चलना
मेरे लिए जीवन नहीं है बस
जूते की एडियाँ घिसना
शायद इसीलिये तुम पाओगे
मेरे जूतों को कम घिसा पर
मिट्टी से गोबर से रेत से भरा
तले में धसे कांटे
जिनसे कभी खून था उभरा
हां मैं ऐसा ही हूँ
उधडी हुई नेकर पहने
गालों पर बहे आंसू के निशान लिए
छिले हुए घुटनों के साथ
फिर से खेलने जाने की जिद करते बच्चे जैसा ... ©
Sunday, October 13, 2013
दशहरे का मेला था । भाई हजारों की भीड़ तो होनी ही थी आखिर इस बार रिकार्ड तोड़ 120 फीट का रावण जो जलाया जा रहा था । आखिर आग लगी पुतला जला पटाखे फूटे और साथ ही हुआ ' सियाबर राम चन्द्र की जय ' का रोमहर्षक आंदोलित प्रफुल्लित करने वाला सस्वर उदघोष । लगा रावण जल गया कहानी ख़त्म .... पर नहीं दोस्त , कहानियाँ ख़त्म नहीं होती । वो तो अभी भी बरकरार थी .... बैकलेस ब्लाउज से झांकते अधोवस्त्र ताकती उन आँखों में , 25 रूपये हर माल की दूकान में सबको सुनाकर कहे गए ' बड़ा मस्त मस्त माल लगाए हो ' के स्वर में और ' जरा हटिये ' कहने के स्थान पर दिए जाने वाले उस उन्मादित पाशविक स्पर्श में ..... अब न जाने क्यों तरस आ रहा था दफ्ती , लकड़ी , बांस , कपड़े , रंग , पटाखे और इन सबको को आकार देने में किये गए श्रम पर ..... आखिर हर बार की तरह इस बार भी बुराई के नाम पर बस इन्हें ही बलि चढ़ना पड़ा । ©
Friday, October 11, 2013
जेल से सात साल बाद निकला था वो । समझ नहीं आ रहा था कहाँ जाए । शहर से बाहर जाने के लिए पटरियों के किनारे किनारे प्लेटफार्म की और बढ़ चला था उसका एक एक कदम उसे याद दिला रहा कि कैसे उस मजदूरन के साथ जो उसने किया उसके बाद सब कुछ बदल गया था । घर परिवार नाते रिश्तेदार सब कन्नी काट गये थे । जेल में प्रताड़ना मिली सो अलग । मुर्दा शरीर की भांति उद्देश्यहीन चला जा रहा था । इंजन के भोपू की आवाज आयी तो जैसे नींद से जगा और तभी एक कामगार महिला का तेज स्वर भी सुनाई दिया ' ' बबुआ S s s बबुआ S s s पटरी से हट जा s s s ' लेकिन पटरी पर खेल रहा बालक शायद बधिर था .. टस से मस न हुआ । महिला के चेहरे पर गौर देते ही उसे साढ़े सात साल पहले की रात याद आगई ... ये तो च.. चमेली है .. तो क्या ये बच्चा मेरा ? .... उस मुर्दा शरीर में बिजली सी कौंध गयी तीनो ट्रैक पार करके बच्चे को एक किनारे धक्का दे दिया पर खुद को इंजन के सामने से नहीं हटा (पा ?)या ... ट्रेन जा चुकी थी , बच्चा माँ की गोद में था .. मांस के लोथड़े प्रश्न लिए बिखरे पड़े थे " ये पाप का प्रायश्चित था या दंड ? " ....©
Thursday, October 10, 2013
कभी ज्वार बनकर
कभी फुहार बनकर
कभी किसी के सामने
कभी सूने में
छिपा रहता हूँ कभी
दृग के कोने में
चिता को सुखाने
विरह को गलाने
दर्द को जताने
प्रेम दर्शाने
आशा में निराशा में
हर्ष में उल्लास में
मैं निकल आता हूँ ....
