Sunday, October 20, 2013

तमाम उम्र गुजार देंगे तेरे इन्तेजार में 
ज़र्रा ज़र्रा कतरा कतरा ही सही 
जिन्दगी में आती रहना । 

दरख्त है पतझड़ उजाड़ कर जाते
बनके बहार का मौसम शाखों पर 
जिन्दगी में आती रहना 

तन्हाईयों में धड़कना बंद सा कर देता है जालिम 
नफ़स की डोर हो तुम
जिन्दगी में आती रहना  

आशिक हूँ माबूद की जूस्तजू में फिरता
जौ दैर-ए-दिया का बनके 
जिन्दगी में आती रहना ......  ©

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नफस - सांस
माबूद - आराध्य
जौ दैर-ए-दिया - मंदिर के दिए का प्रकाश




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