Friday, October 18, 2013

हमारे जीवन में सीखने का बड़ा महत्त्व बताया गया है । सीखना एक कला है विज्ञान है आवश्यकता है ऐसा प्रायः पढ़ने सुनने में आता है । सीखने को जीवन पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया भी कहा गया है । पर कभी सोच कर देखिये हम क्या ' सीखते हैं ? ' .... जिसके प्रति हम सीखना सीखना कहकर प्रतिबद्धित रहते वो क्या सच में सीखना है ? ... नहीं बिलकुल नहीं । ये सीखना नहीं अनुकरण है जो हमें सीमित कर देता , ताँगे मे जुते घोड़े की तरह जिसकी आँखों पर बंधी युक्ति उसे सीधा देखने को विवश करे रहती । घोडा चलता है दौड़ता है लक्ष्य तक भी पहुँचता है पर अपने नहीं ।  

बात विज्ञान की करें तो विश्व के हर कोने में आईन्सटीन , न्यूटन के प्रतिपादित सिद्धांत पढाये जाते / सिखाये जाते ? क्या हम सच में उन्हें सीखते ? नहीं हम बस उन तक सीमित होकर उत्तर पुस्तिका में उनका उपयोग करते । हम इन सिद्धांतों को तब तक सीख नहीं पायेंगे जब तक हम उनके प्रतिपादन में लगी जिज्ञासा परिश्रम असफलता लगन को अपने स्तर से नहीं जियेंगे । 

कला और साहित्य के क्षेत्र में ही देखिये । नवांगतुक रचनाकारों को प्रसिद्ध रचनाकारों को पढने और सीखने का सुझाव देते लोग मिल जायेंगे । पर क्या वो सही है ? क्योंकि पढ़कर सीखने की कोशिश से हमारी रचना शैली और वैचारिक स्तर प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता ? तो फिर हमने जो सीखा वो अनुकरण ही हुआ न ?  

सृष्टि में मानवीय विकास के चरणों में आग जलाना सबसे बड़ी खोज माना जाता है ? सृष्टि के उस पहले पुरुष ने आग जिज्ञासा आवश्यकता के वशीभूत होकर जलाने के अनगिनत असफल प्रयास किये होंगे तब जाकर उसे सफलता मिली होगी । पर साथ ही उसे पत्थर रगड़ते रगड़ते भिन्न भिन्न पत्थरों के अन्य उपयोग इनकी कठोरता भी समझ आई होगी । उसे ये सब किसी सीखने की लालसा से नहीं मिला । उसे ये सब करने के प्रतिफल स्वरूप मिला । इसलिए सीखने की वैशाखी छोडिये और लक्ष्य के मनोविज्ञान से बचिए और खोजने / जिज्ञासा के जूते पहन कर निकल पड़िये ...

No comments:

Post a Comment