मृत्यु !
याचक बन जब
तुम आओगी मेरे द्वार
ले चलने मुझे
जीवन नेपथ्य के पार
सोचता हूं कैसे करूंगा
अपना दाता धर्म निर्वाह
क्योंकि नहीं होगा
तुम्हे कुछ देने को
सहेज कर रखे सपने
बिखर चुके होंगे
अपेक्षाओं , उपेक्षाओं से ग्रस्त
धूमिल पडी स्मृतियां होंगी
तत्पर होगा
आंसुओं में बहने को प्रेम
बाध्य होंगी
धुयें में उडने को आशायें
बस रह जायेगी
श्रेष्ठ - निकृष्ट
कुंठित कलुषित
उत्साहित उन्मादित
असफल - सफल
के द्वंद से झकझोरी
मुस्कुराती हुई
एक अतृप्त ’ मलंग ’ आत्मा
तुम्हारे आलिंगन को
तुम्हारे वरण को
और
पूरा करने को जीवन प्रवाह
और पूरा करने को जीवन प्रवाह .....
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