Hostel campus B ब्लाक ऊपरी मंजिल का बाएं किनारे से दूसरा कमरा , C-11 , ऊपरी मंजिल तो दूर B ब्लाक़ में रहने को मजबूरी में ही कोई तैय्यार होता था । क्योंकि वहां भूतनी ( यही नाम दिया था लोगों ने उसे ) अब भी रहती है और अक्सर देर रात अँधेरे में C-11 के बाहर बरामदे में और कभी बालकनी में , चैनल के पीछे , वाटर कूलर के पास वो अकेला साया दिख जाता है , रूह काँप ऊठती है लोगों की उसे देखते ही , वीभत्स अभिशप्त चेहरे की ऐसी दहशत थी कि डर लोगों की हड्डियों में घुस कर उन्हें मोम बना चुका था किसी में इतनी हिम्मत नहीं कि उसके पास फटक सके। ऐसा नहीं था कि उसे हटाने के प्रयास नहीं किये गए बहुत किये गए ... हर संभव प्रयास किये गए पर वो हटती ही नहीं थी बस भरभराती आवाज में गीता सुनाती है कहती है ' वो अभी मरी नहीं है , ज़िंदा है अभिशप्त वीभत्स अकेली होकर भी वो अभी जिन्दा है , चेहरा वक्ष और हाथ जलाए हैं तेज़ाब ने आत्मा नहीं ' .. हां आप सही समझे " नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि ...... " । - ब्रह्म राक्षस ©
.............कब यहां अमर विस्वास , अमिट है कब आस्था ? बस एक शून्य जिसमें होता सब कुछ विलीन , आबद्ध परिस्थिति - मनोवृत्ति की सीमा से , मै जो लिखता वह सब कितना अर्थहीन !
Thursday, May 29, 2014
भूतनी
Friday, May 23, 2014
बेवकूफ
छोटे शहर का रेलवे स्टेशन आमतौर कुली वेंडर इक्का दुक्का यात्री दिखाई देते । हाँ पर ट्रेन आने के समय भीड़ ऐसे जुटती जैसे छुट्टी के बाद गर्ल्स कालेज के बाहर । कहने को तो दो टिकट विंडो है पर चंद्रमा सूरज और पृथ्वी के बीच आ सकता है पर दोनों एक साथ खुल जाएं ऐसा शायद ही कभी हो , इसलिए खिड़की पर लाईन रूपी भीड़ ये कहती सी लगती ' ट्रेन में मिलने वाली भीड़ का ट्रेलर है ये जो इसे झेल सकता वही रेलवे में यात्रा करने का पात्र होगा ' ... खैर उस दिन लाईन के बगल से उस हरी शर्ट वाले आदमी ने टिकट लेने का प्रयास किया ही था कि ' ओ s s हरी शर्ट कहाँ बीच में घुस रहा है .... क्या कर रहे हैं दादा.... भाईसाहब लाईन से आईये .... लाईन से आ बे हम बेवकूफ हैं क्या जो आधे घंटे से लाईन में लगे हैं . .' एकता में अनेकता का एहसास दिलाते हुए भिन्न भिन्न स्वर फूट पड़े । वो झट से हट गया ..लाईन आगे को रेंग ही रही थी कि इसबार एक महिला बगल से आगई ... कुछ बुदबुदाते हुए चेहरों के सामने महिला ने टिकट लिया और मुड़ कर हरी शर्ट वाले के साथ चली गयी । लाईन अब भी वही थी विनम्रता उग्रता के चेहरों से भरी पर एक चेहरा एक पल को गायब हुआ और झट से लौट आया , इस बार गोद में बच्चा लिए साड़ी वाली को टिकट खिड़की की तरफ निर्देशित कर भेजते हुए जो साफ़ दर्शा रहा था कि वो आधे घंटे से बेवकूफ ही बन रहा था पर अब नहीं .... ©