Monday, November 5, 2012


मेरी मगहर यात्रा -
बहुत दिन पहले मगहर जाना हुआ था , जी हां सही पहचाना कबीर दास जी  वाला मगहर .. गोरखपुर लखनऊ मार्ग पर बस्ती से तकरीबन 38 किलोमीटर  कस्बे से बाहर स्मारक बना है .. मुख्य सडक से स्मारक जाने वाले रास्ते में जगह जगह गोबर .. गाय , भैंस , बकरियों का अधिवेशन जारी था .. तनिक और आगे चला तो 12-14 साल के तीन बच्चे बांस में मछली के लिये कांटा लगाये जा रहे थे ।  दो चाय की दुकाने , एक खीरा बेचनें वाला और  स्थानीय लोगों के अलावा गिनती के ही लोग थे तो मेरी तरह स्मारक देखने आये थे । शायद वो कोई  ’ खास दिन ’ नहीं था । .. खैर आगे चला तो मंदिर और मस्जिद के शीर्ष चमक रहे थे .. मुख्य भवन से मंदिर और मस्जिद के सामने प्रवेश के लिये कबीरदास जी के विचारों को मुंह चिढाते दो अलग अलग दरवाजे थे .. ( वैसे प्रवेश निकास की सुविधा वाला तर्क यहां काम कर जायेगा ) । मैने जहां गाडी खडी की थी वहां से मस्जिद के सामने वाला प्रवेश द्वार बिल्कुल सामने और नजदीक था .. तो मैने वहीं से प्रवेश ले लिया ( इसे मेरी धर्म निरपेक्षता का प्रमाणपत्र माना जाये ).. अंदर हरियाली थी .. पौधे लगे थे , पेड थे ।  सफ़ेद रंग की मस्जिद जो सीमेंट की जगह चूने वाले गारे के बारे में बताती सी लगी  .. घास , पौधे और हरियाली अपनी कांट छाट के लिये और मस्जिद की छूटती कलई किसी वी आई पी आगंतुक की बाट जोहते से लगे ।    .. चबूतरे पर चढते हुय एक सिहरन सी हुई .. ऐसा लगा जैसे पहले भी आ चुका हूं .. दरवाजा छोटा है ताकि बडे ( अहम वाले )  लोग झुक कर प्रवेश करें । अंदर प्रवेश करते समय लगा किसी शून्य में प्रवेश कर रहा हूं .. प्रवेश करते ही ऐसा लगा मानो शहरों के शोर में में रहने वाला कोई व्यक्ति किसी शांत शीतल पहाडी गांव में रात गुजार रहा हों .. अनुभूति कर ही रहा था तभी साथी ने कहा चलें ? शायद समय बहुत हो गया था .. नींद से जगा हुआ सा अंदर का अवलोकन करने लगा  .. दीवारों पर आरे ( आले ) बने थे जिनमें दीपक रखा था .. पर वो उस आले में रख कर नही जलाया जाता था क्योंकि कालिख तो आले की दीवार पर थी ही नहीं ... नीचे सीमेंटेड फ़र्स पर समाधि बनी हुई थी .. समाधि के ऊपर हरे पीले रंग का रंग की कपडे की एक  चादर थी । ये सब देख ही रहा था कि साथी ने दुबारा कहा .. चलें अभी मंदिर भी तो जाना है !! .. मैने कहां हां हा .. और बाहर निकले के लिये आगे बढा ... पर बाहर निकलने में अंदर की ओर से एक खिचाव सा मालुम .. फ़िर पलट कर पीछे मुडा नमन किया .. और बाहर निकला .. बाहर निकलते एक हल्का सा बोझ प्रतीत हुआ खैर अब मंदिर की ओर चला ही था कि ............. शेष फ़िर :)  

Tuesday, October 30, 2012

चाक ( सफ़ेद ) और पोतना ( काले ) 
से घिस चुकी जीवन की पाटी पर
मैं लिखता हूं
मृत्यु की बातें
अंत की बातें अवसान की बातें 
क्योंकि
मुझे विश्वास है 
मृत्यु पर
साझा करेगी एक दिन
मेरी आत्मा पर पडा

पापों का बोझ
अन्तर्मन की कलुषितायें
हृदय की वेदना
और सत्य का रोष
असफ़लता , जडता
मूर्खता , धृष्टता
उज्ज्वलता , प्रखरता समेत
आत्म मूल्यांकन का सारा कोष
और बदले में देगी
मुझे एक सुप्त मुस्कान
जब तक दुबारा निकल न जाऊं
मैं उसके साथ जीवन की खोज पर ।

Tuesday, August 7, 2012




त्याग , संयम कर्मठता
बैनर पोस्टर पर लिखने से
नहीं आती
वो उस कमीज में है
जो सर्दी में
पसीने से भीग जाती
बारिश में बदन की गर्मी
तुरंत से सूख जाती

