Thursday, October 10, 2013

कभी ज्वार बनकर 
कभी फुहार बनकर 
कभी किसी के सामने 
कभी सूने में 
छिपा रहता हूँ कभी 
दृग के कोने में 
चिता को सुखाने 
विरह को गलाने
दर्द को जताने 
प्रेम दर्शाने 
आशा में निराशा में 
हर्ष में उल्लास में
मैं निकल आता हूँ .... 

कभी रूमाल से
कभी बस गाल तक 
खुद की आस्तीन से 
माँ के आँचल तक 
कभी हथेलियों से 
यारो की हथखेलियों से 
अक्सर रोका जाता हूँ मैं 

पर मैं नहीं हूँ 
कमजोरी या
निर्बलता का प्रतीक 
मैं प्रतीक हूँ 
पवित्रता का
प्रबलता का 
ह्रदय की ...
©






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