कांच की बोतल के ढक्कन में छेद करके उसमे कपडे की एक लम्बी टुकड़ी डाल कर मिट्टी का तेल भर उसे बनाया गया था । उस दिन वो ढिबरी / डिब्बी रात भर जलती रही सुबह हो गयी थी किसी ने बुझाया नहीं था । चारों और सूर्य का प्रकाश फ़ैल रहा था डिब्बी सहम रही थी । प्रकाश के इस प्रचंड और विहंगम स्रोत के समक्ष उसका आत्मविश्वास डोलने लगा मन ही मन सोचने लगी कहाँ इतना उज्जवल प्रकाश और कहाँ मैं धुँआ फैलती हुई छोटी से लौ । कोई उसके पास ही नहीं आ रहा था या शायद किसी को वो दिख ही नहीं रही थी । निराश हो गयी थी अपने अस्तित्व और उपयोगिता पर स्वयं ही प्रश्न चिन्ह लगाते हुए दिन भर कांपती रही वो लौ ... आखिर शाम होने को हुई । उसे उठा कर बरामदे में रख दिया थोडा और अंधेरा हुआ तो उसी के आस पास चहल पहल बढ़ने लगी । बाबा माला जपने लगे , पुत्तन लिखने लगा , अम्मा सब्जी चीरने ( काटने ) लगी ... और अब लौ बड़े शांत भाव से स्थिर होकर जल रही थी । शायद उसकी समझ में आ चूका था उसकी उपयोगिता प्रासंगिकता प्रकाश से प्रतिस्पर्धा में नहीं वरन अँधेरे से लड़ने के लिए है ।
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