Tuesday, October 29, 2013

अंतर

" भरी बस के स्टैंड पर रुकने और सवारियां उतरने के समय एक साईकिल रिक्शे वाले के चेहरे पर जैसी आस जगी होती वही आस उसके 11 साल के चेहरे पर थी जब उसने मेरे नीचे गत्ते दफ्ती का छोटा सा ढेर देखा । नीचे घुस कर वो उसे ऐसे समेटने लगा जैसे सपनों में आया खजाना हो । पर पहिये के नीचे से गत्ता खीचने से मैं तनिक सी हिली भर कि मेरे संवेदनशील सेंसर अलार्म ने चिल्लाना शुरू कर दिया ' बीप ... बीप .... बीप .... बीप ' । चौकीदार मालिक भागते हुए आये , खीचते हुए उसे निकाल कर उसपर ' माँ बहन और चोर ' थोप दिया , कुछ हाथ जड़े सो अलग । जाते हुए उसने एक बार मुड़ कर मुझे नफरत भरे आंसुओं के साथ देखा ... मन हुआ बोल पडूं ' आओ ले जाओ अपना सामान नहीं चिल्लाऊंगी इस बार ' लेकिन ऐसा नहीं हो सकता था मेरी संवेदनशीलता दगा नहीं दे सकती । ये भले ही इंसान ने मुझे दी हो पर इंसान जैसी कतई नहीं हैं " ..... - एक कार की आत्मकथा से ©

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