कभी रूमाल से
कभी बस गाल तक
खुद की आस्तीन से
माँ के आँचल तक
कभी हथेलियों से
यारो की हथखेलियों से
अक्सर रोका जाता हूँ मैं
पर मैं नहीं हूँ
कमजोरी या
निर्बलता का प्रतीक
मैं प्रतीक हूँ
पवित्रता का
प्रबलता का
ह्रदय की ...
©
कभी फुहार बनकर
कभी किसी के सामने
कभी सूने में
छिपा रहता हूँ कभी
दृग के कोने में
चिता को सुखाने
विरह को गलाने
दर्द को जताने
प्रेम दर्शाने
आशा में निराशा में
हर्ष में उल्लास में
मैं निकल आता हूँ ....
कभी रूमाल से
कभी बस गाल तक
खुद की आस्तीन से
माँ के आँचल तक
कभी हथेलियों से
यारो की हथखेलियों से
अक्सर रोका जाता हूँ मैं
पर मैं नहीं हूँ
कमजोरी या
निर्बलता का प्रतीक
मैं प्रतीक हूँ
पवित्रता का
प्रबलता का
ह्रदय की ...
©
न्यूज फीड पर सनी लियोन का फोटो चमक रहा था । एक मित्र ने लाईक किया हुआ था । फोटो पर क्लिक किया तो पाया उभारों और घुमावों को विशेष रूप से दिखाने का प्रयास था । अपनी अपनी आकांक्षाओं इच्छाओं और दावों को प्रकट करते हुए हजारों लाईक्स और सैकड़ों कमेंट्स थे । स्क्रीन टाईम आउट महज 15 सेकेण्ड का सेट था तो स्क्रीन ब्लैक हो गयी अब SMART फोन की DULL हो चुकी स्क्रीन पर चेहरा दिख रहा । ऐसा लगा प्रतिरूप कह रहा हो
- तुम भी तो किसीके इनबाक्स में ऐसे ही नियमित रूप से अपनी इच्छाओं आकांक्षाओं दावो को प्रकट करते हो ...
- नहीं नहीं मेरा प्रेम शारीरिक नहीं है मैंने कब की प्रणय संबंधी याचना ?
- पर ये जैसे कर रहे तुम भी वैसे ही करते हो न .. मैं कैसे मानू ?
कहने वाला था कि मैं नैतिक हूँ पर रेम्बू याद आगये ' नैतिकता दिमाग की कमजोरी है ' ... मौन ताड़ कर प्रतिरूप बोला - बोलो बोलो ... चुप क्यों हो गए ? ... नीत्शे विनोबा कीट्स टैगोर सब याद आ रहे थे पर मौन थे शायद उनका मौन कह रहा था कि अपने सच के लिए हमारा इस्तेमाल क्यों करना चाह रहे हो ।
प्रतिरूप अग्नि सी कठोरता लिए बोला - ' अपने प्रेम का प्रमाण दो मुझे या उसे परेशान करना बंद करो । ' उस पल लगा स्वयं को ही स्वयं के सच का प्रमाण देने से बड़ी परीक्षा कोई नहीं हो सकती .... प्रतिरूप अभी भी मुझमे झाँक रहा था .....' सच को भी भला प्रमाण देने की आवश्यकता होती है ' सोचते हुए न जाने क्यों आँखों ' डूबने ' लगी ... आँखे बंद ही करी थी कि उसका ' पीली बिंदी वाला मुस्कुराता चेहरा ' चमक उठा । <डिंग> नोटिफिकेशन की आवाज आयी तो आँख खुली । प्रतिरूप स्मार्ट फ़ोन की ' प्रदीप्त ' हो चुकी स्क्रीन से गायब था और आज महीने भर बाद मैसेंजर एप पर उसका सन्देश था ... ' :) ' । ©
- तुम भी तो किसीके इनबाक्स में ऐसे ही नियमित रूप से अपनी इच्छाओं आकांक्षाओं दावो को प्रकट करते हो ...
