मार्ग दृश्य है न लक्ष्य
धुंध में छिपे
पर्वत सरीखा हो रहा है
तुम्हारा मौन
तुम्हारे लिए बस
सिमटकर बन गया हूँ मैं ' कौन '
थक रहा हूँ , टूट रहा हूँ
कदम दर कदम
पर जूझूंगा , चलूँगा
सत्य को शिखर तक पहुँचाने को
नापूंगा गहरी घाटियाँ
बढ़ाऊँगा शब्दों के छोटे छोटे कदम
प्रतिध्वनित होती आवृति
इन शब्दों की
कुछ नहीं बस होगी
प्रमाण ' गहराईयों ' का ... ©
धुंध में छिपे
पर्वत सरीखा हो रहा है
तुम्हारा मौन
तुम्हारे लिए बस
सिमटकर बन गया हूँ मैं ' कौन '
थक रहा हूँ , टूट रहा हूँ
कदम दर कदम
पर जूझूंगा , चलूँगा
सत्य को शिखर तक पहुँचाने को
नापूंगा गहरी घाटियाँ
बढ़ाऊँगा शब्दों के छोटे छोटे कदम
प्रतिध्वनित होती आवृति
इन शब्दों की
कुछ नहीं बस होगी
प्रमाण ' गहराईयों ' का ... ©
No comments:
Post a Comment