दशहरे का मेला था । भाई हजारों की भीड़ तो होनी ही थी आखिर इस बार रिकार्ड तोड़ 120 फीट का रावण जो जलाया जा रहा था । आखिर आग लगी पुतला जला पटाखे फूटे और साथ ही हुआ ' सियाबर राम चन्द्र की जय ' का रोमहर्षक आंदोलित प्रफुल्लित करने वाला सस्वर उदघोष । लगा रावण जल गया कहानी ख़त्म .... पर नहीं दोस्त , कहानियाँ ख़त्म नहीं होती । वो तो अभी भी बरकरार थी .... बैकलेस ब्लाउज से झांकते अधोवस्त्र ताकती उन आँखों में , 25 रूपये हर माल की दूकान में सबको सुनाकर कहे गए ' बड़ा मस्त मस्त माल लगाए हो ' के स्वर में और ' जरा हटिये ' कहने के स्थान पर दिए जाने वाले उस उन्मादित पाशविक स्पर्श में ..... अब न जाने क्यों तरस आ रहा था दफ्ती , लकड़ी , बांस , कपड़े , रंग , पटाखे और इन सबको को आकार देने में किये गए श्रम पर ..... आखिर हर बार की तरह इस बार भी बुराई के नाम पर बस इन्हें ही बलि चढ़ना पड़ा । ©
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