उस भयावह घटना के बाद से उसके अन्दर मैं पल रहा था । नैतिकता के तानों को सहते झेलते उसने मुझ को जन्म दिया । उस दिन उसके शील को छिन्न भिन्न करने वाले आज विकास , भोजन , समानता , न्याय , निष्पक्षता और अधिकार के वस्त्र लेकर उसके जख्म ढकने आये थे । बहुत दुखी थे , संवेदना के प्रतीक बने हुए थे । मुझे हाथ में लेकर वो बोली तुम सब इसके जिम्मेदार हो , इसे अपनाओगे नहीं ? एक दूसरे की तरफ मुंह ताकने लगे । नहीं अपना सकते थे आखिर ' शौक ' आगे भी तो पूरे करने है । तब से मैं अकेला मुंह पर कालिख हाथों में खून लगाये बैठा हूँ सब मुझसे दूर भागते कोई पास बुलाकर अपनाना नहीं चाहता । मैं भी तो लोगों को एक जुट करता एक साथ लाता ... जानते हो साफ़ करना चाहता हूँ अपनी कालिख और खून , जीना चाहता हूँ तुम्हारे सबके साथ प्रेम बनकर ... अपनालो मुझे तुम्हारा ही तो अंश हूँ । - दंगे की आत्म कथा
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