Friday, November 1, 2013

 स्वरूप आकार और प्रकृति सामान होती है हमारी , आप चाहे तो हमें जुड़वां कह सकते हैं । रोज हम कीचड़ लगे , चमकते हुए , कोमल बजने वाले , प्रकाशित करने वाले ,नए - पुराने , घिसे - सिले , वैश्विक ब्रांड से लेकर 250 रूपये जोड़ा वाले पैरों को आरोह अवरोह से उपजे लक्ष्य तक पहुंचाते हैं । यही हमारा जीवन कर्म है । रोचक नहीं लगा न ? हमें भी नहीं लगता , भला रोज रोज भार उठाना किसे भायेगा ? मन करता बंद पड़ जाए लेकिन फिर गूंजने लगते है कुछ शब्द " देखो ऐसे पैर रखो ... हां ऐसे सम्हाल के ... डरो मत मैं हूँ न साथ .. लो मेरा हाथ पकड़ लो " कोई माने या न माने पर ह्रदय जैसे हम भी अनवरत चलने को प्रतिबद्ध हो जाते आखिर अपनेपन का स्पर्श , प्रेम और विश्वास हमसे भी जो उपजता । - एस्कलेटर की आत्मकथा से ©

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