Tuesday, October 1, 2013

" लड्डुओ की कतार लग रही थी मेरे अन्दर ... थोड़ी देर में पूरा भर गया था मैं , पर तौल अभी भी कम थी तो दो लड्डू ऊपर चढ़ाकर रबर बैंड से कस दिया गया मुझे । सूट बूट में कसे हुए हैंडसम बन्दे वाला फील आ रहा था ऊपर लिखी क्वालिटी ' शुद्ध देशी घी और स्वच्छता विशेषता ' चमक रही थीं । खरीदने वाले ने पालीथीन समेत मुझे उठाया और घर ले आया । घर में दो नन्हे हाथ मुझे खोलते ही चहक उठे लेकिन तभी दो मुलायम बड़े हाथों ने मुझे झपट लिया । और एक मूर्तियों से सजे कमरे में मुझे पहुंचा दिया । वहाँ दो और मुलायम हाथों ने सारे लड्डुओं को एक बड़े से थाल में सजा दिया और मुझे एक कोने में खाली खुला और अकेला छोड़ गए। सुबह होते ही दो रूखे घिसे हुए हाथों ने मुझे उठाकर मुझ पर लिखे ' शुद्ध देशी घी और स्वच्छता विशेषता ' का बिल्कुल भी ध्यान न देते हुए मुझमे जूठन , कूड़ा भर कर कूड़े के ढेर पर जलने के लिए डाल दिया । ... मुझे समझ आ चुका था मेरी उपयोगिता समाप्त हो गयी है । " - एक वानप्रस्थ की डायरी से .....©

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