सीमेंट की बोरी वाले झोले में
वो ’ वानप्रस्थ ’ लाता है
कपडे मे लिपटी रोटियां
सबसे ऊपर की रोटी से
ढंका नमक , मिर्च और
प्याज की बोटियां
और टाट जडित, फ़ेंकी हुयी
शीतल पेय की बोतल
मे भरा पानी

नहीं परवाह उसे बारिश
धूप सर्दी या कोहरे की
कहता है वो कि
उसे आदत है इस सब की
सुख सुविधा की
महत्वाकांक्षा से विहीन
ध्येय के प्रति तल्लीन
मान सम्मान की
अपेक्षा - आकांक्षा से परे
वो अनवरत जुट जाता है
अपने कर्म अपनी पूजा में

अच्छा  ’ मलंग ’  तो वो पुजारी है ??
हां !! सबसे बडा पुजारी
क्योंकि उसकी पूजा
निश्चित करती है
सैकडों हजारों जनों की सुरक्षा ....
चिलचिलाती धूप मे
हाड गलाती ठंड मे
जब वातानुकूलक के सामने से
हटने का मन नहीं करता
उसका घन पटरियों पर
सतत चलता
क्यों कि ये उसके लिये
कार्य नहीं , व्यवसाय नहीं
है तो सिर्फ़ पूजा ...
है तो सिर्फ़ पूजा ॥ ©

Wednesday, March 14, 2012


मृत्यु !

याचक बन जब

तुम आओगी मेरे द्वार

ले चलने मुझे

जीवन नेपथ्य के पार

सोचता हूं कैसे करूंगा

अपना दाता धर्म निर्वाह

क्योंकि नहीं होगा

तुम्हे कुछ देने को

सहेज कर रखे सपने

बिखर चुके होंगे

अपेक्षाओं , उपेक्षाओं से ग्रस्त

धूमिल पडी स्मृतियां होंगी

तत्पर होगा

आंसुओं में बहने को प्रेम

बाध्य होंगी

धुयें में उडने को आशायें

बस रह जायेगी

श्रेष्ठ - निकृष्ट

कुंठित कलुषित

उत्साहित उन्मादित

असफल - सफल

के द्वंद से झकझोरी

मुस्कुराती हुई

एक अतृप्त ’ मलंग ’ आत्मा

तुम्हारे आलिंगन को

तुम्हारे वरण को

और

पूरा करने को जीवन प्रवाह

और पूरा करने को जीवन प्रवाह .....









©

Monday, February 13, 2012

रूंधे गले से
भाव बोलने लगें हैं
आंसू भी आखों की
दहलीज से टकराकर
वापस लौट रहे है
इसलिये कि
वो बहा न ले जायें
किसी की
यादों को
हृदय की पीर
ने धर लिया है
रूप शब्दों का
फ़िर भी अवर्णित
है व्यथा
क्या प्रेम परिणति की
बस इतनी सी
रहती है कथा ?

पर प्रेम अनादि है
अनाद्यंत है
है एक अंत हीन
यात्रा
चला जा रहा हूं
अकृलांत
जिस पर
यूं समेटे तुम्हे
जैसे अक्षरों में
’अ’ मात्रा ....

.... जैसे अक्षरों में ’अ’ मात्रा .... ©

Saturday, January 21, 2012

मृत्य ...................... जीवन !!!


... मृत्यु सुना है
तुम बहुत निष्ठुर हो
लेकर आती हो तुम
शोक , संताप , रुदन , क्रंदन
अश्रु , टीस बिछोह और बिलखन
छीन लेती हो तुम
सपने , आशाये स्नेह , संबल
संतान , मित्र माता पिता
पति पत्नी और स्वजन
फ़िर भी मृत्यु
मैं तुमसे तनिक भी
घृणा नही करता
मेरे लिये
तुम हो एक पण्यपति
जो खरा सौदा करता
छोड कर जाता जो
अधिकार , समर्पण , उत्तरदायित्व
संकल्प , विश्वास ,
ध्येय और कर्तव्य
कोपलों सरीखी नव आशायें व स्वप्न
और एक धरातल जिसमें सृजित होता है
एक और जीवन ...

Thursday, January 5, 2012

" स्याह-सफ़ेद डालकर साए मेरा रंग पूछने आए !!! " - जानकी वल्लभ शास्त्री जी

स्याह-सफ़ेद डालकर साए
मेरा रंग पूछने आए !

मैं अपने में कोरा-सादा
मेरा कोई नहीं इरादा
ठोकर मर-मारकर तुमने
बंजर उर में शूल उगाए ।

स्याह-सफ़ेद डालकर साए
मेरा रंग पूछने आए !

मेरी निंदियारी आँखों का-
कोई स्वप्न नहीं; पाँखों का-
गहन गगन से रहा न नता,
क्यों तुमने तारे तुड़वाए ।

स्याह-सफ़ेद डालकर साए
मेरा रंग पूछने आए !

मेरी बर्फ़ीली आहों का
बुझी धुआँती-सी चाहों का-
क्या था? घर में आग लगाकर
तुमने बाहर दिए जलाए ।

स्याह-सफ़ेद डालकर साए
मेरा रंग पूछने आए !!!!