जेल से सात साल बाद निकला था वो । समझ नहीं आ रहा था कहाँ जाए । शहर से बाहर जाने के लिए पटरियों के किनारे किनारे प्लेटफार्म की और बढ़ चला था उसका एक एक कदम उसे याद दिला रहा कि कैसे उस मजदूरन के साथ जो उसने किया उसके बाद सब कुछ बदल गया था । घर परिवार नाते रिश्तेदार सब कन्नी काट गये थे । जेल में प्रताड़ना मिली सो अलग । मुर्दा शरीर की भांति उद्देश्यहीन चला जा रहा था । इंजन के भोपू की आवाज आयी तो जैसे नींद से जगा और तभी एक कामगार महिला का तेज स्वर भी सुनाई दिया ' ' बबुआ S s s बबुआ S s s पटरी से हट जा s s s ' लेकिन पटरी पर खेल रहा बालक शायद बधिर था .. टस से मस न हुआ । महिला के चेहरे पर गौर देते ही उसे साढ़े सात साल पहले की रात याद आगई ... ये तो च.. चमेली है .. तो क्या ये बच्चा मेरा ? .... उस मुर्दा शरीर में बिजली सी कौंध गयी तीनो ट्रैक पार करके बच्चे को एक किनारे धक्का दे दिया पर खुद को इंजन के सामने से नहीं हटा (पा ?)या ... ट्रेन जा चुकी थी , बच्चा माँ की गोद में था .. मांस के लोथड़े प्रश्न लिए बिखरे पड़े थे " ये पाप का प्रायश्चित था या दंड ? " ....©
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