- नहीं नहीं मेरा प्रेम शारीरिक नहीं है मैंने कब की प्रणय संबंधी याचना ?
- पर ये जैसे कर रहे तुम भी वैसे ही करते हो न .. मैं कैसे मानू ?
कहने वाला था कि मैं नैतिक हूँ पर रेम्बू याद आगये ' नैतिकता दिमाग की कमजोरी है ' ... मौन ताड़ कर प्रतिरूप बोला - बोलो बोलो ... चुप क्यों हो गए ? ... नीत्शे विनोबा कीट्स टैगोर सब याद आ रहे थे पर मौन थे शायद उनका मौन कह रहा था कि अपने सच के लिए हमारा इस्तेमाल क्यों करना चाह रहे हो ।
प्रतिरूप अग्नि सी कठोरता लिए बोला - ' अपने प्रेम का प्रमाण दो मुझे या उसे परेशान करना बंद करो । ' उस पल लगा स्वयं को ही स्वयं के सच का प्रमाण देने से बड़ी परीक्षा कोई नहीं हो सकती .... प्रतिरूप अभी भी मुझमे झाँक रहा था .....' सच को भी भला प्रमाण देने की आवश्यकता होती है ' सोचते हुए न जाने क्यों आँखों ' डूबने ' लगी ... आँखे बंद ही करी थी कि उसका ' पीली बिंदी वाला मुस्कुराता चेहरा ' चमक उठा । <डिंग> नोटिफिकेशन की आवाज आयी तो आँख खुली । प्रतिरूप स्मार्ट फ़ोन की ' प्रदीप्त ' हो चुकी स्क्रीन से गायब था और आज महीने भर बाद मैसेंजर एप पर उसका सन्देश था ... ' :) ' । ©
उस भयावह घटना के बाद से उसके अन्दर मैं पल रहा था । नैतिकता के तानों को सहते झेलते उसने मुझ को जन्म दिया । उस दिन उसके शील को छिन्न भिन्न करने वाले आज विकास , भोजन , समानता , न्याय , निष्पक्षता और अधिकार के वस्त्र लेकर उसके जख्म ढकने आये थे । बहुत दुखी थे , संवेदना के प्रतीक बने हुए थे । मुझे हाथ में लेकर वो बोली तुम सब इसके जिम्मेदार हो , इसे अपनाओगे नहीं ? एक दूसरे की तरफ मुंह ताकने लगे । नहीं अपना सकते थे आखिर ' शौक ' आगे भी तो पूरे करने है । तब से मैं अकेला मुंह पर कालिख हाथों में खून लगाये बैठा हूँ सब मुझसे दूर भागते कोई पास बुलाकर अपनाना नहीं चाहता । मैं भी तो लोगों को एक जुट करता एक साथ लाता ... जानते हो साफ़ करना चाहता हूँ अपनी कालिख और खून , जीना चाहता हूँ तुम्हारे सबके साथ प्रेम बनकर ... अपनालो मुझे तुम्हारा ही तो अंश हूँ । - दंगे की आत्म कथा
Wednesday, October 9, 2013
मेरा जन्म कैसे हुआ ये एक शोध का विषय है और शायद कम रोचक भी , पर मेरी कहानी रोचक है । इयोजोईक आर्कियोजोइक प्रोटेरोजोइक से लेकर नियोजोइक काल तक किताबो के पन्नो के रूप में आप मुझे ही पाते हैं । तब घुलता गलता जमता बनता अपने आप अपना आकार ग्रहण करता था मैं । फिर पन्ना पलटा मुझे किसी और ने महत्वाकांक्षाओं का गोल , नुकीला , चौकोर , बड़ा , छोटा आकार देना शुरू कर मेरी स्वाभाविकता को नष्ट कर दिया । लेकिन मैं दुखी नहीं हुआ , खुश था इस नए रूप से । लेकिन पन्ना फिर पलटा इस बार मुझे एक जीवंत रूप दिया गया । अनगिनत बार आस्था का जल विश्वास के पुष्प और श्रृद्धा का नैवेद्य मुझको समर्पित किया गया । फिर अचानक एक दिन वो आँखों में पानी लेकर हाथ फैलाए मेरे सामने खड़ा था । सैकड़ो सौर्य तूफ़ानो ने भी इतना कष्ट नहीं दिया था जितना वो नम आँखे दे रही थी । यही सोंच रहा था आखिर ' निर्माता ' आज याचक बन कर क्यों खड़ा है ? उस दिन मुझे दुःख हुआ बहुत हुआ न कुछ कह सकता था न कर सकता था तो सोचा मैं भी रो दूं .... पर नहीं रो सकता । पत्थर जो ठहरा ......- एक पत्थर की आत्म कथा । ©
प्रतिस्पर्धा
कांच की बोतल के ढक्कन में छेद करके उसमे कपडे की एक लम्बी टुकड़ी डाल कर मिट्टी का तेल भर उसे बनाया गया था । उस दिन वो ढिबरी / डिब्बी रात भर जलती रही सुबह हो गयी थी किसी ने बुझाया नहीं था । चारों और सूर्य का प्रकाश फ़ैल रहा था डिब्बी सहम रही थी । प्रकाश के इस प्रचंड और विहंगम स्रोत के समक्ष उसका आत्मविश्वास डोलने लगा मन ही मन सोचने लगी कहाँ इतना उज्जवल प्रकाश और कहाँ मैं धुँआ फैलती हुई छोटी से लौ । कोई उसके पास ही नहीं आ रहा था या शायद किसी को वो दिख ही नहीं रही थी । निराश हो गयी थी अपने अस्तित्व और उपयोगिता पर स्वयं ही प्रश्न चिन्ह लगाते हुए दिन भर कांपती रही वो लौ ... आखिर शाम होने को हुई । उसे उठा कर बरामदे में रख दिया थोडा और अंधेरा हुआ तो उसी के आस पास चहल पहल बढ़ने लगी । बाबा माला जपने लगे , पुत्तन लिखने लगा , अम्मा सब्जी चीरने ( काटने ) लगी ... और अब लौ बड़े शांत भाव से स्थिर होकर जल रही थी । शायद उसकी समझ में आ चूका था उसकी उपयोगिता प्रासंगिकता प्रकाश से प्रतिस्पर्धा में नहीं वरन अँधेरे से लड़ने के लिए है ।
Tuesday, October 8, 2013
मैं लिखना नहीं चाहता
मैं छपना भी नहीं चाहता
किताबो में
अखबारों में
इतिहास में
तोड़ देना चाहता हूँ अपना कलम
उकेरना चाहता हूँ
खुद को अपनी उँगलियों से
माँ के तलवे पर
तुम्हारी अधरों पर
नन्ही हथेलियों पर
गाय के गले पर
नदी की धारा पर
सुबह की गीली घास पर
लहर बहा कर ले जाए उस रेत पर
कीचड पर मिट्टी पर
पुष्प की पंखुड़ी पर
बबूल के शूल पर
पसीने से भीगे श्रमजीवी के अंगोछे पर
किसान के हंसिए पर
जमादार की झाडू पर
भंगिन के मैला उठाने वाले तसले पर
पत्थर पर
रोटी पर
धुल से सनी खिडकियों पर
और चिता की राख पर .....
