रूंधे गले से
भाव बोलने लगें हैं
आंसू भी आखों की
दहलीज से टकराकर
वापस लौट रहे है
इसलिये कि
वो बहा न ले जायें
किसी की
यादों को
हृदय की पीर
ने धर लिया है
रूप शब्दों का
फ़िर भी अवर्णित
है व्यथा
क्या प्रेम परिणति की
बस इतनी सी
रहती है कथा ?
पर प्रेम अनादि है
अनाद्यंत है
है एक अंत हीन
यात्रा
चला जा रहा हूं
अकृलांत
जिस पर
यूं समेटे तुम्हे
जैसे अक्षरों में
’अ’ मात्रा ....
.... जैसे अक्षरों में ’अ’ मात्रा .... ©
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