मेरा जन्म कैसे हुआ ये एक शोध का विषय है और शायद कम रोचक भी , पर मेरी कहानी रोचक है । इयोजोईक आर्कियोजोइक प्रोटेरोजोइक से लेकर नियोजोइक काल तक किताबो के पन्नो के रूप में आप मुझे ही पाते हैं । तब घुलता गलता जमता बनता अपने आप अपना आकार ग्रहण करता था मैं । फिर पन्ना पलटा मुझे किसी और ने महत्वाकांक्षाओं का गोल , नुकीला , चौकोर , बड़ा , छोटा आकार देना शुरू कर मेरी स्वाभाविकता को नष्ट कर दिया । लेकिन मैं दुखी नहीं हुआ , खुश था इस नए रूप से । लेकिन पन्ना फिर पलटा इस बार मुझे एक जीवंत रूप दिया गया । अनगिनत बार आस्था का जल विश्वास के पुष्प और श्रृद्धा का नैवेद्य मुझको समर्पित किया गया । फिर अचानक एक दिन वो आँखों में पानी लेकर हाथ फैलाए मेरे सामने खड़ा था । सैकड़ो सौर्य तूफ़ानो ने भी इतना कष्ट नहीं दिया था जितना वो नम आँखे दे रही थी । यही सोंच रहा था आखिर ' निर्माता ' आज याचक बन कर क्यों खड़ा है ? उस दिन मुझे दुःख हुआ बहुत हुआ न कुछ कह सकता था न कर सकता था तो सोचा मैं भी रो दूं .... पर नहीं रो सकता । पत्थर जो ठहरा ......- एक पत्थर की आत्म कथा । ©
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