पथ के प्रतिबाधन ने इतना मुझे सिखाया है ;
नियति नहीं ये तो निज कर्मों की छाया है ।
सत , विवेक , पौरुष के बल जो आगे को आया ;
मनुज नहीं बस , सृष्टा ने भी उसको शीश झुकाया है ॥
मै उस भारत का वासी हूं जो जगत गुरु कहलाता है ;
जिसके वेदों की अमर ज्योंति से अंधकार कुम्हलाता है ।
मानव का मानव से नाता , पन्ना , दधीचि की धरती ये ;
पर हाय मनुज क्यों आज यहां यूं विप्रलाप फैलाता है ॥
इस विप्लव उन्मूलन को मैं अब शंखनाद करता हूं ;
जौहर की चिंगारी से , उर मे अनल दाह करता हूं ।
हल्दी घाटी की रज ,को भाल सजा कर कहता हूं ;
धर्म नहीं , मै जाति नहीं , मै मानव सेवा करता हूं ॥