©
मैं छपना भी नहीं चाहता
किताबो में
अखबारों में
इतिहास में
तोड़ देना चाहता हूँ अपना कलम
उकेरना चाहता हूँ
खुद को अपनी उँगलियों से
माँ के तलवे पर
तुम्हारी अधरों पर
नन्ही हथेलियों पर
गाय के गले पर
नदी की धारा पर
सुबह की गीली घास पर
लहर बहा कर ले जाए उस रेत पर
कीचड पर मिट्टी पर
पुष्प की पंखुड़ी पर
बबूल के शूल पर
पसीने से भीगे श्रमजीवी के अंगोछे पर
किसान के हंसिए पर
जमादार की झाडू पर
भंगिन के मैला उठाने वाले तसले पर
पत्थर पर
रोटी पर
धुल से सनी खिडकियों पर
और चिता की राख पर .....
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Monday, October 7, 2013
केमिकल लोचा
सफ़र में था खिड़की से बाहर झाकते हुए पेड़ो में खेतों में पहाड़ों में ' तुम्हे ' ही देख रहा । तभी एक आवाज आई ... अच्छा बताओ गांधी धोती क्यों पहनते थे ? .... नहीं पता ... अच्छा तुम बताओ ... तुम ... तुम ? तुम लोगों को नहीं पता चलो हम बताये देते हैं । दुसरे कोने में खिड़की के पास बैठी वो अधेड़ उम्र की शिक्षिका बोली । अपने पूछे प्रश्न का उत्तर देने के बाद गांधी नैतिकता धर्म समाज पर ज्ञान भी दिया । .... नाराज मत होना पर न जाने क्यों ' तुम्हारी ' जगह अब चरखा कातते गांधी ले रहे थे । खैर जब वो उतरने को हुईं तो पाया की चमचमाते हैण्ड बैग में च्विंगम लगी हुई । पेपर से साफ़ करने का प्रयास किया पर महज ' शारीरिक आकर्षण ' की तरह 'नहीं होती च्विंगम , जो छूट जाए ... आखिर सावधानी से बैग कंधे में टांगते हुए बोली ' पता नहीं क्यों च्विंगम खाते है ये लोग मुंह में छाले पड़ें इनके .... कैंसर हो जाए ' ... . न जाने क्यों अब गांधी ©
मार्ग दृश्य है न लक्ष्य
धुंध में छिपे
पर्वत सरीखा हो रहा है
तुम्हारा मौन
तुम्हारे लिए बस
सिमटकर बन गया हूँ मैं ' कौन '
थक रहा हूँ , टूट रहा हूँ
कदम दर कदम
पर जूझूंगा , चलूँगा
सत्य को शिखर तक पहुँचाने को
नापूंगा गहरी घाटियाँ
बढ़ाऊँगा शब्दों के छोटे छोटे कदम
प्रतिध्वनित होती आवृति
इन शब्दों की
कुछ नहीं बस होगी
प्रमाण ' गहराईयों ' का ... ©
धुंध में छिपे
पर्वत सरीखा हो रहा है
तुम्हारा मौन
तुम्हारे लिए बस
सिमटकर बन गया हूँ मैं ' कौन '
थक रहा हूँ , टूट रहा हूँ
कदम दर कदम
पर जूझूंगा , चलूँगा
सत्य को शिखर तक पहुँचाने को
नापूंगा गहरी घाटियाँ
बढ़ाऊँगा शब्दों के छोटे छोटे कदम
प्रतिध्वनित होती आवृति
इन शब्दों की
कुछ नहीं बस होगी
प्रमाण ' गहराईयों ' का ... ©
Saturday, October 5, 2013
डायन
सारे गाँव में पीटते हुए निर्वस्त्र घुमाया कुछ टोने टोटके किये और फिर कहने लगे कि रत्ना के अन्दर की डायन को हमने मार दिया ( और शायद अपने अन्दर की इंसान को भी ) ... विक्षिप्त रत्ना अब तालाब के पास वाले ' डोम ' के बने झोपड़े में ही रहती थी । उस दिन गाँव में हल्ला उठा कि रत्ना तालाब में डूब कर मर गयी । सारा गाँव इकठ्ठा था । जल कुम्भी में फंसी रत्ना और 8 साल सीमा की लाश निकाली जा रही थी । डायन जाते जाते एक को और खा गयी ' जन वाक्य ' बना हुआ था ये । क्रोध और हो हल्ले में एक दबी सिसकी मासूम आवाज आ रही थी ' बा ने ( उसने ) पानी में ते मोय निकारो ( मुझे निकाला ) ' शोर सन्नाटे में बदल गया। माँ ने उसे कभी न अलग करने के भाव से कलेजे से चिपका लिया और वो मासूम आवाज भी शांत हो गयी । अब सन्नाटे के रूप में एक प्रश्न आ खड़ा था जिससे वो सब पीछा छुडाना चाहते थे ' डायन को तो पहले मार दिया था फिर आज ये कौन मरा ? इंसान / औरत या कोई और ? ' ..... ©
Wednesday, October 2, 2013
बड़े बेशर्म हो यार
तुम हर साल आ जाते हो ?
