Monday, October 21, 2013

बरसात का मौसम था । धरा पर चारों और पर प्रकृति पल्लवित प्रस्फुटित हो रही थी । मैदान के उस कोने में न जाने कहाँ से वो यूकेलिप्टस का बीज पनपने लगा था । कोने की घास जो अब तक वीरान पडी रहती थी अब खुश थी । उसके जीवन में कोई हमदम जो आया था । पर यूकेलिप्टस ऊंचाई प्राप्ति का आकांक्षी था । समय बीता अब यूकेलिप्टस ' ऊंचाई ' छु रहा था और घास वहीं नीचे ' विस्तारित ' होती रही । सुबह जागिंग तो शाम को फुटबाल खेलने वालों के द्वारा रौंदी जाती और थोड़ी बढ़ने पर काट ली जाती लेकिन वही रही । इस बार तो गर्मियों में भी वो नहीं सूखी बस भूरी भूरी होकर रह गयी । पर ' ऊंचाई ' कभी नहीं झुकी वो खड़ी रही अडिग न कभी छाया दी न कभी फल .... पर कल जोर का तूफ़ान आया सारा पेड़ खड़े रहे लेकिन  ' ऊंचाईयां ' आज उस ' विस्तार ' के आगोश आ पड़ी थी । .... क्या .... क्या कह रहे हो ? वो प्रेमियों का जोड़ा कल ही उसके तने पर ' दिल ' उकेर कर आया था .... ©

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