कभी ज्वार बनकर
कभी फुहार बनकर
कभी किसी के सामने
कभी सूने में
छिपा रहता हूँ कभी
दृग के कोने में
चिता को सुखाने
विरह को गलाने
दर्द को जताने
प्रेम दर्शाने
आशा में निराशा में
हर्ष में उल्लास में
मैं निकल आता हूँ ....
कभी रूमाल से
कभी बस गाल तक
खुद की आस्तीन से
माँ के आँचल तक
कभी हथेलियों से
यारो की हथखेलियों से
अक्सर रोका जाता हूँ मैं
पर मैं नहीं हूँ
कमजोरी या
निर्बलता का प्रतीक
मैं प्रतीक हूँ
पवित्रता का
प्रबलता का
ह्रदय की ...
©
कभी फुहार बनकर
कभी किसी के सामने
कभी सूने में
छिपा रहता हूँ कभी
दृग के कोने में
चिता को सुखाने
विरह को गलाने
दर्द को जताने
प्रेम दर्शाने
आशा में निराशा में
हर्ष में उल्लास में
मैं निकल आता हूँ ....
कभी रूमाल से
कभी बस गाल तक
खुद की आस्तीन से
माँ के आँचल तक
कभी हथेलियों से
यारो की हथखेलियों से
अक्सर रोका जाता हूँ मैं
पर मैं नहीं हूँ
कमजोरी या
निर्बलता का प्रतीक
मैं प्रतीक हूँ
पवित्रता का
प्रबलता का
ह्रदय की ...
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