क्या मिलता तुम्हे हर साल आकर ?
रटे रटाये भाषणों में
नैतिकता के पाठ ,
देखे दिखाए नाटक ,
एक दिन का ड्राई डे ?
एक सरकारी छुट्टी और
पूरे दिन निर्बाध बिजली की आपूर्ति ?
बस इसीलिये आते हो ?
सुनो 2 अक्टूबर
तुम्हे सच के उस योद्धा की कसम
तुम अब मत आना
अब तब तक मत आना
जब तक कोई नोट गिरने
खोने , न मिलने से ज्यादा
झूठ बोलने का दुःख न मनाये .... ©
तुम हर साल आ जाते हो ?
क्या मिलता तुम्हे हर साल आकर ?
रटे रटाये भाषणों में
नैतिकता के पाठ ,
देखे दिखाए नाटक ,
एक दिन का ड्राई डे ?
एक सरकारी छुट्टी और
पूरे दिन निर्बाध बिजली की आपूर्ति ?
बस इसीलिये आते हो ?
सुनो 2 अक्टूबर
तुम्हे सच के उस योद्धा की कसम
तुम अब मत आना
अब तब तक मत आना
जब तक कोई नोट गिरने
खोने , न मिलने से ज्यादा
झूठ बोलने का दुःख न मनाये .... ©
Tuesday, October 1, 2013
" लड्डुओ की कतार लग रही थी मेरे अन्दर ... थोड़ी देर में पूरा भर गया था मैं , पर तौल अभी भी कम थी तो दो लड्डू ऊपर चढ़ाकर रबर बैंड से कस दिया गया मुझे । सूट बूट में कसे हुए हैंडसम बन्दे वाला फील आ रहा था ऊपर लिखी क्वालिटी ' शुद्ध देशी घी और स्वच्छता विशेषता ' चमक रही थीं । खरीदने वाले ने पालीथीन समेत मुझे उठाया और घर ले आया । घर में दो नन्हे हाथ मुझे खोलते ही चहक उठे लेकिन तभी दो मुलायम बड़े हाथों ने मुझे झपट लिया । और एक मूर्तियों से सजे कमरे में मुझे पहुंचा दिया । वहाँ दो और मुलायम हाथों ने सारे लड्डुओं को एक बड़े से थाल में सजा दिया और मुझे एक कोने में खाली खुला और अकेला छोड़ गए। सुबह होते ही दो रूखे घिसे हुए हाथों ने मुझे उठाकर मुझ पर लिखे ' शुद्ध देशी घी और स्वच्छता विशेषता ' का बिल्कुल भी ध्यान न देते हुए मुझमे जूठन , कूड़ा भर कर कूड़े के ढेर पर जलने के लिए डाल दिया । ... मुझे समझ आ चुका था मेरी उपयोगिता समाप्त हो गयी है । " - एक वानप्रस्थ की डायरी से .....©
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